इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने केंद्र सरकार के स्तर पर डीएलएफ समूह की मदद कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रबर्ट वाड्रा को लाभ पहुंचाए जाने के आरोपों की जांच कराए जाने सम्बंधित रिट याचिका सोमवार को खारिज कर दी। लखनऊ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता की तरफ से दायर याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश शिव कीर्ति सिंह और न्यायमूर्ति डी़ क़े उपाध्याय की पीठ ने कहा कि चूंकि इस मामले में पूर्व में ही उच्च न्यायालय द्वारा रिट खारिज कर दी गई, अत: दोबारा सुनवाई का औचित्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि यह याचिका विचार योग्य नहीं है क्योंकि याची का इसके सम्बन्ध में कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।
कार्यकर्ता ने 9 अक्टूबर 2012 को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को इन आरोपों के सम्बन्ध में जांच कराने के लिए प्रत्यावेदन दिया जिस पर कोई कार्यवाही नहीं होने पर उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में रिट याचिका दायर की जो 3 मार्च 2013 को निस्तारित कर दी गई।
कार्यकर्ता को पीएमओ द्वारा सूचना के अधिकार(आरटीआई) में बताया गया कि उनका प्रत्यावेदन कार्यवाही हेतु विधि मंत्रालय भेजा गया है जिस पर ठाकुर ने 22 मार्च 2013 को विधि मंत्रालय को पत्र लिख कर कार्यवाही की मांग की। इसके बाद भी पीएमओ और विधि मंत्रालय के स्तर से कोई कार्यवाही नहीं हुई और इनके द्वारा आरटीआई में सूचना दिए जाने से भी लगातार इंकार किया जाता रहा। ऐसे में ठाकुर ने वाड्रा के खिलाफ आरोपों की जांच करा कर कानूनी कार्रवाई किए जाने के लिए याचिका दायर कर उच्च न्यायालय से अनुरोध किया था।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें