विद्वानों के अनुभवों का लाभ लें, वरना भटक जाएगा यह समाज - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

विद्वानों के अनुभवों का लाभ लें, वरना भटक जाएगा यह समाज


दुनिया का विकास ज्ञान और अनुभवों से भरे समृद्ध अतीत की वेगपूर्ण धाराओं से होता है। समाज-जीवन का कोई सा क्षेत्र हो, या फिर घर-परिवार और समुदाय से लेकर परिवेश, क्षेत्र और दुनिया। हर कहीं विकास की निरन्तरता के दर्शन सहज ही होते हैं और उसी अनुपात में आगे बढ़ते ही रहने की भूख। विकास और बहुआयामी तरक्की को सही अर्थों में तभी प्राप्त किया जा सकता है जब हमारे पास ज्ञान और अनुभवों का भण्डार हो तथा कर्म क्षेत्र विशेष से जुड़े विशेषज्ञों एवं विद्वजनों की फौज। ऎसा होने के साथ ही हममें दुनियावी आविष्कारों को अपने हुनरों के साथ जोड़ पाने की विलक्षणता भी जरूरी है। लेकिन आज हम इस मामले में बेहद पिछड़ते ही जा रहे हैं और इसका मूल कारण या दोषी विदेशी या पराये लोग नहीं हैं बल्कि हम लोग ही हैं जिनकी मूर्खताओं और गलतियों की वजह से आगे कुछ नहीं हो पा रहा है। आज हमारे बचपन से लेकर पचपन पार तक जो भी गतिविधियां होने लगी हैं उनमें सभी स्थानों पर तथा तमाम अवसरों पर विद्वानों, विषय विशेषज्ञों और अनुभवियों की उपेक्षा या बेकद्री ही हो रही है।

समाज या क्षेत्र में कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई अवसर हो, उन अवसरों को लाभदायी और यादगार बनाने के साथ ही हमें यह भी देखना चाहिए कि कोई सा अवसर हो, मात्र औपचारिकता निर्वाह ही बनकर न रह जाए बल्कि हर अवसर या आयोजन का लाभ लक्ष्य समूह और समुदाय को अवश्य ही मिलना चाहिए तभी आयोजनों और अवसरों की महत्ता है वरना केवल औपचारिकताएं निभाने के लिए ही आयोजनों को आकार दिया जाए, इससे तो अच्छा यही हो कि ऎसे निरर्थक आयोजन हों ही नहीं। अपना भी समय बचेगा और दूसरों को भी अपना अमूल्य समय गँवाने की विवशता नहीं रहेगी। कुछ दशकों पहले तक समाज में उन लोगों की कद्र हुआ करती थी जो किसी न किसी क्षेत्र में महारत रखा करते थे और उनके पास ज्ञान तथा अनुभवों का जखीरा हुआ करता था जो विभिन्न अवसरों व आयोजनों पर समुदाय में बाँटते थे और समाज की नई पीढ़ी को इनके ज्ञान तथा अनुभवों से सीख लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा का संचरण भी होता था। असल में उन दिनों के आयोजन प्रेरणा जगाने और हुनर को नई गति प्रदान करने के अवसर हुआ करते थे। जो ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त करते थे उन्हें भी अपनी जिन्दगी को सुनहरा बनाने के गुर सीखने को मिलते थे जहां जो लोग गुर सिखाया करते थे उनके मन में भी समाज को कुछ न कुछ देते रहने का सुकून बना रहता था।

इसे वर्तमान हालातों की विड़म्बना कहें या कलिकाल का घातक प्रभाव, आजकल विद्वानों और अनुभवियों की कोई पूछ नहीं रही। हर कहीं अपने स्वार्थ और ऎषणाओं को पूरा करने का भूत सवार है और ऎसे में आजकल समाज की अनुभवी ताकत माने जाने वाले बुजुर्ग, अनुभवी और विद्वान लोगों की स्थिति करीब-करीब उपेक्षित सी ही है। अपने क्षेत्र या परिवेश में कोई सा अवसर हो, आयोजन हो, इनकी भागीदारी नगण्य रहने लगी है। समाज के विभिन्न आयोजनों में विषय विशेषज्ञों, अनुभवियों और विद्वानों की सहभागिता का पर्याप्त ध्यान रखा जाकर ही समाज को विकास की स्वस्थ दिशा-दृष्टि प्रदान की जा सकती है।  इनकी उपेक्षा करते हुए विकास की बातें सोची जाएंगी तो वह विकास भौतिक विकास होगा जिसमें न मनुष्यता की गंध होगी और न ही उपादेयता भरी महक। उस विकास का कोई औचित्य या अर्थ नहीं है जिसमें सिर्फ ढाँचों को खड़ा कर दिया जाए और उसमें रहने वालों के भीतर न कोई परंपरागत ज्ञान रहे, न अनुभवों का रस, और न ही व्यक्तित्व के सुनहरे रंग। भौतिक विलासिता और स्वार्थों के मायाजाल ने समाज से ज्ञान और अनुभवों के चंदन को लील लिया है और इसी का खामियाजा हम यह भुगत रहे हैं कि हम अपने परंपरागत काम-धंधों और आत्मनिर्भरता देने वाले कारकों को छोड़-छाड़ कर इतने परावलंबी हो गए हैं कि परायी ताकत या उपकरणों का योग हमें न मिले तो एक दिन चैन से न जी पाएं।

