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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

अपनी कब्र को न्योता देते हैं.....


औरों के लिए खड्डे खोदने वाले !!!


लोग कहीं भी, कुछ भी कर गुजरने का मादा रखते हैं। लोगाें की दो किस्में हुआ करती हैं। एक वे हैं जो वे ही काम करते हैं जो उनके लिए निर्धारित होता है या जो अच्छे इंसान के रूप में उन्हें करना चाहिए। दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जो अपने लिए निर्धारित काम तो नहीं करते हैं बल्कि वे सारे काम करने के आदी हो जाते हैं जो काम उन्हें कभी नहीं करने चाहिएं। बल्कि याें कहें कि इस किस्म के लोग वे सभी उल्टे-सीधे काम करते हैं जो न उनके लिए अच्छे हैं, न औरों के लिए। बल्कि इन सभी लोगाें को वे ही काम रास आते हैं जो औराें को दुःखी करने के लिए ही होते हैं। अपनी ड्यूटी, फर्ज और घर-परिवार के तथा समाज एवं क्षेत्र के लिए निभाये जाने वाले कायोर्ं को एक तरफ रखकर ये लोग औराें की जिन्दगी में बेवजह झाँकने, दूसरों का अपने हक में शोषण की हद तक इस्तेमाल करने, अपने नाजायज काम में मदद नहीं करने वाले तथा परापकारी गतिविधियों में समर्पित भाव से जुटे हुए लोगाें के लिए कई तरह की बाधाएं पहुंचाने में अपने आपको समर्थ महसूस करते हुए अपने विध्नसंतोषी कार्यों पर जिन्दगी भर गौरव का अहसास करते रहते हैं।

अपने आस-पास की बात हो या अपने पूरे इलाके की, या फिर देश के किसी भी क्षेत्र की, हर जगह ऎसे महान-महान लोगाें का बाहुल्य है जो औराें के लिए खड्डे खोदने में इतने माहिर हैं कि इनके हुनर को वह हर आदमी सलाम करने को मजबूर हो ही जाता है जो उनके क्षेत्र का अनुभवी और पुराना हो। औरों के लिए जब चाहे जहां चाहे, वहाँ ये लोग खड्डे खोदने में इतनी महारत रखते हैं कि खदान श्रमिक तक इनके आगे पानी भरने लगें। ये लोग यदि खड्डा खोदने वाली कंपनी में होते तो इन्हें अपने इस अकेले हुनर के बूते नोबेल पुरस्कार का ही हकदार मान लिया जाता। खड्डा खोदने वाले इन खड्डूओं के लिए उन्हीं की तरह के दूसरे खड्डूजी हर कहीं मिल ही जाते हैं जो उन्हीं की तर्ज पर काम करते हुए औरों के लिए खड्डे खोदने में ही लगे रहते हैं और अपने इसी नायाब हुनर से ताजिन्दगी आनंदरस का पान करते रहते हैं। लगातार नकारात्मक और विध्वंसकारी गतिविधियों में रमे हुए इन लोगों का काम सड़काें के सदाबहार पेचवर्क की तरह वषार्ें व दशकों तक चलता रहता है।

खड्डे ही खड्डे खोदते रहने की इस लम्बी जीवन यात्रा में इनके लिए कोई न अपना है न पराया। इनके अपने और परायों की परिभाषाएं बदली हुई होती हैं वहीं देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप ये परिभाषाएं बदलती ही रहती हैं। खड्डू लोगों के लिए वे ही लोग अपने हैं जो उनके गैर जरूरी अथवा नाजायज कामों में सहयोग देने वाले हैं अथवा इनके काले कारनामों के प्रति जानकार लोग सब कुछ जानते-बूझते हुए भी आँखें मूंदे चुपचाप बैठे रहें। हर इलाके में बिराजमान और सतत सक्रिय इस किस्म के लोग समाज-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी टाँग फसाने के आदी होते हैं। इनके आस-पास के, सम्पर्कित तथा इनके अपने इलाके या इनके कार्यक्षेत्र के कोई भी लोग इनके नापाक और विध्वंसक गतिविधियों से शायद ही बच पाते हैं क्योंकि ये लोग पहले हमला उन लोगाें पर बोलते हैं जो उनके करीब हुआ करते हैं।

इसका मूल कारण यह है कि इनकी कारगुजारियों का पता लग पाने तक भी करीबी लोग इन्हें अपने होने का भ्रम पाले रहते हैं। अपने करीबियों के प्रति भ्रम का माहौल बनाने में माहिर ये लोग दो तरफा काम करते है। चूहों की तरह घुसपैठ कर सुरंग बनाने से लेकर औरों के लिए बड़े-बड़े खड्डे खोदने तक में ये कुशल शिल्पी की भूमिका अदा करते हैं। अपने पूरे जीवन में ये लोग कोई रचनात्मक कार्य कर पाएं या नहीं, मगर औराें के लिए खड्डे खोदने का काम बखूबी करते ही रहते हैं जैसे कि यही उनके जीवन का सर्वोपरि और अंतिम लक्ष्य हो। एक सीमा तक ये अपने इन लक्ष्यों में एक आयु तक सफल रहते हैं लेकिन जब सभी जगह इनकी कलई खुल जाती है तब इनका खड्डू कर्म दूसरा रास्ता इखि़्तयार कर लेता है। जीवन के अंतिम पड़ाव तक इनकी पूरी जिन्दगी खुद की खड्डेदार हो जाती है। इस अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें अपने कुकर्मों का अहसास भले ही न हो पाए, मगर इनका पूरा परिवेश धुंधला होना शुरू हो जाता है और ऎसे में इनके पुण्यों का क्षय इतना हो जाता है कि नियति व ईश्वर भी इस किस्म के लोगाें से किनारा करने लगते हैं।

औरों के लिए खड्डे खोदने वाले लोगों के लिए एक समय आ ही जाता है जब उनके लिए भी खड्डा आकार लेने लगता है। इस स्थिति में ऎसे लोगों को संरक्षण देने तथा इनकी वाहवाही करने वाले लोगाें को भी विवश होकर इनसे किनारा कर ही लेना पड़ता है। इसके साथ ही वे लोग भी इनके लिए बन जाने वाले खड्डों के किनारे जमा हो जाते है। खड्डू लोगाें के लिए जीवन का सर्वाधिक विषादग्रस्तयही समय होता है जब उनके लिए कई ऎसे खड्डाें का यकायक जन्म हो जाता है और ऎसे में इन खड्डूओं को भी पता नहीं रहता कि उनके भाग्य के लिए कौनसा गड्ढा निर्धारित है। दूसरों के लिए खड्डे खोदने वाले इन अजीब किस्म के लोगाें को जीवन के इस मोड पर आने के बाद यह ज्ञान अच्छी तरह हो जाता है कि उनके जीवन भर के कामों के नकद भुगतान का समय अब आ चुका है। पर इस प्रतिफल का वक्त आसन्न होने के बावजूद ये कुछ नहीं कर पाते हैं और अन्नतः खड्डों की स्मृति को साथ लेकर वहां पहुंच जाते हैं जहां से आये हुए होते हैं। वहां भी विधाता ऎसे खड्डूओं की प्रतीक्षा मे बेसब्र होता है उनकी अगली यात्रा की भूमिका के साथ।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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