ब्रज की होली : होरी नाय जी होरा है दाउजी का हुरंगा है. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

ब्रज की होली : होरी नाय जी होरा है दाउजी का हुरंगा है.


दाउजी के मंदिर मेें इन्द्रधनुषीय छटा के मध्य प्रसिद्ध हुरंगा मेला, चंहुओर रंगो की वर्षा


बलदेव। ब्रज की विष्व प्रसिद्ध होली का बरसाने के बाद दूसरा बडा आयेाजन बलदेव का हुरंगा आज इंद्र धनुषीय छटा के साथ मनाया गया हुरंगे का आनंद लेने के लिये दाउजी मंदिर में दर्षकों की अपार भीड एकत्रित हो गई थी हर कोई हुरियारों व हुरियारियों के होली खलने के एक एक अदभुत नजारे को अपनी आखाों में कैद कर लने चाहता था। भंग की उमंग में पंडा व पुरेाहित समाज के उत्साही पुरूषों ने ब्रज के राजा बलदाउ की जय जय कार के मध्य जहाॅं हुरियारिनों से जमकर कोडे खाये वहीं मीठी मीठी सिसकियाॅं भरते हुये उन्हैं रंगों में सराबोर किया प्रसिद्ध हुरंगे का देष विदेष के हजारों लोगों ने अपूर्व आनंद उठाया ब्रज के इस सबसे बडे मेले पर पुलिस व प्रषासन को शान्ती व्यवस्था बनाये रखने में मषक्त करनी पडी ब्रज के राज श्री दाउजी महाराज के हुरंगे को देखने के लिये कल से ही लोगों का आवागमन हो गया था जो दोपहर तक जारी रहा तीर्थ यात्रियों के टोल की टोल दाउजी महाराज की जयकारों के मध्य मंदिर प्रागंण में समाते जा रहे थे। 

पूर्वाहन तक मंदिर प्रांगण की छत से लेकर छज्जों तक बैठने के लिये कहीं जगह शेष नहीं बची थी। अधिकांष लोग स्थाना भाव के चलते मंदिर प्रांगण में खडे होकर हुरंगे को देखने उत्सुक दिखाई दिये । मंदिर प्रांगण में बने तुलसी चबूतरा पर भगवान बलराम व भगवान श्री कृष्ण व माता रेवती के साथ प्रतिकात्मक रूप से विराजमान थे। पंडा समाज के द्वारा प्रातः भगवान की आरती उतारने के साथ ही भंग व ठंडाई का भोग लगाया गया इस प्रसाद को सभी भक्तों को वितरण किया गया इधर मंदिर प्रांगण में रसिया व होली की धमारों के स्वरगुजांयमान होने प्रारंभ हो गये मंदिर के तीन मुख्य द्वारों से हुरियारिनों के टोल के टोल ब्रज के लोक गीत गाते हुए जिस समय मंदिर प्रांगण में प्रवेष किया तो श्रद्धालुओं को ध्यान बरवष ही उनकी ओर मुखातिब हो गया सूर्य की लालिमा छोड तपिष पकडने के साथ ही मंदिर प्रांगण में नगाडों व नफीरी व डाल व मृदंग की गगन भेदी आवाज के साथ ही मंदिर के मन भावन परिधानों सजे गोप गोपिकाओं के झुण्डों के साथ ही रसिया के स्वर गुंजायमान होने लगे देष विदेष आये तीर्थ यात्री हैरतअंगेज में पड गये कि आज के बदलते परिवेष में भी महिलाऐं लंहगा फरिया व बजनी बिछुआ धारण किये हुये परंपरागत ब्रज के परिधानों की छवि प्रस्तुत कर रही है। हुरियारे व हुरियारिनें ढप ढोल व मजिरों को धुन पर थिरकने लगे महिला पुरूष बाल गोपाल सभी मस्त दिखाई पड रहे थे। कुछ लोग ब्रज के राज बलदेव के आयुध हल व मूसल को हाथों में लेकर नृत्य में तल्लीन थे। उस समय उन्हैं इंतजार केवल हुरंगे के प्रारंभ होने का इंतजार था। मंदिर में बैठै प्रत्येक श्रद्धालु की नजर ठाकुरजी के उपर लगी हुई थी। कि कब मंदिर के पट खुलें और शुरू हो मदमाती होली जो कि हुरंगा के रूप में धुलहडी के एक दिन बाद पंरम्परागत रूप से होता है। 

