हाल ही में रिलीज़ किए गए सरकारी आँकड़े ऐसा बताते हैं कि पूरे देश में सरकारी महकमों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक ख़ास किस्म का पक्षपात है। इसके कारण ही, अपराध से जुड़े मामलों में पुलिस मुसलमानों को बेवजह ग़िरफ़्तार करती है और सालों जेल में डाल कर रखती है। आख़िर में ज़्यादातर मुसलमान अदालतों से रिहा कर दिए जाते हैं।
इस रिपोर्ट के रिलीज़ को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं, ख़ासकर इसकी टाइमिंग को लेकर। इसमें दो राय नहीं है कि इस रिपोर्ट का मक़सद चुनावी लाभ लेना है, ख़ासकर ऐसे समय जब नरेंन्द्र मोदी को ख़ूब मीडिया कवरेज़ मिल रहा हो। और, शायद इसी प्रभाव में लोगों ने एक मूल सवाल नहीं पूछा- क्यों?
क्यों है मुसलमानों के बारे ऐसी धारणा जबकि देश की आज़ादी के बाद अधिकांश समय तक सेक्यूलर दल का शासन रहा है? नरेंन्द्र मोदी मुसलमानों के पक्षधर कभी नहीं रहे हैं, कम से कम उनका इतिहास तो यही बताता है। लेकिन उनसे मुसलमानों को बचाने की कोशिश करने वालों ने ऐसा क्या किया है जिससे उनकी विश्वसनीयता बने। मोदी गुजरात में मुसलमानों की सापेक्षित प्रगति का श्रेय ले सकते हैं, सरकारी आँकड़े बताकर। लेकिन काँग्रेस नीत यूपीए शायद अपने आँकड़े न दिखा पाए ऐसे किसी श्रेय की तलाश में। इसीलिए इसके शासनकाल के ही पुलिसिया आँकड़े बताकर कहीं मुसमानों को डराने की कोशिश तो नहीं कर रहीं है?
भारत सरकार के आँकड़े बताते हैं कि यूपीए का ध्यान मुसलमानों के कल्याण पर उतना नहीं है जितने का दावा वह करती है। सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय की स्थाई समिति की रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय 2012-13 में कुल प्रस्तावित बजट का एक तिहाई ((969.38 करोड़ रुपए) खर्च नहीं कर पाया। मंत्रालय को यह रकम सरेंडर करनी पड़ी। यह साबित करता है कि अल्पसंख्यक यूपीए सरकार के फोकस में नहीं हैं।
2012-13 में मुसलमानों के कल्याण के लिए पाँच योजनाएँ घोषित की गई। ये योजनाएँ हैं- राज्य वक्फ बोर्ड को मजबूत करना, विदेशों में पढ़ाई करने जाने वाले अल्पसंख्यक युवकों के शिक्षा लोन के ब्याज पर सब्सिडी देने की योजना, अति अल्पसंख्यक समुदाय की जनसंख्या में कमी को रोकने की योजना, सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षाओं में उत्तीर्ण अल्पसंख्यक छात्रों की मदद की योजना और कौशल विकास की योजना। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार इन योजनाओं पर वर्ष 2012-13 में एक रुपया भी खर्च नहीं कर पाई यूपीए सरकार।
यूपीए के पूरे कार्यकाल में एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार, 2004 से 2010 के दौरान मुसलमानों की स्थिति में गिरावट आई है। जस्टिस सचर कमीटी की रिपोर्ट तो आज़ादी के बाद से आज तक मुसलमानों के लिए चलाए गए कल्याणकारी योजनाओं की कलई खोल दी है। शहर ही नहीं गाँवों में भी मुसलमानों की स्थिति ख़राब है। ग्रामीण मजदूरों में मुसलमानों का प्रतिशत 41 है, जबकि जनसंख्या में उनका प्रतिशत योगदान काफ़ी कम है। और हमारे देश में मज़दूरों की स्थिति फ़्रांस के मज़दूरों जैसी नहीं है। इसका मतलब यह भी है मुसलमानों के लिए उपलब्ध रोजग़ार के अवसरों में कम आमदनी वाले अवसर ही हैं। यह उनकी कौशल और आर्थिक क्षमता के विकास की कमी को ही चिह्नित करता है।
ऐसे में यह सवाल वाजिब लगता है कि कहीं मोदी का विकास का मॉडल ख़तरनाक होते हुए भी कहीं मुसलमानों के लिए बेहतर तो नहीं है? वैसे भी मोदी अब पहले शौचालय, फिर देवालय की बात करने लगे हैं।
प्रभाष के दत्ता
09811-582-156

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