इतना पराश्रित होकर हम कहाँ किस दुनिया में जा रहे हैं, हमें ही पता नहीं है। अंधेरों ने आहट सुना दी है। हम आज दुनियावी परायी ताकत पर जैसे-तैसे जी लेने का माद्दा पैदा भले ही कर लें, जब तक हमारा अपना आत्मनिर्भरतादायी तंत्र नहीं होगा तब तक हमारे जीवन में तरक्की का कोई वजूद नहीं है। आज भारतवर्ष में हर क्षेत्र में एक से बढ़कर एक अनुभवी, ज्ञानवान और हुनरमंद लोग मौजूद हैं लेकिन हम उनका कितना सम्मान कर पा रहे हैं, यह प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए। हम कोई सा आयोजन करें, हमें सिर्फ वे ही चेहरे दिखते हैं जिनसे हमारा उल्लू सीधा होता है, वैध-अवैध धंधों को बरकत मिलती है, हमारे अपराधों या कुकर्मों को ढंक पाने का संरक्षण मिलता है और हमारे निकम्मेपन के बावजूद हमें अपनी इच्छा से मनचाही जगह बने रहने के लिए आश्रय प्राप्त होता है। हमारे समुदाय से लेकर अपने क्षेत्र की ही बात कर लें। हमारे इलाकों में कितने वैज्ञानिक, पंडित, वैद्य, डॉक्टर, इंजीनियर, अनुभवी बुजुर्ग, शिक्षाविद, अर्थशास्त्री, साहित्यकार, लेखक, दार्शनिक, सफलतम व्यवसायी, बैंकर्स, ज्योतिर्विद, पुरोहित, अध्यात्मविद, इतिहासकार और हर क्षेत्र में नाम कमा चुके हुनरमंद तथा अनुभवियों की पूरी की पूरी जमात है लेकिन इनका हम उपयोग क्यों नहीं कर पा रहे हैं, हमने इस वर्ग की निरन्तर उपेक्षा क्यों कर रखी है तथा इनके अनुभवों और ज्ञान को हमने उपेक्षित क्यों कर रखा है? इस प्रश्न का जवाब सीधे तौर पर हमारे स्वार्थों से जुड़ा है।

हममें से कोई भी यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि हमारी जिन्दगी अब सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग और मनचाहे स्थान पर जमे रहने से लेकर अपने धंधों को चलाने तथा अपने क्षुद्र स्वार्थों तक ही घिर कर रह गई है। ऎसे में हमें उन विद्वानों और अनुभवियों से क्या कुछ मिलने वाला है?  हमने अपने स्वार्थों में लिप्त होकर समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी को भुला दिया है। हमारी नई पीढ़ी इन विद्वजनों और अनुभवियों का लाभ लेकर अपनी तकदीर सँवार सकती है, इनसे प्रेरणा पाकर समाज का भला हो सकता है। लेकिन हम इस बारे में कभी नहीं सोचते। हमारे सोचने की क्षमता तक खत्म होती जा रही है। हो भी क्यों नहीं, हमने अपनी जिम्मेदारियों को भुला दिया है और उन लोगों के पीछे पागल होते जा रहे हैं जिनसे सिर्फ भौतिक विलासिता की ही उम्मीद की जा सकती है।

इन तमाम स्थितियों से उबरने का एकमात्र उपाय यही है कि समाज-जीवन और क्षेत्र में कोई सा आयोजन हो, कोई सा अवसर हो, उससे संबंधित विषय विशेषज्ञ और विद्वानों तथा अनुभवियों को सम्मान निमंत्रित करें और उनके ज्ञान तथा अनुभवों का लाभ पाने का प्रयास करें। इन आयोजनों में आमंत्रित अतिथियों को भी चाहिए कि वे स्वयंभूत्व से ऊपर उठकर तमाम प्रकार के आयोजनों में उन लोगों की भी भागीदारी का ख्याल रखें जिन लोगों के पास उस विषय विशेष के बारे में अनुभवों और ज्ञान के भण्डार हों। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि समाज के बुजुर्गों, अनुभवियों और विद्वानों का लाभ हमें और हमारी नई पीढ़ी को पूरा-पूरा मिले। इसके लिए हमें हमारी दकियानुसी और स्वार्थी मानसिकता को तिलांजलि देकर समाजहित में सोचना होगा। समाज के ज्ञान और अनुभवों के भण्डारों का उपयोग हो जाने पर जो विकास होगा उसमें माटी की सौंधी गंध भी होगी और हवाओं को भी यह तरक्की पसंद आएगी।







---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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