बिहार में गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रहे परिवारों की महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से गठित किए गए स्वयं सहायता समूह की स्थिति भी अच्छी नहीं है. सरकार को स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजनांतर्गत गठित स्वयं सहायता समूहों के नाम और बैंक खाते ढूंढने पर भी नहीं मिल रहे हैं. चार जिलों में ही 25 हजार से अधिक एसएचजी लुप्त या मृतप्राय हो गये हैं. इस संबंध में उप विकास आयुक्तों ने सरकार को जो रिपोर्ट दी है. वह काफी चौंकाने वाली है.
उप विकास आयुक्तों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वास्तव में बहुत से स्वयं सहायता समूह मृत या विलुप्त हो चुके हैं जिनके नाम एवं खाता आदि की जानकारी नहीं मिल रही है. समस्तीपुर के उप विकास आयुक्त ने रिपोर्ट दी है कि उनके जिलों में करीब 7000 समूह विलुप्त हो चुके हैं. इसी तरह दरभंगा के उप विकास आयुक्त ने बताया है कि उनके जिले में 13,674 स्वयं सहायता समूह हैं, लेकिन जब इसकी मैपिंग की गयी तो मात्र 3256 स्वयं सहायता समूहों के नाम और खाते मिले हैं. शेष 10,418 समूहों के पता और उनके खाता की कोई जानकारी नहीं है.
जमुई के डीडीसी ने रिपोर्ट दी है कि उनके जिले में 5077 स्वयं सहायता समूह है परंतु मैपिंग में मात्र 1182 समूहों के नाम और खाते मिले हैं. जमुई में भी 3895 समूह लुप्त हो गये हैं जिसके नाम और खाता की जानकारी अभी तक सरकार को नहीं मिली है. सहरसा के उप विकास आयुक्त की रिपोर्ट अनुसार उनके जिले में स्वयं सहायता समूहों की संख्या 5704 है लेकिन जब इनकी मैपिंग की गयी तो 2090 स्वयं सहायता समूहों के ही नाम-पता और उनके बैंक खाते मिले. शेष 3614 समूह लुप्त हो गये हैं.
बिहार में स्वयं सहायता समूहों के गठन की जिम्मेवारी विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं को दी गयी है. प्रत्येक समूह में दस-दस महिलाएं शामिल होती हैं. इन महिलाओं में एक समूह की अध्यक्ष और एक सचिव चुनी जाती हैं. साथ ही समूह का अपना एक नाम भी होता है जिसके नाम पर बैंक में खाता खोला जाता है. महिलाएं संबंधित स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़कर बैंकों में अपनी पूंजी जमा करती हैं. समूह में शामिल सभी महिलाएं प्रत्येक सप्ताह दस-दस रुपये जमा करती है. लुप्त हो गये 25 हजार स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की संख्या जोड़ ली जाये तो इनकी संख्या 2.5 लाख हो जाती है. ये महिलाएं प्रत्येक सप्ताह 10-10 रुपये जमा करती है.
इस तरह प्रत्येक सप्ताह ये महिलाएं 25 लाख रुपये जमा करती थी और एक महीने में यह राशि एक करोड़ हो जाती है. अगर एक साल भी ये स्वयं सहायता समूह कार्यरत रहा होगा तो इनकी जमा 12 करोड़ रुपये से अधिक हो जाती है. सवाल उठता है कि यह 12 करोड़ रुपये कहां गये? किसने खाया और सरकार से मिलने वाली अनुदान की राशि कहां गयी है? आजीविका के निदेशक इन स्वयं सहायता समूहों को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे थे लेकिन जिलों से आयी रिपोर्ट ने उनके दावों की पोल खोल कर रख दी है.
बिहार में स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, महिला विकास निगम और जीविका के माध्यम से स्वयं सहायता समूह गठित किये जाते हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने 2012 से स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना को बंद कर आजीविका मिशन की शुरुआत की है. सरकार ने इन्हीं योजनाओं द्वारा गठित स्वयं सहायता समूहों का डाटाबेस तैयार करने का निर्णय लिया है. इसके लिए जब समूहों की मैपिंग की शुरुआत की गयी तो कई रोचक तथ्य सामने आने लगे हैं.
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