उत्तराखंड की खबर (15 अप्रैल) - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 15 अप्रैल 2013

उत्तराखंड की खबर (15 अप्रैल)


सरकार को न्यायालय में भारी पड़ सकता है देर से जारी अध्यादेश!
भाजपा शासनकाल में भी हुए हैं ऐसे कई मनोनयन: हरक

देहरादून, 15 अप्रैल।। सरकार ने जिस अध्यादेश का सहारा लेकर बीज एवं तराई निगम, बीज प्रमाणीकरण एजेंसी एवं उपनल के अध्यक्ष पद पर तैनात कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह को बचाने के लिए जिस तरह के प्रयास किये है, वह सरकार को न्यायालय भारी पड़ सकता है। भाजपा द्वारा बवाल मचाए जाने के बाद आखिर एक साल बाद सरकार को इन पदों को लाभ के दायरे से बाहर करने की आवश्यकता क्यांे पड़ी? यह एक सबसे अहम सवाल है, जिसे लेकर भाजपा न्यायालय का रूख कर सकती है। हमेशा सरकार हरक सिंह रावत के बचाव में यहीं कहती आई है कि जिन पदों पर डा. हरक तैनात है वह लाभ के पद के दायरे में नहीं आते है। इस मामले को लेकर पिछले चार महीने से विपक्ष दल भाजपा द्वारा सरकार की सड़क से लेकर सदन तक घेराबंदी की जा रही है, भाजपा द्वाराराज्यपाल से लेकर चुनाव आयोग तक वह इसकी लिखित शिकायतें की जा चुकी हैं। जो सरकारी रिकार्ड में शामिल है। वहीं अब सरकार का यह कहना कि सरकार ने अपने मंत्री के बचाव के लिए यह अध्यादेश नहीं लाया है, तो यह अपने-आप में एक बहुत बड़ा झूठ होगा। कानूनविदों का कहना है कि विधायिका को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन विधायिका मनमाने तरीके से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लघंन नहीं कर सकती। इससे पहले भी इस तरह के अध्यादेशों को पूर्व समय में भी कोर्ट में चुनौतियां दिये जाने की मामलों में सरकार को हार का मंुह देखना पड़ा है। एक ही दिन में पांच पदों को सरकार ने जिस तरह से बैक डेट से लाभ के पदों के दायरे से बाहर किया है, यह सरकार के उस कमजोर पहलू को उजागर करता है जिसे छिपाने में सरकार ने ताना-बाना बुना। सत्ता में बैठे  लोगों द्वारा अपने इस गलत कार्य को सही ठहराने के लिए अध्यादेश लाना वास्तव में एक गलती को छिपाने के लिए दूसरी गलती करने जैसा काम है। सत्ता में बैठे लोग और मुख्यमंत्री बार-बार यह कहते आ रहे हैं कि हरक सिंह ने इन पदों पर रहते हुए वेतन भत्ते या लाभ के पदों पर मिलने वाले कोई भी सुविधा नहीं ली है, को भी कानूनविद सही नहीं मानते। क्योंकि ऐसा कोई भी पद जिसके लिए वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं लेने का प्रावधान हो वह सभी लाभ के पद के दायरे में आते है संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पद जिन पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति को प्रशासनिक शक्तियां प्राप्त हो भले ही वह वेतन भत्तों का लाभ ले न ले ऐसे पद भी लाभ के दायरे में है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर भी लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है कि जब हरक सिंह की नियुक्ति इन पदों पर हुई थी उस वक्त यह पद लाभ के दायरे में थे या नहीं। वर्तमान समय में जिन पदों को लाभ के दायरे से मुक्त किया गया है

