पत्रकार उत्पीड़न : लालफीताशाही व सफदपोशों के आगे चैथा स्तम्भ बौना - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

पत्रकार उत्पीड़न : लालफीताशाही व सफदपोशों के आगे चैथा स्तम्भ बौना

  • झूठ की बुनियाद पर पत्रकार सुरेश गांधी का उत्पीड़न 

journalist tortured
बाहुबलि विधायक सहित आरोपी प्रशासनिक अधिकारियों व पुलिस के चलते नहीं हो रही निष्पक्ष जांच समय-समय पर शासनिक, प्रशासनिक, जनप्रतिनिधियों व समाज में व्याप्त कुरीतियों व खामियों को खबरों की सुर्खिया बनाने वाले संत रविदास नगर भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी का उत्पीडत्र लगातार जारी है। सुरेश गांधी के उत्पीड़न के पीछे दो ही मूल कारण है। सुरेश गांधी माफिया जनप्रतिनिधियों सहित शासनिक व प्रशासनिक अधिकारियों की दरबारी करने के बजाय असहायों, पीडि़तों, उपेक्षितों, जुर्म के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए आम जनमानस के साथ चलें। अपनी खामी छिपाने व जनता की आवाज उजागर न हो इसके लिए झूठ की बुनियाद पर पहले गुंडाएक्ट, फिर जिलाबदर कर घर-बार लूटा गया। और जब इतने से भी हिक नहीं भरा तो पुलिस व प्रशासन की सारी कार्रवाईयों पर हाईकोर्ट के रोक के बावजूद कोतवाल संजयनाथ तिवारी सरेराह सड़क पर पकड़कर न सिर्फ लाठी-डंडे से पीटा, बल्कि कोतवाली लाकर पैर में कील ठोका, जख्मों पर नमक छिड़का और बाल उखाड़ा। अब बगैर किसी तथ्य के दर्ज फर्जी मुकदमें चार्जशीट लगा दी गयी। पुलिस व प्रशासन की इस हैरतअंगेज कारनामें से न सिर्फ सुरेश गांधी के दो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई चैपट हो रही है बल्कि वह अपनी पत्रकारिता भी नहीं करपा रहे है। भूखमरी के कगार पहुच चुके पी़िड़त पत्रकार सुरेश गांधी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे है, माफियाराज इस सरकार में सुनवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो रही कि पुलिस व प्रशासन सहित सरकार के माफिया जनप्रतिनिधि उत्पीड़नात्मक कार्रवाई में शामिल है। मुहर्रम के दिन भडकी हिंसा में अपनी नाकामी से खिसियाएं डीएम व एसपी निर्दोश युवक पर खुद लाठी बरसाने वाली फुटेज व सुरेश गांधी द्वारा प्रकाशित कराई गई खबरों आदि में चिन्हित है। जांच के आदेश देने वाले पुलिस अधिकारी खुद पीडि़त पत्रकार का घर-बार लूटने वालों के घर जाकर दरबार लगा रहे। वैसे भी हौसलाबुलंद लूटेरों ने कोतवाल संजयनाथ तिवारी के सह पर ही घटना को अंजाम दी है। और पीडि़त पत्रकार श्री गांधी व उनकी पत्नी रश्मि गांधी की याचिका पर जिला न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 156 3 के तहत मुकदमा दर्ज तो कर लिया है, लेकिन घटना में कोतवाल के आरोपित होने से विवेचना में लीपापोती की जा रही। पुलिस अपनी बचाव में लूटेरे माफियाओं की मदद कर रही है। डीजीपी के निर्देश पर प्रकरण की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी को न ही लूटेरों ने अपनी बयान दी और न ही आरोपित कोतवाल। पीडि़त पत्रकार ने मुख्यमंत्री समेत राष्टपति, प्रधानमंत्री व राज्यपाल व पुलिस महानिदेशक को रजिस्टर्ड पत्र भेजकर प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग की है। 

