देश का सुनहरा भविष्य ये बच्चे हैं और ये विद्यार्थी जिनके कंधों पर आने वाले कल की प्यारी सुबह की तस्वीर और तकदीर टिकी है इनके साथ किसी भी सूरत में अविश्वास या धोखा नहीं होना चाहिए अगर राजनीतिवश इनके साथ किसी भी प्रकार से विश्वासघात हुआ है तो सोच लेना चाहिए कि देश के विकास को अवरूद्ध करने के लिए हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। सोचिए जो व्यक्ति अच्छी से अच्छी पढ़ाई करता है उसके बाद भी विदेशियों के द्वारा परोसी गई महंगी थाली को छोड़ देश की मिट्टी में रहकर खाना क्यों पसंद करता है कई विद्यार्थी हैं जिनमें देशप्रेम का जज्बा है वे कुछ करना चाहते हैं इस देश के लिए वे चाहें तो आराम का जीवन यापन कर सकते हैं विदेशी नागरिकता और अच्छी रकम उनकी योग्यता के लिए कोई भी दे सकता है लेकिन कई उदाहरण ऐसे हैं जिनमें नामी आईआईटीएन्स ने अपने घर के लिए कुछ करने का फैसला लिया है क्यों ? क्या हर कोई ऐसा सोच सकता है ? बेशक नहीं क्योंकि सोचने के लिए परीस्थितियां अनुकूल होनी चाहिए जिस प्रकार से आज का तंत्र लापरवाह और बेलगाम है उसे देखकर तो ऐसे उदाहरण एक्का दुक्का ही दिये जा सकेंगे क्योंकि एक और जहां बच्चों और विद्यार्थियों के लिए हमारी सरकारें वे कुछ नहीं कर र्पाइं जिसकी देश को जरूरत है जिनसे इस देश को विकास के नये आयाम प्राप्त करने का मौका मिल सकता हो, इनमें शिक्षा नीति , शिक्षा के स्तर , रोजगारोन्मुख शिक्षा और शिक्षा के बाद उचित रोजगार नहीं मिल पाना प्रमुख हैं।
काम करने से पहले हमारी सरकारंे अपना गुणगान चालु कर देतीं हैं जबकि इसकी कोई महत्ती आवश्यकता नहीं जान पड़ती, जिस प्रकार कहावत है हाथ कंगन को आरसी क्या और पढे लिखे को फारसी क्या ठीक वैसे यदि सरकारें अच्छा कार्य कर रही हैं तो निश्चित तौर पर उन्हें जनता फिर से चुनेगी लेकिन हम अपनी कमियां पूरी किये बिना ही गुणगान करें तो निश्चित तौर पर यह बेवकूफी होगी।
सीधा सा सवाल है कि एक और जहां सरकारें युवा फौज को काम करने के लिए रोजगार उपलब्ध नहीं करवा पा रही है तो दूसरी और समय के साथ बदलती सरकारों के कारण नीतिगत बदलाव से छात्र ठगे रह जाते हैं रही सही कसर सत्तासीन और उनके करीबी नहीं छोड़ते जिनके कारण सरकारी सेवा में ऐसे लोगो का चयन हो जाता है जिनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना है, जिनके पास अधिकांशतः अनुभव एवं शिक्षा दोनों की ही कमी होती है ऐसे लोगों से हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वे सेवा में आने के बाद देश के लिए कुछ कर गुजरेंगे। हम भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के लिए प्रतिबद्ध नजर आते हैं अमूमन यही जुमला हर सरकार सत्ता में आने और सत्ता से जाने तक जनता को रटाती रहती है नतीजे सिफर होते हैं आरोप एक दूसरे पर मढ़ दिये जाते हैं और धोखे की सूरत में सपने दिखाकर सरकारें चलीं जाती हैं जनता ही क्या विद्यार्थी जगत भी इन सरकारों के वादों और योजनाओं के दुष्परिणामों से त्रस्त हैं एक ओर तो जहां रोजगार सरकारें दे नहीं पा रही वहीं उन्हें उच्च शिक्षा के लिए उकसाया जा रहा है नित नये शिक्षा संस्थानों को अनुमति मिल रहीं है पता भी नहीं चलता कि संस्थान कहां चल रहा है मूलभूत सुविधाओं को छोड़ भी दे ंतो वहां तो पढ़ाने वालों का भी टोटा रहता है हालात अभी काबू में आ सकते हैं लेकिन कुछ समय बाद जब युवाओं का ज्वार आ जायेगा तब स्थितियों को संभालना भारी पड़ सकता है, उदाहरण के बतौर देख लीजिए, अभी हाल ही में मिड-डे मिल योजना के तहत बच्चों को दिये जाने वाले भोजन से काल का ग्रास बने बच्चों से देश को कितनी क्षति हुई है क्या इसकी कीमत चुकाई जा सकती है ? नहीं ! ये तमाचा है खराब माॅनिटरिंग और कंुभकरणी नींद सो रही योजनाएं चलाने वालों का जनता के मुंह पर । अरे मुफ्त-मुफ्त क्या कर रहे हो देश को मुफ्तखोर बनाकर छोड़ दोगे क्या! ये देश खुद्दारी से जीने वालों का है क्यों नहीं समझदारी दिखाकर बेहतर उद्योग और रोजगारों का रास्ता सुझाया जाए दो जून की रोटी गरीब को स्वतः ही मिल जायेगी दुआएं गरीब की लाख रूपयों से भी बढ़कर होती हैं लेकिन बद्दुआ बहुत खराब होती है ऐसी बद्दुवाएं सरकारें न हीं लें तो अच्छा है।
