दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त महान पार्श्व गायक मन्ना डे लंबी बीमारी के बाद दुनिया को अलविदा कह गए। वह काफी समय से बीमार थे। फेफड़े में सक्रमण से जूझ रहे थे। गुरुवार तड़के करीब चार बजे उन्होंने बंगलुरु के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। चार महीने से वह इसी अस्पताल में भर्ती थे। अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि 94 वर्षीय मन्ना डे को पांच माह पहले सांस संबंधी समस्याओं की वजह से नारायण हृदयालय में भर्ती कराया गया था। उन्होंने गुरुवार तड़के तीन बज कर करीब 50 मिनट पर अंतिम सांस ली।
कुछ दिनों पहले मन्ना डे को छाती में संक्रमण की वजह से बैंगलुरू के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। वह काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि अंतिम समय में मन्ना डे के पास उनकी पुत्री शुमिता देव और उनके दामाद ज्ञानरंजन देव मौजूद थे। मन्ना डे की दो बेटियां हैं। एक बेटी अमेरिका में रहती है। उनके दामाद ने बताया कि उनके निधन से हम सब बेहद दुखी हैं। अंतिम समय में उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार को ही दिन में किया जाएगा।
1 मई 1919 को कोलकाता के एक बंगाली परिवार में जन्मे मन्ना डे ने अपने करियर में करीब 4000 से ज्यादा गाने गाए। मन्ना डे ने 1942 में फिल्म तमन्ना से अपने करियर की शुरुआत की। मन्ना डे के आवाज का इस्तेमाल जहां भी हुआ कामयाबी की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए पद्म भूषण और पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया।
मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1971 में पद्मश्री और 2005 में पद्म विभूषण से नवाजा गया। वर्ष 2007 में उन्हें भारतीय सिनेमा के प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने हिंदी, बंगाली समेत मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड और असमिया में गाने गाए।
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