वह पद इस समय लाभ के पदों के दायरे में थे जब हरक सिंह की इन पर नियुक्ति की गयी थी। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष भाजपा ने सख्त रूख अपनाते हुए अब इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दिये जाने के बात कहीं जा रही है। यदि भाजपा अपनी जिद पर अड़ी रहती है तो कानूनी दृष्टिकोण से भाजपा का पक्ष अत्यंत मजबूत है सरकार का वर्तमान अध्यादेश कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठहराया जा सकता है और डा. हरक सिंह को विधानसभा की सदस्यता से हाथ भी धेना पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर डा. हरक सिंह रावत का कहना है कि भाजपा बिना वजह मामले को तूल दे रही है, उनके शासनकाल में भी उन्होंने अपनी सुविधा के अनुसार कई अध्यादेश पारित किए, इतना ही नहीं उनके शासनकाल में भी ऐसे कई लोगों का मनोनयन एक साथ कई पदों पर रहा है। उस समय भाजपा को अपनी गलती नजर नहीं आई, जो अब वह इस मामले को लेकर हो-हल्ला मचा रहे हैं। 

विद्रोह पहुंचाएगा भाजपा-कांग्रेस को नुकसान!

देहरादून, 15 अप्रैल। यूं तो गुटबाजियों के कारण कई बार भाजपा और कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा है, तो अब सूबे में टिकट बटवारे को लेकर शुरू हुए विद्रोह के कारण दोनों ही पार्टियों में बैचेनी का माहौल बना हुआ है। हालांकि दोनों ही पार्टियों में टिकट बंटवारे के साथ ही डैमेज कंट्रोल की कसरतें भी फार्म पर है, लेकिन टिकट न मिलने से असंतुष्ट पार्टी कार्यकर्ताओं ने चुनाव में कहीं न कहीं विद्रोह कर दोनों ही पार्टियों के सियासी समीकरणों को बिगाड़ने का कार्य तो जरूर करेंगे। प्रदेश में होने वाले निकाय व निगम चुनाव को लोकसभा चुनाव का सेमीफाईनल माना जा रहा है, वहीं इन चुनावों में भाजपा और कंाग्रेस की अंदरूनी हालात कमोबेश एक से ही है। दोनों ही पार्टियां गुटबाजियों के कारण पहले ही परेशानियों से जूझ रही थी तो अब इस चुनाव में टिकट बटवारे को लेकर उपजा विद्रोह दोनों ने पार्टियों को भितरघात के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। हालांकि दोनों ही पार्टियां द्वारा ड्रैमेज कंट्रोल की हर संभव कोशिश में की जा रही है, लेकिन टिकट बंटवारे से कार्यकर्ताओं में उपजा रोष कहीं न कहीं तो इन पार्टियों को नुकसान पहुंचाएगा, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन बावजूद इसके इन मैदानी निकायों को छोड़कर जहां बसपा ने भी उपस्थिति दर्ज की है, अन्य में भाजपा की स्थिति कांग्रेस से काफी बेहतर है। दरअसल वैसे तो टिकट बटवारे को लेकर ही दोनों पार्टियों में अंसतुष्टों का विद्रोह सतह पर आया है, लेकिन इस मामले में भी भाजपा और कंाग्रेस की अन्दरूनी स्थितियां एक जैसी नहीं है। भाजपा की बात की जाए तो भाजपा में जहां दिग्गजियों के चहेतों को टिकट न मिलने से असंतोष और विद्रोह है, वहीं कुछ मामलों में विद्रोह ने पार्टी अनुशासन को भी खंडित किया है, लेनिक इस परोक्ष विद्रोह से पार्टी में आए डैमेज को हाईकमान अपने स्तर पर कोशिश कर थाम भी सकती है। इधर दूसरी ओर कांग्रेस में भले ही विद्रोह सतह पर उतना न नजर आ रहा हो जितना भाजपा में आ रहा है, लेकिन हकीकत में कांग्रेस में विद्रोह गुपचुप ढं़ग से बढ़ता जा रहा है, इस गुपचुप सियासत की अहम वजह है कि कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की गाइड लाइन्स को धरातल पर उतारते हुए दिग्गजियों के खून के रिश्तेदारों को टिकट देने से किनारा काट लिया। पार्टी के इस रूख से सरकार में काबीना मंत्री यशपाल आर्य और इंदिरा हृदयेश के साथ ही अन्य बड़े नेताओं को झटका लगा, वहीं भले ही सरकार में बैठे होने की वजह से उन्होंने विद्रोह की हदें न पार की हो, लेकिन पार्टी नेतृत्व का यह फैसला इन नेताओं को किसी हद तक भा रहा है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इन नेताओं की यह नाराजगी निकाय चुनाव मेंपार्टी प्रत्याशियों के खिलाफ जरूरी माहौल बनाएगी। 