आये दिन विकास कार्यों और जनता के लिए किए गये प्रयासों से जनता को अवगत करवाने के लिए महंगे विज्ञापन देकर व्यर्थ ही पैसा बर्बाद किया रहा है यही पैसा अस्पताल और चिकित्सा सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए खर्च किया जाए तो क्या जनता आपको वोट देने से मना करेगी ? क्यों ग्रामीण जनता बेहतर इलाज के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर महंगे और नीति अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए अन्यत्र राज्यों में जाते हैं क्या ये जिला स्तर और राज्य स्तर पर चिकित्सा सेवाओं में सुधार से संभव नहीं हैं ? संभव तो तब हो जब किसी भी प्रकार का प्रबंधन हो यहां तो किसी के कह देने भर से राजनीति गर्मा जाती है वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि महज 12 रूपयें में भरपेट खाना मिल जाता है अरे जनाब रोजगार षिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को देने में कामयाब नहीं हो पाये हो तो कोई बात नहीं लेकिन जनता का मखौल तो ना उड़ायें इन्हें सब्ज बाग भी न दिखायें क्यों कि जब सपने टूटते हैं तो बहुत दर्द होता है।
अभी भर्तियों का दौर चला हुआ है हफ्ता दर हफ्ता बिना सिर पैर की भर्तियां निकल रही हैं बेरोजगार युवाओं के पास महंगे फाॅर्म भरकर परीक्षा में बैठने के अलावा कोई चारा नहीं है लाइन में लगकर इंटरनेट की दुकान पर पैसे अलग से देकर एक स्थान से अन्यत्र और कई बार तो दूरस्थ केन्द्रों पर परीक्षाएं देकर भी जब खराब और आषाओं के प्रतिकूल नतीजे आएं तो छात्र परेषान हो जाते हैं सामान्य और गरीब तबके के विद्यार्थी मन मसोेस कर बैठ जाते हैं, अगली भर्ती का इंतजार करते हैं कुछ विद्यार्थी ऐेसे कुप्रबंधन के खिलाफ साहस दिखाते हैं तो भर्तियों पर रोक लग जाती है और सरकारें दोषी पाईं जाएं या उनमें किसी प्रकार की धांधली होने की आषंका हो तो भर्तियां रद्द भी हो जाती हैं नुकसान बेचारे छात्रांे को ही उठाना पड़ता है पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद रोजगार की तलाष और विभिन्न परीक्षाओं के नतीजों के इंतजार में ही उनका अधिकांष समय व्यतीत हो जाता है और कई बार ऐसी स्थितियां बन पड़ती है कि छात्र अपने बिगड़ते कैरियर को नहीं संभाल पाने के कारण आहत होकर जिंदगी से विदा ले लेते हैं दोषी कौन है? तंत्र या विद्यार्थी ? अभी हाल ही में संविदाकर्मियों को नियमित करने के लिए भी कई प्रकार की भर्तियां निकाली गई हैं कुछ पहले से ही विवादों में चलीं फिर नतीजे नहीं आए और आए तो नियुक्तियां नहीं दी जा सकीं और रही सही कसर फिर भर्ती का मामला कोर्ट में पंहुचने से पूरा हुआ आज भी कई विद्यार्थी और रोजगार पाने के इच्छुक आषातिरेक होकर बाट जो रहे हैं ये सब इस कारण होता है कि चुनावों को नजदीक देखकर ये भर्तियां निकाली जाती है जिनमें भर्तियां निकालने से पूर्व किये गये होमवर्क का अभाव रहता है तथा कुप्रबंधन से हालात बिगड़ जाते हैं एक और बात यह महत्वपूर्ण है जिसका उल्लेख यहां करने योग्य है कि सरकार इनको आयोजित करने के लिए बेरोजगारों से फाॅर्म भरवाती है उनमें भी उन्हें आरक्षण में पाट कर देखा जाता है सामान्य विद्यार्थी महंगे फाॅर्म भरता है और अन्य वर्ग के व्यक्ति सस्ते फाॅर्म, जबकि परीक्षा दोनों