झारखण्ड : राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड) में खिलती बापू की कुटिया - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 8 जुलाई 2013

झारखण्ड : राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड) में खिलती बापू की कुटिया

सर्ड, रांची का दक्षिणी प्रांगण। प्रवेश  द्वार से घुसते ही बायीं ओर की दीवारों पर सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार से जुड़े स्लोगन रोचक और सूचनापरक तस्वीरों के जरिए प्रचारित किए दिखेंगे। खूब करीने से ग्रामीण विकास विभाग के संदेशों को उकेरा, सजाया गया है। मुख्य भवन की तरफ बढ़ें, उससे पहले गांधी ग्राम आपका स्वागत करेगा। एक उन्नत ग्रामीण परिवेश को प्रदर्शित करता फूस, पुआल, बांसों से बनी मनोहारी कुटिया आपका मन मोह लेगी। यहीं शांत, ध्यानस्थ मुद्रा में दिखते प्रतिमा के रूप में महात्मा गांधी ‘समाज के समग्र विकास के लिए अनिवार्य ग्रामीण विकास’ का संदेश देते भी नजर आयेंगे। और सर्ड, रांची का यह प्रांगण और परिवेश वाकई में बापू के इसी संदेश को आत्मसात करने के जतन में लगा है। पिछले कुछ सालों में सर्ड ने झारखण्ड में ग्रामीण विकास और पंचायत सशक्तिकरण की दिशा में शिद्दत से और सराहनीय प्रयास किए हैं। फलस्वरूप राज्य में ग्रामीण विकास की दिशा में कई नये आयाम दिखने लगे हैं।

आधुनिक काल में देश-दुनिया में महात्मा गांधी का एक संदेश बहुत प्रचलित रहा है - गांवों के विकास के बिना देश-समाज का विकास अधूरा है, निरर्थक है। खेत-खलिहान एवं गांवों से होकर ही विकास का रास्ता गुजरता है। यह जांची-परखी युक्ति है। पंचायत के जरिए ही समाज के हर वर्ग को लोकतंत्र में भागीदारी दिलाते इसकी असली तस्वीर और राह दिखाई जा सकती है। यही वजह है कि संविधान निर्माण के वक्त ही गांधीजी के ग्राम स्वराज पर चर्चा हुई और संविधान के अनुच्छेद 40 में संशोधन करके पंचायत को जोड़ा गया। भारत में आज भी विशाल आबादी गांवों में निवास करती है। और माना जाता रहा है कि विकास में ग्रामीण विकास का महत्व अहम है। सो, आजादी के बाद से ही ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन संबंधी योजनाओं पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया है।

पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान इसके लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं ली गयीं। इन सारी चीजों को संभव बनाने, अधिकारियों-कर्मचारियों के स्कील डेवलपमेंट के लिए नर्ड-सर्ड तथा एक्सटेंशन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई। पहली पंचवर्षीय योजना में सामुदायिक विकास तथा राष्ट्रीय प्रसार कार्यक्रम को प्रधानता दी गई। बड़े पैमाने पर ऐसे सरकारी और गैर-सरकारी प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता महसूस की गई जिनमें ग्रामीण विकास की पर्याप्त समझ और कौशल हो। छठी पंचवर्षीय योजना में ऐसे प्रशिक्षण केंद्रों को काफी महत्व दिया गया। 1980 के दशक में गरीबी उन्मूलन के लिए आइआरओपी, एनआरइपी, टीआरवाएसइएम जैसी योजना शुरू की गई। इनके लिए अत्यधिक कुशल लोगांे की आवश्यकता थी। इसे देखते हुए छठी पंचवर्षीय योजना में ही लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण पर भी ज्यादा जोर दिया गया। इसी के फलस्वरूप तकरीबन सभी राज्यों में एक-एक सर्ड केंद्र खोले गए। आज देश के विभिन्न भागों में खासकर झारखण्ड जैसे राज्य में सर्ड ने ग्रामीण विकास के संदर्भ में कई अभिनव प्रयास कर दिखाए हैं।