मनोरमा ने वापस लिया नामांकन, कांग्रेस ने ली राहत की सांस

देहरादून, 15 अप्रैल। पूर्व मेयर मनोरमा शर्मा डोबरियाल कांग्रेस से मेयर का टिकट काट जाने के बाद बागी तेवर दिखाने के बाद आखिर मान ही गई। उन्होंने मेयर पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भरा अपना नामांकन वापस ले लिया और कहा कि वह पार्टी का सम्मान करती है और वह किसी भी लालबत्ती और बड़े पद पर नहीं रहना चाहती। वहीं उनके नाम वापस लेने से कांग्रेस ने राहत की सांस ली है। पूर्व मेयर मनोरमा शर्मा डोबरियाल ने नगर निगम के मेयर पद के लिए कांग्रेस से टिकट के लिए अपनी दोवदारी ठोकी थी, इसके लिए उन्होंने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य के साथ ही आलाकमान के कई नेताओं से आग्रह भी किया था, लेकिन पार्टी ने कोई भी सकारात्मक पहल नहीं की और मेयर का टिकट सूर्यकांत धस्माना को दे दिया। इस बीच मनोरमा शर्मा डोबरियाल ने सोनिया गांधी को भी पत्र लिखकर मेयर के टिकट पर अपनी दावेदारी की थी, इस पर उन्होंने एक महिला होने और पूर्व मेयर पद पर रहते हुए अपने द्वारा किए गए विकास कार्याें के साथ पार्टी में अपने योगदान का भी हवाला दिया था, लेकिन सोनिया गांधी ने यह मामला प्रदेश कांग्रेस कमेटी पर छोड़ दिया था। पार्टी द्वारा धस्माना को टिकट दिए जाने के बाद मनोरमा शर्मा डोबरियाल और उनके समर्थकों को भारी निराशा हुई और कार्यकर्ताओं ने उन्हें निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारने के लिए दबाव बनाया, जिसके चलते उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मेयर का नामांकन पत्र भरा, लेकिन मनोरमा शर्मा डोबरियाल ने सोमवार को अपना नामांकन वापस ले लिया। उनके नामांकन पत्र वापस लेने उनके साथ कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र कुमार निर्वाचन कार्यालय गए। यहां बोलते हुए मनोरमा शर्मा डोबरियाल ने कहा कि वह पार्टी का सम्मान करती है और उन्हें किसी भी पद की अब इच्छा नहीं है, इसलिए वह अपने नामांकन को वापस ले रही है। 

