बच्चे देष का आने वाला भविश्य होते हैं। देष का भविश्य काफी हद तक इन बच्चों के कोमल कंधो पर टिका हुआ है। बच्चों और देष के भविश्य को उज्जवल बनाने में षिक्षा की अहमियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस हकीकत से तकरीबन सभी लोग वाकिफ हैं। लेकिन बहुत से लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए बच्चों के भविश्य से खिलवाड़ करने पर लगे हुए हैं। एक ओर तो हमारी सरकार षिक्षा देकर बच्चों के भविश्य को सुधारने के लिए बहुत सारी स्कीमें चला रही है, मगर कुछ लोग चंद मुनाफे के लिए इन स्कीमों को सफल नहीं होने दे रहे हैं। यह लोग अपने बच्चों को तो अच्छी षिक्षा दे रहे हैं, मगर दूसरे बच्चों के भविश्य की इन्हें कोई परवाह नहीं है। सरकार की ओर से स्कीमों के कार्यान्वयन के लिए दिया जाने वाला पैसा इन लोगों की तिजोरियों में जा रहा है। हैरत की बात यह है कि मीडिया के इस दौर में भी यह लोग खुलेआम सरकार को लूटने पर लगे हुए हैं और इसमें बर्बाद हो रहा है बच्चों का भविश्य। इस तरह की लूट खसोट की एक ताज़ा मिसाल जम्मू एवं कष्मीर के सरहदी जि़ला पुंछ की तहसील मेंढर के गांव चक बनोला के एक 36 साला पुराने मीडिल स्कूल की है। इस स्कूल में साठ छात्र-छात्राएं और चार अध्यापक हैं।
साल 2012-13 में इस स्कूल को मीडिल स्कूल का दर्जा मिला। इस स्कूल की इमारत काफी खस्ताहाल हो चुकी है और कमरे की दीवार और खिड़कियां दीमक की खुराक बन चुके हैं। इस स्कूल का जब जायज़ा लेने का मौका मिला तो स्कूल में पढ़ाने वाले एक अध्यापक सलीम ने बताया कि इस वक्त स्कूल में साठ बच्चे तालीम हासिल कर रहे हैं , मगर बच्चों के बैठने का कोई खास इंतेज़ाम नहीं है। इसी पुरानी इमारत की छत के नीचे हम लोग धूप बारिष में अपना सर छुपाते हैं। यहां पर सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली जो चीज़ नज़र आयी वह है, तीन कमरों वाली ऐसी इमारत जिसकी बुनियाद 2005 में पंचायत की निगरानी में रखी गई थी, उसकी सिर्फ दीवारें ही मुकम्मल हो पायी हैं। इस सिलसिले में जब यहां के सरपंच अकबर हुसैन से बात हुई तो उन्होंने बताया कि हम इस मामले को लेकर कई बार बीडीओ के पास गए, मगर उनका विभाग भी इसका हल निकालने में नाकाम नज़र आ रहा है। उन्होंन यह भी बताया कि बीडीओ और एसडीएम मौके पर आए थे, मगर वादों के सिवा कुछ नहीं मिला।
यही मामला जब बीडीओ तनवीर साहिब के सामने पहुंचा तो उन्होंने यह कहकर अपना दामन छुड़ा लिया कि इसकी पूरी जानकारी इससे संबंधित क्लर्क आपको दे देगा, मैं उससे कह देता हंू। मैं किसी ज़रूरी काम से कहीं जा रहा हंू। मगर क्लर्क ज़फर ने भी बड़ी चतुरायी से काम लेते हुए हुए यह मषविरा दिया कि पुरानी बातों को भूलना ही बेहतर होगा। लेकिन जब उसे लगा कि इससे काम नहीं चलेगा तो यह कहकर बात खत्म कर दी कि 2005 में सारा रिकार्ड जल गया था, मैं इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता। इनसे जब पूछा गया कि आवाम का कहना है कि छत के लिए दिया गया सीमेंट सरिया ठेकेदार षकील अहमद ने खुद ही हड़प कर लिया तो उन्होनें इस पर कहा कि हमारे पास फंड सिर्फ दीवारे खड़ी करने के लिए ही आया था और फिर खुद ही कहने लगे कि हमारा काम बिल्डिंग निर्माण के लिए मैटेरियल प्रोवाइड कराना होता है। कोई इसको कहां इस्तेमाल करे हमें इससे क्या लेना?
इस सिलसिले में चरखा टीम ने यहां के जोनल षिक्षा योजना अधिकारी मोहम्मद रषीद से मुलाकात की तो उन्होंने इस बात को माना कि ऐसी बहुत सारी इमारतें हैं जिनका हाल यही है जिसमें मोहल्ला चिंपां के गल्र्स प्राइमरी स्कूल का नाम लिया और बताया कि सर्वषिक्षा अभियान के तहत बनने वाली इस इमारत को बनते बनते आठ साल हो चुके हैं, मगर अभी भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। इसी तरह गल्र्स मीडिल स्कूल, सलवाह की एक इमारत का भी यही हाल है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मैं इस पर बीडीओ साहिब को लैटर लिखूंगा और देखता हंू कि क्या हो सकता है? इस बारे में जब इनसे कारण जानने की कोषिष की तो उन्होंने कहा कि मैं तो अभी नया आया हंू, अभी मुझे वक्त की ज़रूरत है और मुझे तीन ज़ोन देखने हैं। इन सारे मामलात के हल के बारे में सवाल करने पर उन्होंने कहा कि इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है, मगर थोड़ा वक्त लगता है। सवाल यह है कि जिस इमारत को बनते बनते पहले ही नौ साल का लंबा अर्सा गुज़र चुका है, मगर मुकम्मल न हो सकी, इसे अब कितना वक्त और लगेगा? ऐसे में इन हालात में पूर्व राश्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम का इस देष को 2020 तक सबको षिक्षित देखने का ख्वाब षायद ही पूरा हो पाएगा।
सिद्दीक अहमद सिद्दीक
(चरखा फीचर्स)

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