जम्मू कश्मीर : पहचान के लिए संघर्ष करती शरणार्थी महिलाएं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 31 जुलाई 2013

जम्मू कश्मीर : पहचान के लिए संघर्ष करती शरणार्थी महिलाएं

भारत और पाकिस्तान के बीच बटवारे के 66 वर्ष बाद भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें आजतक सुलझाया नहीं जा सका है। बात चाहे सीमा रेखा के स्थाई समाधान की हो या फिर राजनीतिक दृष्टिकोण से किसी मसले के हल की बात हो। इन्हीं में शरणार्थियों का मुद्दा भी प्रमुख है। जिसे दोनों ही पक्षों ने गंभीरता से हल करने का प्रयास नहीं किया है। अपना मुल्क समझकर आए दोनों ही ओर के लोगों को आजतक आम नागरिकों की तरह समान अधिकार नहीं मिल पाये हैं। भारत से पाकिस्तान गए लोगों को मुहाजिर कहकर दुत्कारा गया तो भारत को अपनी सरज़मी समझने वाले पाकिस्तान से आए नागरिकों के साथ भी दोहरा व्यवहार किया गया, जो बदस्तूर जारी है। आज भी यह लोग भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हैं। जम्मू से 35 किमी दूर मढ़ ब्लाॅक के एक गाँव भूते चक में ऐसे शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। पश्चिम पाकिस्तान के निचली जातियों से संबंध रखने वाले यह लोग पीढ़ी दर पीढ़ी बसे हुए हैं। यह वह लोग हैं जो 1947 में विश्व के सबसे बड़े जमीन और इंसानी बटवारे के समय अविभाजित पंजाब के सियालकोट जि़ले के विभिन्न देहातों से पलायन करके यहाँ आए थे। वर्तमान में इनकी आबादी लगभग 2,50,000 है और यह परिवार जम्मू, कठुआ और राजौरी के विभिन्न हिस्सों में बसा हुआ है। इन शरणार्थियों को भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता प्रदान की गई है परंतु धारा 370 के अंतर्गत जम्मू और कश्मीर संविधान के तहत इन परिवारों को राज्य की नागरिकता प्रदान नहीं की गई है। ज्ञात हो कि धारा 370 के माध्यम से संविधान द्वारा जम्मू और कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया है। जिसके लाभस्वरूप यहाँ के निवासियों को विशेष तौर पर राज्य नागरिकता प्रदान की जाती है और उन्हें सबजेक्ट होल्डर्स कहा जाता है। लेकिन पाकिस्तान से आए इन शरणार्थियों को आज भी इस सुविधा से वंचित रखा गया है। पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी एक्षन कमिटी के बैनर तले यह लोग पिछले 6 दशकों से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। 

सोमादेवी की उम्र 73 वर्ष से अधिक है। भारत पाकिस्तान बटवारे के समय वह मात्र सात वर्ष की थी। जब विस्थापित होकर अपने परिवार और समुदाय के साथ जम्मू आई थी। सोमादेवी के अनुसार त्रासदी के उस वातावरण में इनका समूह कई दिनों तक भोजन और शरण के लिए संघर्ष करता रहा और अंत में किसी प्रकार जम्मू पहँुचा। सोमादेवी बताती हैं कि हमसे इंसान होने के बुनियादी अधिकार भी छीन लिए गए। गुजरने वाला हर दिन खौफ और डर के भयावह अहसास से भरा होता था। अपनी पहचान पाने के लिए हमने सारा जीवन संघर्ष किया। लेकिन सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं की गई। मैं नहीं चाहती कि मेरी चौथी पीढ़ी भी अंत तक संघर्ष करते हुए मौत का शिकार हो जाए। शरणार्थी के रूप में आई एक अन्य महिला रीता के अनुसार रोजगार उनके लिए आज भी एक बड़ी समस्या है। मर्दो को बहुत मुश्किल से काम मिलता है। ऐसे में औरतें घरेलू काम करती हैं और बच्चों की परवरिश का जिम्मा उठाती हैं। कुछ महिलाएँ तावी नदी से पत्थर चुनने का अस्थायी कार्य कर प्रतिदिन 40 से 50 रूपये की आमदनी कर लेती हैं। रीता कहती हैं कि अत्याधिक गरीबी के कारण वह किसी प्रकार का कोई बचत नहीं कर पाती हैं। ऐसे में उन्हें अपनी बेटियों के भविष्य की चिंता सताती रहती है क्योंकि उन्हें उनकी शादी के लिए कर्ज लेना होगा और उस कर्ज को चुकाने के लिए अपनी बेटी को भी काम पर साथ ले जाना होगा।

