32 सालों बाद झारखंड में हुए पंचायत चुनाव में महिलाओं ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। यहां की परिस्थितियों के मद्देनजर 50 फीसदी सीट उनके लिए आरक्षित की गई थी। आज झारखंड की पंचायती राज संस्थाओं में 57 प्रतिशत महिला प्रतिनिधि हैं। इसका बड़ा असर यह हुआ है कि वे न सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई हैं बल्कि समाज के हित में वाजिब फैसले भी ले रही हैं। और इन प्रयासों को झारखंड पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर बखूबी गति देने में लगा है।
पंचायतों से ही महिला सशक्तिकरण की पहल
आधी आबादी को साथ लिए बिना लोकतंत्र की सफलता भी अधूरी समझी जाती है। इसी कारण भारतीय संविधान के 73वें संशोधन के जरिए भारत में महिला सशक्तिकरण को एक नया आयाम प्रदान किया गया है। विकास में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं में कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 33 फीसदी और अब 50 फीसदी आरक्षण देने से वे राजनीतिक, सामाजिक रूप से सशक्त हुई हैं।
वर्ष 2006 में 50 फीसदी आरक्षण देने का कारवां बिहार से चलकर राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल में भी पहंुच चुका है। ऐसे में केंद्र की ओर से सभी राज्यों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था किए जाने की पहल मील का पत्थर साबित हो रही है। निश्चित रूप से महिला सशक्तिकरण की दिशा में पंचायत ने अमूल्य योगदान दिया है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में पंचायत से शुरू हुआ कदम अब उच्च सदन तक पहुंच गया है। झारखण्ड में जब 2010 में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आरंभ की गई तब संविधान की धारा 243 (डी.) के तहत महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण तय किया गया था। आज झारखंड, पंचायत में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के मामले में अग्रणी राज्य बन गया है। यहां की पंचायती राज संस्थाओं में 57 फीसदी महिला प्रतिनिधि हैं जो देश में सबसे अधिक है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधि अपने आंचल में पड़े पंचायती राज संस्थान को अपने कुशल नेतृत्व से सामाजिक परिवर्तन का एक धारदार अस्त्र बना रही हैं। इस तरह देखा जाए तो पंचायत से ही महिलाओं के सशक्तिकरण की शुरूआत हुई है और झारखंड इसके लिए आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
महिला पंचायत प्रतिनिधियों का सशक्तिकरण
राजधानी रांची के हेहल स्थित राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (साउथ कैंपस, काजू बगान) में स्थित है झारखंड महिला रिसोर्स सेंटर। यह संस्थान रांची के पिस्का मोड़ से पंडरा जाने वाले रास्ते के बीच है। रिसोर्स सेंटर के प्रमुख सहयोगियों के तौर पर राज्य ग्रामीण विकास संस्थान, यूनिसेफ, झारखंड राज्य महिला आयोग और मंथन युवा संस्थान, रांची की प्रमुख भूमिका है। झारखंड में पंचायत के लगभग 57 प्रतिशत पदों पर महिलाओं ने अपना झंडा गाड़ा है। इनमें कुछ महिला प्रतिनिधियों के लिए उनका शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक स्तर बाधा बनती है। कुछ प्रतिनिधियों के लिए सामाजिक व्यवस्था के कारण परिवार के पुरुषों पर निर्भरता देखी जाती है। इसलिए, पंचायती राज के सफल क्रियान्वयन एवं ग्रामीण विकास के लिए महिला पंचायत प्रतिनिधियों के सशक्तिकरण हेतु यह केंद्र बनाया गया है। महिला सशक्तिकरण अभियान के बतौर रिसोर्स सेंटर को महिला सशक्तिकरण में ‘मील का पत्थर’ के के तौर पर रेखांकित किया जा रहा है।
महिला प्रतिनिधियों को मिला सहारा
झारखंड पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर के बहाने निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधियों को एक बड़ा संबल मिला है। 32 सालों बाद पहली दफा हुए पंचायत चुनाव में महिला प्रतिनिधियों की बड़ी भागीदारी है। तकरीबन सभी के लिए यह पहला अनुभव है। घरेलू और सामाजिक स्तर पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को घर से बाहर पैर रखने में बड़ी दिक्कत थी। दिक्कत यह भी थी कि पंचायती व्यवस्था उनके लिए अनजानी-सी थी। इसे समझने, जानने की छटपटाहट थी पर ऐसा कोई जरिया नहीं था जो उनके लिए आगे आये। कहने को तो पंचायतों में पुरुषों से अधिक प्रतिनिधित्व महिलाओं का था। पर व्यवहारिक तौर पर उनके घर के पुरुष ही उनका प्रतिनिधित्व चुनाव जीतने के बाद से करते दिखे थे। घरेलू, सामाजिक चुनौतियों के अलावा चंूकि साक्षरता, शिक्षा की दृष्टि से झारखंड पिछड़ा रहा है। 1991 में दक्षिणी बिहार में 41.39 साक्षरता दर ही थी जो अलग राज्य बनने के बाद 2001 में 54.13 प्रतिशत तक पहुंचा। 24 जिलों में तकरीबन तीन करोड़ की आबादी है। पुरुषों में साक्षरता दर 53.49 प्रतिशत है जबकि महिलाओं की मात्र 24.02 प्रतिशत (2001 की रिपोर्ट के आधार पर)। जाहिर है, महिलाओं के मामले में इतने कम साक्षरता दर वाले राज्य में महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होती। अशिक्षा, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से सुदूरवर्ती क्षेत्रों, गांवों में डायन-बिसाही जैसी घटनाएं सामने आती रहती थीं। 2000 में राज्य गठन से लेकर पंचायत चुनाव होने तक, झारखंड में राजनीतिक स्थिरता देखने को नहीं मिली, इसका गहरा असर महिलाओं की दशा-दिशा सुधारने में जो पड़ा सो अलग।