पुलिस सुधार लागू करने में उत्तराखण्ड अग्रणी राज्य:  बहुगुणा

नई दिल्ली/देहरादून, 15 अप्रैल । उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने सोमवार को विज्ञान भवन में गृह मंत्रालय द्वारा आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में हिस्सा लिया। यह सम्मेलन द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की “लोक व्यवस्था” पर 5वीं रिपोर्ट पर आयोजित किया गया था। सम्मेलन का उद्घाटन केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने किया। मुख्यमंत्री बहुगुणा ने अपने संबोधन में कहा कि मा0 उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों का अनुपालन करते हुए उत्तराखण्ड देश में पुलिस सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने वाले पहले राज्यों में से एक है। विभिन्न पुलिस सुधार आयोगों के सुझावों को मानते हुए राज्य में उत्तराखण्ड पुलिस अधिनियम बनाया गया है। साथ ही राज्य में पुलिस बोर्ड, पुलिस स्थापना समिति, पुलिस कल्याण बोर्डका गठन भी किया जा चुका है। मुख्यमंत्री बहुगुणा ने सम्मेलन मे बताया कि उत्तराखण्ड में कुछ चुनिन्दा क्षेत्रों में पुलिस के अपराध विवेचना और कानून-व्यवस्था  कार्यों को अलग करने पर विचार किया जा रहा है। यद्यपि यह व्यवस्था 10 लाख जनसंख्या से ऊपर के शहरों के लिये संस्तुत की गई है और उत्तराखण्ड में ऐसा कोई शहर नहीं है। जांच में तेजी लाने और सक्षम अभियोजन कार्यवाही के लिये प्रदेश में “बोर्ड ऑफ इंवेस्टिगेशन” और “आफिस ऑफ चीफ प्रासीक्यूटर”(मुख्य अभियोजक अधिकारी का कार्यालय) की स्थापना पर भी विचार किया जा रहा है। मुख्य अभियोजक अधिकारी के अधीन जिलों में डिस्ट्रिक्ट अटार्नी के कार्यालयों की आवश्यकता भी होगी। मुख्यमंत्री ने अभियोजन तंत्र को मजबूत करने की इस योजना मे केन्द्रीय सहायता 90ः10 के अनुपात मे देने की मांग भी की। विभिन्न सत्र न्यायालयों में अभियोजक अधिकारियों की रिक्तियाँ भी शीघ्र भरी जायेंगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि दो-दो अर्न्तराष्ट्रीय सीमाओं से घिरे उत्तराखण्ड की सामरिक स्थिति को देखते हुए यहां की रेगुलर और राजस्व दोनों ही पुलिस प्रणालियों को आधुनिक एवं और अधिक सशक्त बनाये जाने की आवश्यकता है। उन्होेंने कहा कि वर्ष 2013-14 हेतु रेगुलर पुलिस के आधुनिकी करण के लिये 21 करोड़ रूपये तथा राजस्व पुलिस के आधुनिकी करण के लिये 23 करोड़ रूपये के प्रस्ताव केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भेजे गये है। मुख्यमंत्री ने केन्द्रीय गृहमंत्री से इस दिशा में उत्तर-पूर्व राज्यों की भांति शत प्रतिशत सहायता प्रदान करने का अनुरोध किया। उन्होंने पुलिस आधुनिकीकरण योजना के तहत आधुनिक उपकरणों के साथ ही नये पुलिस थानों में आवश्यक मानव संसाधन पर आने वाले खर्च की व्यवस्था करने का सुझाव दिया। उत्तराखण्ड ने आतंकवादी एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के निरोध एवं दमन के लिये सात विशेष एटीसी बनाई हैं। भारत-नेपाल सीमा पर स्टेट स्पेशल ब्रांच की दस नई इकाईयां तैनात की गई हैैं। उन्होंने बताया कि राज्य की अर्न्तराष्ट्रीय सीमाओं सहित अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अभिसूचना तंत्र मजबूत करने के लिये आवश्यक उपकरणों की खरीद तथा स्थापना हेतु इंटेलिजंेस ब्यूरो को 20 करोड़ रूपये का प्रस्ताव भेजा गया है। जिसकी शीघ्र स्वीकृति जरूरी है। पुलिस पर भार कम करने के लिये आर्थिक अपराध शाखा के रूप में नई शाखा खोलने पर भी विचार किया जा रहा है। जिसमें वन, आबकारी, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, व्यापार कर, परिवहन, ऊर्जा आदि से जुडे़ आधिकारी प्रतिनियुक्ति पर लिये जायेंगे तथा इन विभागों से जुड़े अपराधों की जांच तेजी से हो सकेगी। राज्य में अपराधों से गंभीर रूप से पीडित व्यक्ति को निशुल्कः चिकित्सा सुविधाओं सहित अन्य सहायताएं प्रदान करने के लिये एक व्यापक नीति बनाई जा रही है। हाल ही में एसिड अटैक पीड़ितों के लिये निशुल्कः सुधारात्मक सर्जरी की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। अपराध पीड़ितों से संवेदनशील व्यवहार करने के लिये पुलिस कार्मिकों को प्रशिक्षित भी किया जायेगा।