यह केवल किसी एक महिला की कहानी नहीं है बल्कि कई महिलाएँ हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए घर की दहलीज़ से बाहर कदम निकालना पड़ता है। अधिकतर महिलाएँ जम्मू शहर के बड़े घरों में नौकरानी के रूप में काम करती हैं। यह महिलाएँ परिवार के स्वास्थ्य, संपत्ति और मवेशियों के साथ साथ वित्तिय मामलों को भी बखूबी संभालती हैं। एक तरफ जहाँ महिला सशक्तिकरण की बात की जाती है वहीं दूसरी ओर यह महिलाएँ केवल इसलिए खराब सेहत, अशिक्षा, अभाव और अपमान झेलने को विवश हैं क्योंकि राज्य सरकार ने उन्हें अब तक नागरिक का दर्जा नहीं दिया है। ऐसे में उन्हें वोट देने का भी अधिकार नहीं मिल पाया है। दूसरी ओर राज्य में वंचित लोगों की सहायता करने का दावा करने वाली कोई भी गैर सरकारी संस्था अथवा संगठन उनके अधिकार को दिलाने के लिए आगे नहीं आया है। पश्चिमी पाकिस्तान शरणार्थी एक्षन कमिटी के अध्यक्ष लाभा राम गाँधी के अनुसार सरकारी योजना के लाभों की बात तो दूर की कौड़ी है, हमें अबतक बुनियादी मानव अधिकार भी प्राप्त नहीं हुए है जिससे कि हम अपना विकास कर सकें और न ही स्थायी निवास प्रमाण का अधिकार मिल सका है। ऐसे में हमारे बच्चों के लिए उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी प्राप्त करना एक सपना बनकर रह गया है।

बेहतर स्वास्थ्य किसी भी राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास के मूलभूत शर्त के रूप में देखा जाता है। पानी की सुरक्षित और स्थायी सप्लाई, बुनियादी स्वच्छता और साफ सफाई को स्वस्थ्य और सम्मानजनक जीवन का आधार बताया जाता है लेकिन चिंता की बात यह है कि इन पाकिस्तानी शरणार्थी परिवारों विशेषकर उनकी महिलाओं के लिए इस संबंध में कोई विशेष उपाय नहीं किये जाते हैं। जिसका परोक्ष रूप से प्रभाव उनकी सेहत पर नजर आता है। ग्रामीण भागों में कुपोशण स्वास्थ्य संबंधी सबसे प्रमुख समस्याओं में से एक है। ऐसे वातावरण में यह महिला शरणार्थी बहुत ही निम्न स्तर का जीवन बसर करती हैं। वे एक संतुलित आहार और स्वस्थ्य भोजन से वंचित रहती हैं। उन्हें आज भी लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है क्योंकि महँगे गैस सिलेंडर खरीदने की उनकी हैसियत नहीं है और स्थायी निवासी नहीं होने के कारण गैस क्नेकशन नहीं मिल सकता है।

इन शरणार्थी महिलाओं तक स्वस्थ्य और पौष्टिक भोजन, पीने का साफ पानी, खुशहाल जीवन और लाभप्रद मूल्य प्रणाली की पहुँच नहीं है। न तो उनके लिए कोई कर्ज उपलब्ध हो सकते हैं और न ही इन महिलाओं में से किसी का भी बैंक खाता खुल सका है। इन शरणार्थियों में पहली और दूसरी पीढ़ी की अधिकतर महिलाएँ अनपढ़ हैं। जबकि तीसरी पीढ़ी की महिलाओं में कुछ ने दसवीं तक शिक्षा प्राप्त की है। परंतु चौथी और नई पीढ़ी में अधिकतर लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती हैं लेकिन खराब वित्तीय स्थिती और परिवार की अनियमित आय के कारण अपनी पढ़ाई आगे नहीं कर पा रही हैं। इसके अलावा उनका स्थायी निवास प्रमाण नहीं होने के कारण ये लोग छात्रवृति भी प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं। जिसकी सहायता से ये अपनी शिक्षा को आगे जारी रख सकें। वहीं दूसरी ओर वह किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं कर सकती हैं। ऐसे में वह घर के कामों में अपनी माताओं की मदद करने और अपने परिवारों की सहायता करने के लिए मजबूर हैं। अपने भविष्य को लेकर इनमें बेहद निराशा है।

नई राष्ट्रिय जनसंख्या नीति 2000 ने एक समग्र द्रष्टिकोण पर जोर दिया है। जिसमें सभी के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार, शिक्षा और रोजगार में कोई लिंग भेद नहीं, बच्चों के जीवित रहने की दर, सशक्त सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार्य परिवार कल्याण के तरीकों को बढ़ावा देना शामिल है। जबकि हकीकत में, शरणार्थी महिलाओं को इन सेवाओं को सीमित पहुँच प्राप्त है और इस तरह वे अपेक्षित भी है। यहाँ इस बात की ओर इशारा करना निराशाजनक है कि पिछली चार पीढि़यों से महिला शरणार्थियों के जीवन में किसी प्रकार कोई बदलाव नहीं आया है। निराशा के कारकों ने इन गुज़रते वर्षों में इनके जीवन को अपनी चपेट में लिया है और अब इनकी दुर्दशा का अंत होता दिखाई नहीं दे रहा है।




डॉ  भारती प्रभाकर
मो.-09419112425
 (चरखा फीचर्स)

(लेखिका जम्मू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय अंतर्गत लाइफ लाँग लर्निंग विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। यह लेख ‘संजोय घोष मीडिया फेलोशिप के अंतर्गत लिखा गया है)

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