वर्तमान में देश में 28 सर्ड हैं। 89 इटीसी हैं। इसके अलावा कुछ राज्यों में रिजनल इंस्टीट्यूट आॅफ रूरल डेवलपमेंट भी हैं। देश के तकरीबन सभी प्रमुख राज्यों में सर्ड केंद्र हैं। इनमें आंध्रप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडि़सा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं। कुछ राज्यों में सर्ड के जरिए ग्रामीण विकास की दशा और दिशा बदलने में जबर्दस्त कामयाबी मिल रही है। अब्दूल नदीर साब स्टेट इंस्टीट्यूट फाॅर रूरल डेवलपमेंट, सर्ड, कर्नाटक, सर्ड, तमिलनाडु, एएआरडी, आंध्रप्रदेश और जयपुर ने कुछ महत्वपूर्ण काम किये हैं। यहां के सर्ड को काफी सराहा जाता है। शुरूआती दौर के बाद ज्यादातर सर्ड संस्थान स्वतंत्र संस्था के रूप में विकसित और सशक्त होते चले गए। सबसे पीछे राज्य बने झारखण्ड में सर्ड शुरूआती दौर में लगातार उपेक्षित रहा। पर फिजा बदली तो है। राज्य के ग्रामीण विकास में जीवंतता के साथ अपनी भूमिका निभा रहा है। निदेशक श्री आर.पी.सिंह के नेतृत्व में इसमें गतिशीलता आयी है।


शैशवकाल से स्वावलंबी होने को सर्ड

राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड) झारखण्ड के ग्रामीण विकास एवं प्रशिक्षण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इसकी स्थापना अविभाजित बिहार में वर्ष 1954 में हुई थी। भारत सरकार के ‘खाद्य, कृषि, सामुदायिक विकास एवं सहकारिता मंत्रालय’ द्वारा देश में स्थापित किए गए चार विकास पदाधिकारी प्रशिक्षण केन्द्रों में यह एक था। वर्ष 1958 में इसका नाम ‘ओरिएंटेशन ट्रेनिंग सेन्टर’ तथा बाद में ‘ओरिएंटेशन एण्ड स्टडी सेन्टर’ कर दिया गया।

1967 में केन्द्र सरकार ने यह संस्थान बिहार सरकार को सौंप दिया। अब इसका नाम रखा गया - ‘कम्युनिटी डेवलेपमेन्ट एण्ड पंचायती राज ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट’। 1984 में इस संस्थान को बिहार सरकार के ग्रामीण विकास के अग्रणी संस्थान के बतौर महत्वपूर्ण दायित्व मिला। इसका नाम ‘बिहार इंस्टीट्यूट आॅफ रूरल डेवलेपमेन्ट’ कर दिया गया। झारखण्ड बनने के बाद 2002 में इसका नामकरण हुआ -‘राज्य ग्रामीण विकास संस्थान’ (State Institute of Rural Development)। विश्व बैंक और विशेषज्ञों का मानना है कि सर्ड जैसे संस्थान ग्रामीण विकास की चुनौतियों को बेहतर तरीके से निपटाने में कारगर हो सकते हैं। बशर्ते उन्हें स्वायत्ता भी दी जाए। कर्नाटक, जयपुर, हैदराबाद के संस्थानों ने इसे सच भी कर दिखाया है। हालांकि इसके बावजूद कुछ ही राज्यों में सर्ड एक स्वायत्त इकाई के रूप में काम कर रहा है। सर्ड, झारखण्ड भी इस दिशा में आगे बढ़ा है, हालांकि अब भी तेज रफ्तार की जरूरत अपेक्षित है। पर जो प्रयास इस दिशा में हो रहे हैं, आस बंधाते हैं।


ग्रामीण विकास का गाइड  

कहने को 2000 में झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद सर्ड बिहार से यहां आ गया। पर यह अपनी भूमिका 1954 से ही निभा रहा है। ग्रामीण, सामुदायिक विकास के लिए अहम सहभागी के तौर पर यह देश के सबसे पूराने संस्थानों में से एक है। स्थापना काल से अब तक सर्ड, झारखण्ड ने लंबी यात्रा तय की है। शुरूआती समय को छोड़ दें तो इसने कुछ उच्चस्तरीय मानक तय कर दिए हैं। महज एक प्रशिक्षण केंद्र भर न होकर इसने खुद में कई बदलाव किए हैं। प्रशिक्षण कार्यकम, शोध-अन्वेषण, प्रशिक्षण केंद्र के आधुनिकीकरण समेत अन्य स्तरों पर अपग्रेडेशन प्रयास लगातार जारी है।

सर्ड परिसर को देश के श्रेष्ठ अकादमिक परिसरों की श्रेणी में देखा जाता है। इसकी अधिसंरचना शिक्षण एवं प्रशिक्षण के लिए आदर्श परिवेश उपलब्ध कराती है। राजधानी रांची के हेहल में सर्ड का परिसर काफी रमणीय एवं प्राकृतिक वातावरण की झलक देता है। यह दो परिसरों में स्थित है। रांची के पिस्का मोड़ से पंडरा बाजार समिति की ओर एक किलोमीटर आगे उत्तरी परिसर है। इसमें प्रशासनिक भवन, दामोदर हाॅल, चाणक्या हाॅस्टल तथा खेल का मैदान है। यह 18.83 एकड़ जमीन में स्थित है। उत्तरी परिसर के सामने वाली सड़क से लगभग एक किलोमीटर अंदर दक्षिणी परिसर है। यह दस एकड़ जमीन में फैला है जिसमें शिक्षण-प्रशिक्षण केंद्र एवं छात्रावास है। अकादमिक ब्लाॅक में दो सम्मेलन कक्ष हैं। इनमें श्रव्य-दृश्य माध्यमों से प्रशिक्षण की अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसी परिसर स्थित कम्प्यूटर केन्द्र में 60 कम्प्यूटर तथा इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा प्रशिक्षण हेतु लोकल एरिया नेटवर्क से जुड़े पंद्रह कम्प्यूटर हैं। सर्ड के पास 250 बेड का छात्रावास है तथा स्वच्छतापूर्ण रसोई घर, डाईनिंग हाॅल एवं पुस्तकालय है। सर्ड को प्रभावशाली बनाने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों, संस्थानों के अलावा एनजीओ और मीडिया संगठनों तक की मदद ली जा रही है। ग्रामीण विकास, पंचायती राज, गृह, योजना एवं विकास, ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता, समाज कल्याण, महिला एवं बाल कल्याण, आदिवासी कल्याण, वन एवं पर्यावरण, कृषि, दुग्ध एवं मत्स्य, राज्य महिला आयोग एवं नर्ड जैसे सरकारी संगठन सर्ड, झारखण्ड को सबल करने में जुटे हैं तो दूसरी ओर झारखण्ड की प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्थाएं प्रदान, रामकृष्ण मिशन, केजीवीके, विकास भारती, युवा मंथन संस्थान और दिल्ली स्थित अल्टरनेटिव डेवलपमेंट बढ़-चढ़कर सर्ड के साथ भागीदारी निभा रही हैं। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियां यूनिसेफ, यूएनडीपी, यूएन-विमेन भी सर्ड को प्रयासों को अपना कई रूपों में अपना समर्थन दे रहे। यूनिसेफ द्वारा झारखण्ड पंचायत विमेन रिसोर्स सेंटर, रांची का गठन और संचालन एक सराहनीय प्रयास माना जा रहा है। पंचायत मीडिया के जरिए सर्ड के प्रयासों को सूचनापरक बनाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों को ज्यादा व्यावहारिक और तथ्यपरक बनाने के लिए भी नूतन प्रयास हो रहे हैं।