राज्य में 1874 से पर्वतीय क्षेत्रों में राजस्व पुलिस प्रणाली क्रियाशील है जहां पटवारी, नायब तहसीलदार जैसे राजस्वकर्मी पुलिस कार्य भी करते है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61 प्रतिशत भाग एवं 30 प्रतिशत जनसंख्या राजस्व पुलिस के अधीन आती है। राज्य की पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये राज्य पुलिस बोर्ड का गठन किया गया है। राज्य के मुख्यमंत्री/गृहमंत्री बोर्ड के अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, मुख्यसचिव, प्रमुख सचिव गृह तथा क्ळच् इसके सदस्य होते है। इसके अतिरिक्त विशिष्ट प्रतिष्ठा प्राप्त दो गैर-राजनीतिक सदस्यों का भी प्रावधान है। राज्य पुलिस अधिनियम के अर्न्तगत पुलिस स्थापना समिति  का गठन किया गया हैै। जो उच्च स्तर के अधिकारियों के स्थानांतरण एवं तैनाती पर संस्तुति देती है। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन किया गया है। जिसका कार्य गंभीर दुर्व्यवहार के प्रकरणों की जांच करना है। उत्तराखण्ड पुलिस अधिनियम के अर्न्तगत राज्य में पुलिस कार्मिकों के कल्याण हेतु पुलिस कल्याण परिषद् का गठन किया गया है। जो कार्मिकों और उनके आश्रितों के उपचार, शिक्षा, प्रशिक्षण आदि कल्याण कार्यक्रमों को देखता है। सम्मेलन में मुख्य सचिव आलोक कुमार जैन, प्रमुख सचिव गृह ओम प्रकाश तथा डी0जी0पी0 सत्यव्रत भी उपस्थित थे।

13 मई को खुलेंगे गंगोत्री व यमनोत्री के कपाट

देहरादून, 15 अप्रैल । विश्व विख्यात चार धाम यात्रा के मद्देनजर धामों के खुलने की तिथियां निर्धारित कर दी गयी है। धामों की प्रबंधन समितियों द्वारा तय की गयी तारीखों के अनुसार गंगोत्री और यमनोत्री धाम के कपाट 13 मई को खुलेंगे। वहीं केदारनाथ धाम के कपाट 14 मई को बद्रीनाथ धाम के कपाट 16 मई को खोले जायेंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि अगले माह राज्य में चारधाम यात्रा का शुभारम्भ होने जा रहा है। हालांकि देवभूमि के  सभी धामों के कपाट खुलने की तिथियां निर्धारित हो चुकी है लेकिन सरकारी स्तर पर चारधाम की तैयारियों को लेकर अभी भी रफ्तार इतनी धीमी है कि चारधाम यात्रा को सुरक्षित बनाये जाने पर सवाल खड़े किये जा रहे है।

पुनर्विकास योजना को एक सिरे से नकारा

देहरादून, 15 अप्रैल। चकराता रोड़ तथा आसपास के क्षेत्रों में देहरादून विकास प्राध्किरण द्वारा प्रस्तावित पुनर्विकास योजना से प्रभावित होने वाले व्यापारियों तथा निवासियों की एक बैठक गत दिवस सायं चकराता रोड स्थित प्राइमरी स्कूल में सम्पन्न हुई जिसमें योजना से प्रभावित होने वाले अधिकांश व्यापारी व निवासी उपस्थित हुए। चकराता रोड, चौडीकरण हेतु पारित शासनादेश दिनांक 2. 2.11 में सिर्फ सड़क चौड़ीकरण के अन्य सभी कार्य अधूरे पड़े है जिसमें एमडीडीए की कार्यशैली तथा विश्वनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। उसे देखते हुए उपस्थित समुदाय ने प्रस्तावित पुनर्विकास योजना को एक सिरे से नकार दिया तथा सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि इस योजना का पुरजोर विरोध किया जायेगा। उक्त अवसर पर चकराता रोड, पुनर्विकास योजना विरोधी मोर्चा का गठन किया गया जिसके पदाधिकारियों की घोषणा शीघ्र की जायेंगी। बैठक में राजेश गोयल, विक्रम कालड़ा, शशिकान्त गोयल, डा. यूसी चांदना आदि उपस्थित थे। 