झारखंड महिला रिसोर्स सेंटर ने इस तस्वीर को बदलने में पहल की है। सेंटर के समन्वयक डाॅ विष्णु राजगढि़या बताते हैं कि अब तक की व्यवस्था में पंचायत प्रतिनिधियों को महज पंचायती राज के बारे में बुनियादी बातें भर सीखने को मिलती थीं। महिला रिसोर्स सेंटर के जरिए महिला प्रतिनिधियों को पंचायतों को प्रभावी बनाने और ग्रामीण विकास का आधार बनाने की कला सीखने को मिल रही है। पंचायतें किसी मुखिया या दबंग की जागीर ना बन जाये, इसे समझने का अवसर मिल रहा है। झारखंड में समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास, कृषि, मत्स्य, गव्य, पशुपालन एवं गन्ना विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग, प्राथमिक शिक्षा विभाग द्वारा अपने अधिकार पंचायतों को हस्तांतरित किए गए हैं। इतने महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारों का प्रभावी उपयोग गांव-गांव, पंचायतों की तस्वीर बदल सकता है। इनसे जुड़ी जानकारियां उन्हें विभिन्न स्तरों पर दी जा रही हैं। इसके अलावा एनजीओ, काॅरपोरेट घरानों जैसे जिंदल आदि के साथ मिलकर महिला हिंसा, पलायन और अन्य सामाजिक मुद्दों, समस्याओं के बारे में उन्हें जागरूक किया जा रहा है। डाॅ राजगढि़या बताते हैं कि पंचायत चुनाव को दो साल हो चुके हैं। कई पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों ने छोटे-छोटे प्रयासों के जरिए बड़े बदलाव का कारनामा कर दिखाया है। ऐसी महिला प्रतिनिधियों से जुड़ी सक्सेस स्टोरी और उनके प्रचार-प्रसार की बदौलत दूसरे प्रतिनिधियों को बताया जा रहा है जिससे उनका मनोबल और पंचायती व्यवस्था को मजबूत बनाने में वे और भी सक्रिय तौर पर पहल कर सकें।
किरण पाहन, रांची जिले के टाटी पूर्वी पंचायत की मुखिया हैं। पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर के जरिए कई चरणों में उन्हें ग्रामीण विकास और प्रभावी पंचायत के लिए वातावरण तैयार करने संबंधी प्रशिक्षण मिला। कहती हैं कि रिसोर्स सेंटर के बहाने हमें अपनी ताकत को समझने का मौका मिला है। साथ ही ग्रामीण विकास से जुड़े इकाईयों, संस्थानों, निकायों, सरकार को भी बताने का अवसर है कि पंचायत को प्रभावी बनाने के कितने दूरगामी परिणाम दिख सकते हैं। अपनी समस्याओं पर खुलकर बात करने के लिए एक मंच मिल गया है। आज हमारा आत्मविश्वास इस अर्थ में बढ़ा है कि हम भी समाज का नेतृत्व कर सकते हैं। इसके विकास में भागीदार बन सकते हैं। सर्ड, झारखंड के निदेशक श्री आरपी सिंह मानते हैं कि झारखंड पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर के बहाने समाज में स्त्री-पुरुष में गैर-बराबरी जैसी भावना कमजोर होगी। ग्रामीण विकास संबंधी प्रमुख योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के माध्यम से मिलेनियम डेवलपमेंट गोल हासिल करने की दिशा में महिला पंचायत प्रतिनिधियों की तकनीकी एवं प्रशासनिक क्षमता विकसित करने और उनकी क्षमता बढ़ाने में सेंटर लगा है। नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, क्षमता विकास के प्रयासों से यकीनन आने वाले समय में राज्य और देश को नई महिला नेतृत्वकर्ता मिलेंगी।
झारखंड पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। कल तक जो निर्वाचित महिलाएं घर की दहलीज से बाहर नहीं नजर आती थीं, आज आगे बढ़-चढ़कर मोर्चा संभाल रही हैं। अपनी पंचायत को संवारने की उनकी मुहिम शुरू हो चुकी है। रिसोर्स सेंटर ने उनमें अपने समाज के लिए सपने देखने, उसे पूरा करने और उड़ान भरने की हिम्मत देने की मुहिम शुरू कर दी है।
झारखंड में पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि
स्तर-------पुरुष/महिला-------एससी-------एसटी-------ओबीसी-------सामान्य-------कुल-------समग्र कुल
जिला परिषद पुरुष 20 68 31 80 199 445
जिला परिषद महिला 35 80 41 90 246
पंचायत समिति पुरुष 200 715 301 763 1979 4415
पंचायत समिति महिला 311 840 401 884 2436
ग्राम पंचायत पुरुष 1534 6209 2474 8002 18219 43557
ग्राम पंचायत महिला 3349 7597 4198 10194 25338
मुखिया पुरुष 182 1071 209 596 2058 4411
मुखिय -महिला 238 1190 263 662 2353
कुल 5869 17770 7918 21271 52828 52828
---अमित झा---
रांची
झारखण्ड



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