सर्ड निदेशक आरपी सिंह कहते हैं कि सर्ड महज एक प्रशिक्षण केंद्र भर नहीं है। हमने लंबी यात्रा तय की है। वर्तमान में सर्ड ग्रामीण जनसमुदाय तथा खास तौर पर ग्रामीण गरीबों के टिकाऊ आर्थिक विकास एवं सामाजिक कल्याण संबंधी कारकों की पड़ताल एवं विश्लेषण करने का जिम्मा उठा रहा है। साथ ही सरकारी पदाधिकारियों के अन्दर ग्रामीण गरीबों की समस्याओं की समझ पैदा करने तथा उनके ज्ञान, कौशल में विकास करने के अलावा सरकारी पदाधिकारियों एवं प्रशासन के बीच समन्वय एवं प्रेरणा को बढ़ावा देना, क्षेत्र में कार्यरत पदाधिकारियों को सूचनाओं के सम्प्रेषण, लेखन तथा प्रभावी दस्तावेजीकरण हेतु सक्षम बनाना, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज से जुडे़ विशेषज्ञों के साथ संवाद एवं विचार मंथन तथा कार्यशाला आयोजित करना और प्रासंगिक विषयों पर प्रकाशन करने पर भी नजर रखता है। झारखंड पंचायत महिला संसाधन केन्द्र का संचालन के साथ-साथ केंद्र सरकार की महती योजना भारत निर्माण सेवक कार्यक्रम का संचालन भी प्रमुख है। पीएमआरडीएफ कार्यक्रम के बेहतर समन्वय व परिणाम के लिए प्रयास करने पर भी हमारी नजर है। श्री सिंह की बातों को समझा जाय तो सर्ड ग्रामीण विकास के एक प्रहरी और गाइड के बतौर अपने दायित्वों के निर्वाहन में लगा है।


‘सूचना में ही है शक्ति’

आजकल प्रसिद्ध कहावत है - सूचना में ही शक्ति है। जो जितना सूचनासंपन्न है, कामयबाी का चांस उसका उतना ही अधिक है। सर्ड ने इसे ध्येय बनाने पर भरसक काम किया है। इसके द्वारा झारखण्ड में ग्रामीण विकास के सशक्तिकरण के लक्ष्य को पूरा करने विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कार्यशाला आयोजित की जाती हैं। आवासीय सुविधाओं के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम तय किए जाते हैं। पंचायती राज, ग्रामीण विकास से जुड़े पदाधिकारियों, नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के लिए ‘प्रयोगशाला से भूमि तक’ पर केंद्रित प्रशिक्षण और उसका व्यवहारिक ज्ञान प्रदान किया जाता है। जिला एवं प्रखण्ड कार्यालयों में आॅफ कैम्पस प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाते हैं। मनरेगा, ग्रामीण विकास योजनाओं, भारत निर्माण सेवक प्रशिक्षण कार्यक्रम और झारखंड पंचायत महिला संसाधन केन्द्र का संचालन सर्ड की अहम उपलब्धियां हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (हैदराबाद), टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल र्साइंसेज (मुम्बई) तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय के शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना भी सर्ड की उपलब्धियों में है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए सीटीआई, ग्रामीण विकास, पंचायत राज विभाग से जुड़े वरीय अधिकारियों के अलावा जिन पांच सरकारी विभागों के अधिकार झारखण्ड में पंचायतों को प्रदान किए जा चुके हैं, उनसे जुड़े विभागीय अधिकारियों व विशेषज्ञ प्रशिक्षण कार्यक्रमों के द्वारा सर्ड, झारखण्ड का हाथ सबल कर रहे हैं।

2000 में अलग राज्य बनने के बाद के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो सर्ड, झारखण्ड द्वारा पिछले दो वर्षों से प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए निर्धारित आंकड़े पीछे छूटते जा रहे हैं। यह बताता है कि इसकी स्वीकार्यता और इसकी पहुंच लोगों तक सहज होने लगी है। वर्ष 2011-12 में 38 प्रशिक्षण कार्यक्रम निर्धारित किए गए थे, पर यह 66 तक पहुंच गया। इसी तरह 2012-13 के लिए निर्धारित 100 कार्यक्रम का आंकड़ा 129 को छू गया।     

वर्ष     प्रषिक्षण के लिए अनुमानित सं      आयोजित प्रषिक्षण कार्यक्रमों की सं       प्रतिभागियों की सं
2010-11                 42                                                       18                                                  624
2011-12                 38                                                       66                                                  2370
2012-13                 100                                                     129                                                4148
2013-14                 154

और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अलावा सर्ड, झारखण्ड द्वारा किये जा रहे प्रयासों को दृष्य-श्रव्य माध्यमों के विभिन्न स्रोतों द्वारा लोगों तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब तक सर्ड के द्वारा जलछाजन अभियान, लक्ष्मी लाडली योजना, महिला सशक्तिकरण, ग्रामसभा सशक्तिकरण, झारखंड के विकास मित्र, मनरेगा, आइएपी, बीएनवी और अन्य अहम सरकारी योजनाओं से संबंधित डाॅक्यूमेंट्री का निर्माण कराया जा चुका है। इसके अलावा विभिन्न मुद्रित सामग्रियों के द्वारा भी सर्ड ने नागरिकों तक अपनी पहुंच आसान बनाने की चेष्टा की है।