निगम चुनाव के लिए प्रशासन ने कसी कमर, दून में 115 मतदान केंद्र, 42 अतिसंवेदनशील

देहरादून, 15 अप्रैल । प्रशासन ने निगम चुनाव को शांतिपूर्ण सम्पन्न कराने के लिए कमर कस ली है। मतदान के लिए राजधानी दून में 115 मतदान केन्द्र बनाए गये है जिनमें से 42 अतिसंवेदनशील रखे गये है। वहीं ऋषिकेश में 20 मतदान केन्द्रों में से सात अतिसंवेदनशील व पांच संवेदनशील विकासनगर में पांच मतदान केन्द्र बनाए जायेंगे जिसमेें तीन संवेदनशील और एक अतिसंवेदनशील चिहिन्त किया गया है। मसूरी के 16 मतदान केन्द्रों में से पांच अतिसंवेदनशील व छहः संवेदनशील माने गये है। वहीं डोईवाला के सात मतदान केन्द्रों में से सभी सात को संवेदनशील व अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। यर्ही हर्बटपुर के सभी चार मतदान केन्द्रों की भी है। राजधानी दून को प्रशासनिक दृष्टिकोण से 5 जोन और 72 सेक्टरों में बांटा गया है। 28 अप्रैल को होने वाले मतदान को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिए प्रशासन ने अतिसंवेदनशील व संवेदनशील मतदान केन्द्रांे पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था करने का निर्णय लिया है।

खस्ता हाल सड़कों पर खटारा बस का सफर धकेल रहा मौत के मुंह में

देहरादून, 15 अप्रैल । लगातार प्रदेश की बदहाल और सर्पीली सड़कें दुर्घटना का कारण बनती जा रही हैं, इसके साथ ही सड़कों पर दौड़ रही बूढ़ी और पूरी तरह खटारा बसें भी काफी हद तक सड़क दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष दर्जनों लोगों को जान गंवानी पड़ रही है जबकि कई लोग दुर्घटना का शिकार होने से विकलांग हो जाते हैं। परिवहन विभाग सड़क दुर्घटनाओं को रोक पाने में नाकाम साबित हो रहा है। उत्तराखंड में वर्ष 2011 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 40 लोगों की मौत हुई जबकि 144 लोग घायल हुए, 2012 में सड़क दुर्घटनाओं में 72 लोगों की मौत और 206 लोग घायल हुए, वहीं फरवरी 2013 तक पदेश में सड़क दुर्घटनाओं में 3 लोगों की मौत और 375 लोग घायल हुए। वर्ष 2011 में सड़क दुर्घटनाओं के मृतक आश्रितों और घायलों को उत्तराखंड परिवहन निगम द्वारा 4,16,66,459 रुपये, वर्ष 2012 में 4,70,22,581 रुपये और वर्ष 2013 में फरवरी माह तक वाहन दुर्घटनाओं के मृतक आश्रितों और घायलों को 17 हजार रुपये की धनराशि मुआवजे के रूप में दी गई। पर्वतीय इलाकों में सड़कों की हालत बेहद खराब है। लोगों को जान जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ती है। हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। वर्ष 2011 में पदेश में विभिन्न जिलों में अलग-अलग सड़क दुर्घटनाओं में 23 लोगों को जान गंवानी पड़ी जबकि 84 लोग घायल हुए। अन्य राज्यों में 17 लोगों की मौत और 60 लोग घायल हुए। परिवहन विभाग से पाप्त आंकड़ों के अनुसार चंपावत जिले में वाहन दुर्घटना में 1 की मौत और 5 घायल हुए। उधमसिंहनगर जिले में 2 की मौत और 19 घायल हुए। अल्मोड़ा जिले में 7 की मौत और 15 घायल हुए। नैनीताल जिले में 4 की मौत और 15 घायल हुए। हरिद्वार में 9 घायल हुए। देहरादून जिले में 7 लोगों की मौत हुई और 15 घायल हुए। टिहरी जिले में 1 की मौत और 4 घायल हुए। वर्ष 2012 में राज्य में सड़क दुर्घटनाओं 57 लोगों की मौत और 88 लोग घायल हुए। अन्य राज्यों में 15 लोगों की मौत और 118 लोग घायल हुए। नैनीताल में सड़क दुर्घटना में 34 लोगों की मौत और 53 लोग घायल हुए। हरिद्वार जिले में 5 लोगों की मौत और 11 लोग घायल हुए। अल्मोड़ा जिले में 3 लोगों की मौत और 1 घायल, उधमसिंहनगर में 3 लोगों की मौत और 5 लोग घायल, देहरादून जिले में 7 लोगों की मौत और 9 लोग घायल, उत्तरकाशी में 3 लोगों की मौत और 1 घायल, पौड़ी 1 की मौत और 2 लोग घायल हुए। वर्ष 2013 में फरवरी माह तक राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में 2 की मौत और 22 लोग घायल हुए। अन्य राज्यों में 1 की मौत और 3 घायल हुए। अल्मोड़ा में 1 की मौत और 6 घायल, नैनीताल में 3 घायल, देहरादून में 5 घायल, पौड़ी में 5 घायल, हरिद्वार में 2 घायल हुए। बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं का कारण सड़कों की खस्ती हालत और खटारा बसों का सड़कों पर दौड़ना है। राज्य में अधिकांश रूटों पर खटारा