वही देते हैं इस प्रकार ये आरक्षण की मार यहां भी छात्रों के साथ एक प्रकार से धोखा है क्या सरकारें ये समझती है सामान्य वर्ग के व्यक्ति गरीब नहीं हो सकते? फिर फाॅर्म भरने में भी आरक्षण व्यवस्था और परिणाम तथा नियुक्ति तक आरक्षण क्यांे? निष्चित तौर पर ये छात्रों के साथ धोखा है अभी हाल ही में परीक्षाओं में आॅनलाइन सिस्टम लागू किया गया है जिसमें यह व्यवस्था रहती है कि ई-मित्र पर रसीद कटवाकर आॅनलाइन संबंधित विभाग की वेबसाइट पर जाकर फाॅर्म भरा जा सकता है परीक्षा भी कई विभाग आॅनलाइन करवाने लगे है लेकिन ऐसी भर्तियों की पारदर्षिता पर कई सवाल खड़े किये जा सकते हैं क्योंकि परीक्षा में छात्रों के रोल नम्बर यूजर नेम होता है और उनकी जन्म तिथि उनका पासवर्ड होता है तो कहना न होगा क्या संभव है कि परिणाम बदले न जा सके इस उपरोक्त कथन पर गौर फर्मायंे ये तंत्र की खामी है जिसमें पारदर्षिता लानी जरूरी है जिसका कि नितांत अभाव जान पड़ता है और जिसके चलते असंतुष्ट विद्यार्थी और बेरोजगार इन भर्तियों से आहत होते रहेंगे।
विद्यार्थी भी मानते हैं कि उन्हें किसी भी प्रकार की मुफ्त की वस्तुओं से अधिक आवष्यकता उचित षिक्षा और उसे पाने के लिए सुरक्षित वातावरण की जरूरत है आज कई स्थान ऐसे हैं जहां खुले में भी विद्याध्ययन करवाया जाता है, कई स्थान ऐसे हैं जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है और इसके चलते भामाषाहों पर निर्भर रहना पड़ रहा है कई स्थानों पर तो किराये के भवनों में ही विद्यालय चलते हैं कई स्थान ऐसे दुर्गम हैं जहां विद्यार्थी नदी नालों औरे पगडंडियों तथा सीढि़यों के सहारे नितदिन षिक्षा लेने जाने को मजबूर हैं उन्हें सुविधाओं को देने के बजाय सरकारें मुफ्त वस्तुएं बांटती फिर रही है ये व्यर्थ हैं इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है राजनीति यह कहती है कि देष के लिए प्रतिबद्ध होकर हम कार्य करें और विपक्ष तथा सभी दलों को साथ लेकर हर मुद्दे को बहस के बाद हल करें लेकिन बहुमत के फेर कई नीतियांे को यूंही पास करवा दिया जाता है तो कई महत्वपूर्ण मुद्दे अछूते रह जाते हैं ठगी रह जाती है जनता विपक्ष के पास इस मौके को भुनाने और विरोध प्रदर्षनों से फुर्सत नहीं । इनका परिणाम भी राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान उठाकर देष को ही चुकानी होती है। जबकि विपक्ष एवं दबाव दलों तथा मिडिया का कार्य यह है कि सरकार को मुष्तैद रखना तथा तंत्र कि खामियां उजागर करना ताकि पारदर्षिता बनी रहे और नियमानुसार कार्य होता रहे।
अंत में कहना यही चाहुंगा कि सरकारों को किसी भी योजना एवं भर्तियों को लागू करने से पहले आकलन एवं हरेक परिस्थिति का पूर्वानुमान लगाते हुए चलना चाहिए ताकि छात्रों के साथ धोखा नहीं हो, षिक्षा नीति में आमूल-चूल बदलाव करते हुए विद्यार्थियों में षिक्षा के मूलभूत स्तर को सुधारना चाहिए। राजनीति के क्षेत्र में सभी दलों को एक-दूजे की टांग खींचने की बजाय साथ मिलकर काम करना चाहिए और सत्ता पक्ष को चाहिए कि यदि वे भ्रष्टाचार को मिटाने को कटिबद्ध है तो तुरंत कार्यवाही की ओर अग्रसर हों । आरक्षण की मार से निजात कब तक पा सकेंगे ये भी आकलन जरूरी है योग्यवान और प्रतिभावान छात्रों के साथ धोखा नहीं हो इसका भी ध्यान रखा जाये । नये संस्थानों को मंजूरी देना इतना जरूरी नहीं जान पड़ता जितना पुराने षिक्षा संस्थानों पर माॅनिटरिंग करना। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ करवाईं जाएं और बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार को किसी भी योजना के लिए विषेष निरीक्षण की आवष्यकता है।
आनन्द हर्ष
जैसलमेर,(राज.)

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