जयकारों के मध्य पंरमपरा गत रूप से मंदिर के कपाट खुले और भगवान बलदाउ कृष्ण व माता रेवती की  छवि ऐसी प्रतीत हो रही थी कि मानो राजभोग के दर्षन हो रहे हों वे इषारा कर रहे हों कि हुरियारों व हुरियारिनों प्रारंभ करो हुरंगा होली खेलने वालों ने पहले स्वेत धवल श्रंगार में सजे भगवान के स्वरूप को निहारा दुर्लभ दर्षनों को हृदय में संजोकर संगीत के माध्यम से बलदेव जी को सर्वप्रथम होली खेलने का आमंत्रण दिया गया । ‘बलराम कुमार होरी खेलें कू, भइया खेले होरी फाग‘ इसी के साथ प्रारंभ होगया पदगायन और हुरंगा । ‘‘होरी नाय हुरंगा है, के स्वरों के साथ गोप समूह मंदिर प्रांगण में बने विषाल होजों की तरफ लपकते दिखाई दिए वे टेसू के रंग से भरे होजों से बालटियाॅं भर भरकर गोपिकाओं को रंगों में सराबोर करने को उत्सुक दिखे । सैकडा हुरियारे व हुरियारिनों के उपर मंदिर प्रांगण में बने तीनों होजों के रंग को जिस तरह से उडेल रहे थे, लेकिन हौज खाली होने का नाम नहीं ले रहे थे। लगातार तीन ट्यूबलों से निरंतर होजों में जलापूर्ति दी जा रही थी। उनमें रंग घोला जा रहा था पूरा मंदिर प्रांगण कुछ ही क्षणेंा में केसरिया रंग ढूबने लगा इस बीच छज्जों से कुछ युवक गुलाल की वर्षा करने में लग गये वे गा रहे थे। ‘‘ उडत गुलाल लाल भये बदरा‘‘ किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे छज्जों पर 10 कुतंल, 2 कुंतल भुड भुड लेकर बैठे थे इस दृष्य को नयनों में कैद करने को आतुर श्रद्धालु मदमाती होली को निहारने में लगे थे। कि तभी उनका सामना दूसरे दृष्य से हुआ अब हुरियारिनों की बारी थी। 

रंगों से सराबोर गोपिकाऐं ग्वालों के वस्त्र को फाडकर उनके पोतना ‘‘कोडे‘‘ बनाकर उनकी नम्रता पूर्वक पिटाई करने लगी । देखने में तो लग रहा था जैसे महिलाऐं रंग डालने पर आक्रोष स्वरूप हुरियारों की पिटाई कर रही हों लेकिन वास्तव में वह कोडे प्रेम के रंग में सरोबर होने के कारण फूलों की मार की मानिंद लग रहे थे तभी तो मार खाने के बाद भी हुरियारों के चेहरे पर चमक बरकरार थी। हुरंगे में फागुन ज्येष्ठ कहे भाभी जैसी कहावत भी चरितार्थ हो रही थी जहाॅं हर महिला व पुरूष अपनी ही मस्ती में मस्त था। उसे इस बात का कोई गिला नही था कि पास में ज्येष्ठ या सुसुर भी खडे होंगे सभी हुरियारों के बदन से कपडे फटने लगे और वे समूह में खडे खडे केवल धोती या पाजामा में नंगे दिखने लगे । नंगे बदन पर पडते कोडों को देख दर्षक रोमांचिक दिखाई दे रहे थे। इसके बाद प्रारंभ हुई झंडा परिक्रमा हुरियारे समूह में झंडा लिये मंदिर में प्रांगण में ही गाते हुए परिक्रमा कर रहे थे। ‘‘मत मारेै दृगन की चोट, रसिया होरी में लग जाइगी‘‘ माता रेवती व बलदाउ जी के अलग अलग झंडे को लिये हुरियारे परिक्रमा दे रहे थे उनके पीछे चल रही थी हुरियारिनें वे इस झण्डे को छीनने का प्रयास कर रहीं थीं । अनेक उत्साही युवक ही नहंी बल्कि प्रोड भी सैकडों पोतनों की मार खाने के बावजूद भी प्रषन्नचित दिखाई दे रहे थे। गोपिकाओं की ओर से उडते रसिया के स्वर‘‘ हारी रे गोरी घर चलीं, जीत चले ब्रज वाल‘‘ के उलाहना भरे स्वर जैसी ही प्रफुल्लित हुये, हरियारिनों में उत्साह भर आया वे आखिर हुरियारों से झण्डा छीनने के बाद यषोगान कर रहीं थीं। ‘‘ हारे रे रसिया घर चले जीत चलीं ब्रज रानी,‘‘ और इसी के साथ समाप्त हुआ बलदेव जी का हुरंगा । इस अवसर पर मथुरा से अधिकांश जज, जिला जज, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मथुरा, एसडीएम महावन, एडीएम अवधेश तिवारी, एसपी ग्रामीण, सीओ महावन, प्रशिक्षु आपीएस राहुल पाण्डेय, आदि मुख्य रूप से उपस्थित थे । इस अवसर पर मंदिर रिसीवर संतोष शर्मा एडवोकेट द्वारा बाहर से आये श्रद्धालु व अधिकारियों का आभार व्यक्त किया । 



(चन्द्रप्रकाश पाण्डेय)



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