सफाई व्यवस्था के प्रति सुस्ती से रोष

देहरादून, 15 अप्रैल । विकासनगर में कई स्थानों पर नगरपालिका परिषद विकासनगर की लचर सफाई व्यवस्था के चलते कूड़े के ढेर लगे पड़े हैं। गर्मी का सीजन शुरू हो चुका है, सफाई व्यवस्था द़ुरुस्त न होने से बीमारी फैलने का खतरा भी बना हुआ है। नियमित रूप से कूड़ा न उठाए जाने और नालियों की सफाई न किए जाने से लोगों में रोष है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लचर सफाई व्यवस्था का जवाब चुनाव लड़ रहे जनप्रतिनिधियों को इस चुनाव में दिया जाएगा।  विकासनगर बाजार में सड़कों के किनारे जगह-जगह पर कूड़े के ढेर लगे होने से आसपास रहने वाले लोगों और वहां से निकलने वाले राहगीरों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई जगह ऐसी हैं जहां से कि सप्ताह में एक बार कूड़ा उठाया जाता है। ट्रामा सेंटर के बाहर, बाईपास रोड पर सैंग्वीन स्कूल के सामने, मंडी चौक, पहाड़ीगली, सिनेमागली आदि स्थानों पर कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। पशुओं द्वारा कूड़े के ढेर से कूड़ा इधर-उधर बिखेर दिए जाने से समस्या और बढ़ जाती है। विभिन्न वार्डों में गली और मोहल्लों को जाने वाले संपर्क मार्गों के किनारे नालियां सफाई न होने पर गंदगी से अटी पड़ी हैं। कई स्थानों पर नालियां चोक पड़ी हुई हैं। नियमित रूप से सफाई न होने से लोगों को दुर्गंध का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय निवासी दीपक कुमार, रणवीर सिंह, रूपेश, सलील, रोहित आदि का कहना है कि गर्मी के सीजन में पालिका को सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना चाहिए। नियमित रूप से सफाई न होने से बीमारी फैलने की भी आशंका बनी रहती है। नालियों में समय-समय पर कीटनाशकों का छिड़काव सुनिश्चित किया जाए। लापरवाही बरतने वाले सफाईकर्मियों पर नजर रखी जाए। उनका कहना है कि जनपतिनिधियों को लचर सफाई व्यवस्था का जवाब इस निकाय चुनाव में दिया जाएगा। जनप्रतिनिधि चुनाव के समय तो वायदे करते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद वह किए गए वायदों को भूल जाते हैं।   

बने हुए कुछ माह भी नहीं हुए और क्षतिग्रस्त हो गई सड़क, बरोटीवाला-रेड़ापुर मोटर मार्ग बदहाल

देहरादून, 15 अप्रैल । मोटर मार्ग रखरखाव के अभाव में बरोटीवाला-रेड़ापुर खस्ताहालत में है। कई बार इस मार्ग का सुधारीकरण किया जा चुका है लेकिन मार्ग बनते ही क्षतिग्रस्त हो जाता है। इस मार्ग पर जगह-जगह गड्ढे बने हुए हैं, जिस कारण वाहन चालकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सड़क की पेंटिंग उखड़ चुकी है और रोडिय़ां बाहर निकली हुई हैं। इन रोडिय़ों में दुपहिया वाहन चालक कई बार गिरकर चोटिल हो चुके हैं। यह मार्ग लोक निर्माण विभाग साहिया खंड के अधीन है। इस मार्ग से लक्ष्मीपुर, बरोटीवाला, जामनखाता, रेड़ापुर, औद्योगिक क्षेत्र लांघा रोड, छरबा आदि गांव जुड़े हुए हैं। यह मार्ग पछवादून का बाईपास मार्ग है। विकासनगर, कालसी व लांघा की ओर निकलने वाले ज्यादातर वाहन इसी मार्ग से होकर निकलते हैं। यहां से फ्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े वाहनों की आवाजाही होती है। क्षेत्रवासी विभाग से इस मार्ग के सुधारीकरण की लगातार मांग करते आ रहे हैं लेकिन विभाग ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग द्वारा सड़क के सुधारीकरण कार्य के दौरान मानकों की अनदेखी की जाती है जिस कारण यह सड़क ज्यादा टिक नहीं पाती है। जितनी बार इस सड़क का सुधारीकरण कार्य हुआ एक माह में ही सड़क बदहाल हो गई।

मार्ग पर काफी गहरे गड्ढे बने हुए हैं। गड्ढों के चलते वाहन चालकों के साथ-साथ पैदल चलने वालों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। वाहन निकलने समय कई बार सड़क पर उखड़ी पड़ी रोड़ी व पत्थर उछलकर पैदल चलने वाले के सिर पर लग जाती है। छह माह पहले ही इस सड़क का सुधारीकरण किया गया था लेकिन सड़क की हालत इस कदर बदहाल हो चुकी है यह लग रहा है कि कई वर्षों से इस मार्ग का सुधारीकरण कार्य न किया गया हो।

जीआईसी लांघा में बनी है कक्षा-कक्षों की कमी

देहरादून, 15 अप्रैल । कक्षा-कक्षों की जीआईसी लांघा में कमी बनी हुई है। छात्रों को कक्षों की कमी के चलते बरामदे और बाहर मैदान में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। विद्यालय के जो कक्षा-कक्ष हैं भी उनकी जर्जर बनी हुई है जिस कारण उनमें बैठना खतरे से खाली नहीं है। लंबे समय से क्षेत्र की जनता नया विद्यालय भवन बनाने की मांग कर रही है लेकिन अभी तक इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सन 1975 का जीआईसी लांघा का विद्यालय भवन बना हुआ है। विद्यालय में मात्र दस कक्षा-कक्ष हैं, जबकि छह से बारहवीं तक पत्येक कक्षा के दो-दो सेक्सन हैं, कुछ कक्षाओं के तीन सेक्सन तक हैं। कई कमरे इतने छोटे हैं कि उनमें 20-25 छात्रों का बैठना भी मुश्किल होता है। कक्षा-कक्षों की कमी के चलते कई कक्षाएं बरामदे और बाहर मैदान संचालित होती हैं। बाहर बैठने वाले छात्रों को इस चिलचिलाती धूप में खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जबकि बारिश में बच्चों की छुट्टी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। जब से यह विद्यालय भवन बना विभाग ने इसके रखरखाव की ओर ध्यान नहीं दिया, जिस कारण यह जर्जर हो चुका है। विद्यालय की छत जगह-जगह पर क्षतिग्रस्त हो रखी है और दीवारों पर दरारें पड़ी हुई हैं।

छत और दीवारों का पलस्तर झडऩे लगा है। फर्स भी जगह-जगह पर उखड़ चुकी है। बारिश में विद्यालय की छत टपकने लगती है, जिस कारण कक्षा-कक्ष तालाब बन जाते हैं। कक्षों में पानी भरने से छात्र-छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है। जीआईसी लांघा में विभिन्न कक्षाओं में 409 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। यहां लांघा, मटोगी, मदर्सू, भूड़, पपडिय़ान, बावनधार, टिकरी, पसोली, रुद्रपुर, केदारावाला, बालूवाला आदि गांवों के बच्चे पढऩे के लिए आते हैं।



(राजेन्द्र जोशी)

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