अब भी न चेते तो मूल्य विहीन हो जायेगा समाज
- मध्यप्रदेश में पहली बार समग्र सामाजिक मूल्यों और साहित्यिक पत्रिकाओं में हुआ शोध कार्य
खंडवा (10 मई) - साहित्यिक पत्रिकाएँ सामाजिक और नैतिक मूल्यों की पोषक हैं। देश और समाज को दिशा देने का गुरूतर दायित्व निभा रही ये पत्रिकाएँ अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही हैं। समाज यदि नैतिक मूल्यों की निरंतरता नहीं रखेगा तो आने वाला समय इसे एक खोखले समाज में बदल देगा। जहाँ भौतिकता का अंधा युग प्रभावी रहेगा। यह उस शोधकार्य के कुछ निष्कर्ष हंै, जिसे चार साल की कड़ी मेहनत कर पूर्ण किया गया है। खंडवा के युवा जनसम्पर्क अधिकारी आर.आर.पटेल ने साहित्यकार डाॅ.श्रीराम परिहार के मार्गदर्शन में यह शोध किया है। देवी अहिल्या विश्व विद्यालय इंदौर द्वारा इस शोध कार्य पर श्री पटेल को पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की जा रही है। शोध में 1947 के बाद निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं का विवेचन है। स्वतंत्रता के पश्चात् मध्यप्रदेश से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं। वीणा, साक्षात्कार, अक्षरा, मध्यप्रदेश संदेश, अक्षत, प्रेरणा, मामुलिया, ईसुरी, देवपुत्र, पूर्वग्रह, पहल जैसी अनेक पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, सागर जैसे बड़े नगरों के अलावा प्रदेश के पिपरिया, रतलाम, खंडवा, छिंदवाड़ा, विदिशा, सतना जैसे छोटे शहरों से भी पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ है। शोध में यह पाया गया कि इनमें से अधिकांश पत्रिकाओं का जीवन अल्पकाल ही रहा है।
शोध में साहित्यिक पत्रिकाओं के सामाजिक बोध को तलाशा गया है। साहित्यिक पत्रिकाएँ किस उद्देश्य से प्रकशित हुईं, इनका प्रस्तुतीकरण किस तरह रहा, यह भी जानने का प्रयास किया गया है। शोध के दौरान यह पत्रिकाएँ किस तरह परिवर्तन का संदेश देती हैं और इनका क्या प्रभाव रहा है, इसका भी अध्ययन किया गया है। ‘मानव मूल्य एवं साहित्यिक पत्रिकाओं की अंतःसंरचना’ के तहत् समाज और देश के सनातन मानव मूल्यों का चिंतन किया गया है। साहित्यिक पत्रिकाओं में किस तरह से ये मानव मूल्य परिलक्षित हुए हैं और इनमें किस तरह का परिवर्तन हुआ है इसकी विवेचना की गई है। अध्यात्म, सर्वधर्म समभाव, वसुधैवकुटुम्बकम्, सर्वात्मभाव, मानवतावाद, राष्ट्रीयता, सामाजिक-सामन्जस्य, समतामूलक समाज अवधारणा, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता, परोपकार, त्याग, बलिदान, संवेदना, सच्चाई, समर्पण जैसे मानवीय मूल्य साहित्यिक पत्रिकाओं में तलाशे गये हैं।
इस शोध के दूसरे भाग में महर्षि अरविंद, आचार्य विनोबा भावे, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरूषों का सामाजिक मूल्य-चिंतन विवेचित किया गया है। मध्यप्रदेश की साहित्यिक पत्रिकाएँ इन मूल्य चिंतन से किस तरह प्रभावित हुई हंै यह खोजने का प्रयास किया गया है। शोध प्रबंध में नैतिक मूल्य, वैयक्तिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, राष्ट्रीय मूल्य, दार्शनिक मूल्य और वैश्विक मूल्यों को भी परिभाषित करते हुए इन्हें साहित्यिक पत्रिकाओं में ढूँढा गया है। समाज संरचना, जातिप्रथा, वर्ण व्यवस्था,रीति-रिवाज, प्रथाएँ, संस्कार, विश्वास, लोक व्यवहार, नगरीय जीवन के आधुनिक संदर्भ और लोक-जीवन के रंग के संदर्भ में साहित्यिक पत्रिकाओं का सूक्ष्म व गहन अध्ययन किया गया है। शोध प्रबंध के अंतिम अध्याय में साहित्यिक पत्रिकाओं की उपलब्धियाँ रेखांकित की गई हैं। साथ ही भविष्य में इनकी प्रासंगिकता और संभावनाओं की विवेचना की गई है।
ब्लाॅग भी बनाया:- शोध के लिये मध्यप्रदेश के सभी जिलों में साहित्यकारों से संपर्क किया गया। श्री पटेल ने सभी संपादकों से चर्चा की और प्रश्नावली भेंजकर जानकारी जुटाई। माधवराव सप्रे संग्रहालय भोपाल, मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति इंदौर सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों से सामग्री संकलित की। शोधकर्ता ने जानकारी संकलित करने के लिये ‘म.प्र. हिन्दी साहित्य’ के नाम से ब्लाॅग भी बनाया। इस ब्लाॅग में बहुत से सम्पादकों ने जानकारी पोस्ट की।
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