जैसे - 1. स्थानीय विकास की प्राथमिकता 2. बिटिया है तो कल है 3. ट्रेनिंग कलेण्डर 4. झारखण्ड किसान-मित्र डायरी  5. भारत निर्माण सेवकों के लिये प्रधानमंत्री का संदेश, भारत निर्माण सेवकों के लिये संदेश 6. भारत निर्माण सेवक-दिग्दर्शिका 7. ग्रामीण विकास योजनाओं का सूत्रीकरण 8. झारखण्ड पंचायत महिला रिसोर्स सेन्टर का ब्रासियर 9. झारखण्ड मे जैव-विविधता के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका 10. पंचायत की पगडंडी-गुड प्रेक्टिसेस व अन्य।

वक्त के साथ कदमताल

सर्ड की जब स्थापना हुई थी तो उस दौरान इसका लक्ष्य ग्रामीण विकास से जुड़े संस्थानों, प्रतिनिधियों, अधिकारियों व अन्य के क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण तथा शोध एवं परामर्श तक सीमित माना जाता था। पर वर्तमान संदर्भ और ग्रामीण विकास प्रकृति के अनुरूप सर्ड, झारखण्ड ने अपने लक्ष्य एवं दृष्टिकोण का दायरा विस्तृत किया है। सर्ड निदेशक आरपी सिंह के मुताबिक अपने मूल लक्ष्यों के अलावा हमने उन सभी संभावनाओं की पता लगाने की कोशिश की है जिससे इस राज्य के समग्र ग्रामीण विकास में कोई भी गुंजाइश बन सके। हां, एक बड़ी जिम्मेदारी यह भी हमें मिली है कि हम अपने पंचायत प्रतिनिधियों को अपना हमकदम बना सकें। 32 वर्षों में पहली दफा यहां पंचायती चुनाव हुए हैं। लगभग 53,000 पंचायत प्रतिनिधि गांव से जिला स्तर तक निर्वाचित होकर आए हैं। उनकी जरूरतों को समझते हुए ही हम अपनी योजनाएं और कार्यक्रम तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही हमारा प्रयास छोटा हो पर बड़ी कामयाबी हमें मिलने लगी है। पहली दफा चुनकर आये हमारे पंचायत प्रतिनिधि काफी तेजी से अपने दायित्वों को सीखने-समझने लगे हैं, सकारात्मक नतीजे भी आने लगे हैं। पंचायत महिला सेंटर के जरिए महिला प्रतिनिधि लोकतंत्र को सशक्त बना रही हैं। बीएनवाई, पीएमआरडीएफ स्कीमों के जरिए गांव-गांव को समझने और उसे संवारने में भी कामयाबी आने वाले समय में मिलेगी। पंचायती राज पदाधिकारी सलिल कुमार अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते हैं कि निःसंदेह सर्ड सार्थक तरीके से अपनी भूमिका का निर्वाहन कर रहा है। अगर सर्ड की इकाईयों को क्षेत्रीय, जिले स्तर पर खड़ा किया जाए और पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग और सुझाव लेते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार हो तो संभव है कि सर्ड और भी दमदार तरीके से सामने आएगा।

चूंकि झारखण्ड देश में सबसे आखिर में बना 28वां राज्य है। राजनीतिक तौर पर अब तक सबल भी नहीं हो सका है। पंचायत चुनाव भी एक लंबे अंतराल के बाद 32 सालों पर हुए। अधिकांश पंचायत प्रतिनिधियों के लिए पंचायती व्यवस्था का अनुभव पहली दफा हुआ है। नक्सली समस्या भी एक बड़ी बाधा है। इन चुनौतियों के बीच भी सर्ड, झारखण्ड की इस राज्य के ग्रामीण विकास में हो रही पहल स्वागतयोग्य तो मानी ही जाएगी। कारवां जारी है।




---अमित झा---
रांची 
(झारखण्ड मीडिया फेलोशिप के तहत शोध आलेख)



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