दरअसल, वर्ष 2012 में तत्तकालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी व पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला के कार्यकाल में एक के बाद एक आपराधिक व हिंसक घटनाएं होती रही और बाहुबलि विधायक विजय मिश्रा के बालू खनन से लेकर सड़कों के निर्माण में धांधली, जबरन प्रमुख कुर्सी पर कब्जा, पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं से साठ-गांठ, सांसद गोरखनाथ पांडेय के भाई की हत्या, पूर्व कैबिनेट मंत्री नंदगोपाल पर प्राणघातक हमला आदि काले कारनामें व दलित महिला संतोषी की बलात्कार आरोपी कालीन निर्यातक गुलाम रसूल आदि समाचार पत्र प्रकाशित व चैनल में समय-समय पर चलने से पत्रकार सुरेश गांधी से पुलिस व प्रशासन सहित बाहुबलि विधायक आदि कुपित थे। खासकर 25 नवम्बर-12 मुहर्रम के तीन दिन पहले दरोपुर व घमहापुर में ताजिया रास्ते के विवाद को लेकर छपी खबर के बाद भी एलर्ट होने के बजाएं प्रशासनिक लापरवाही से भड़की हिंसा व तोड़फोड़ की घटना पेपर की सुर्खिया बनने से हुई छिछालेदर से डीएम अमृत त्रिपाठी एसपी अशोक शुक्ला काफी खफा हो गए थे। वैसे भी डीएम अमृत त्रिपाठी नगर निकाय चुनाव के दौरान से ही खफा था। मतदान के दिन डीएम द्वारा कतार में खड़े युवक को थप्पड़ मारने के दौरान खिंची फोटो तो धौंस जमाकर डिलीट करा दी, लेकिन खबर छापी कि लोकतंत्र के पर्व पर हांफता रहा तंत्र, जगह-जगह जमकर हुई बूथ कैपचरिंग, नाकामी से खिसियाएं डीएम अमृत त्रिपाठी पत्रकार पर भड़के, जिसे पढकर वह चिढे थे। डीएम ने कार्रवाई की धमकी दी थी। महाशिवरात्रि के दिन अलसुबह हुए विस्फोट और कोतवाल संजयनाथ तिवारी की लापरवाही की खबर छपने के बाद वह सारी सीमाएं लांघकर श्री गांधी के खिलाफ बिना किसी अपराध के 18 मार्च 2013 को गुंडाएक्ट की रिपोर्ट एसपी अशोक शुक्ला के जरिए डीएम अमृत त्रिपाठी को प्रेषित की। डीएम ने गांधी का पक्ष सुने बगैर 25 मार्च को नोटिस दी। इसकी शिकायत गांधी ने 26 मार्च 2013 को रजिस्टर्ड पत्र के जरिए मुख्यमंत्री, डीजीपी,प्रमुख गृह सचिव, आईजी वाराणसी, राष्टपति, राज्यपाल समेत सभी जिम्मेदार अधिकारियों व एनएचआरसी, प्रेस कौंसिल आदि से की। पत्र में कहा गया कि वह पत्रकार है। पुलिस व प्रशासन अपनी नाकामी छिपाने के लिए झूठी कार्रवाई कर रही है। लेकिन सुनवाई नहीं हुई और 9 अप्रैल को डीएम ने जिलाबदर की कार्यवाही की। मेहीलाल बिल्डिंग अयोध्यापुरी कालोनी व आसपास के मुहल्ले में डुगडुगी बजाकर गांधी को गुंडा व अपराघी कहा गया। इसकी भी शिकायत गांधी ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों से रजिस्टर्ड पत्रके जरिए की। पत्र में कहा पुलिस झूठी कार्रवाई कर रही है, उनके उपर एक दो और फर्जी मुकदमें लगा सकती है। उनकी हत्या भी करा सकती है लेकिन सुनवाई नहीं हुई। जबकि राष्टपति व राज्यपाल आदि ने गृह सचिव समेत समेत संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर जांच के निर्देश दिए थे। लेकिन स्थानीय पुलिस प्रशासन नहीं सुना। 

मूलतः जौनपुर के गोपालापुर निवासी श्री गांधी पिछले 16 सालों में मेहीलाल बिल्डिंग अयोधयापुरी कालोनी स्टेशन रोड भदोही के किराए के मकान में रहकर पत्रकारिता करते है। वह दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान में वर्ष 1996 से 2012 तक, वर्ष 2012 से अब तक जनसंदेश टाइम्स व 2008 से अब तक आज तक टीवी न्यूज में भदोही के ब्यूरोचीफ है। उनके पास मौजूद अखबारों के हजारों बाईलाइन छपी खबरों के अलावा सैकड़ों ससमसामयिक आर्टिकल व वीडियो फुटेज व अन्य घटनाओं समेत दूरसंचार कार्यालय, इनकम टैक्स, बैंक, एलआईसी के अभिलेखों आदि में अंकित व पूर्व के आरोपों में विभिन्न न्यायालयों व जनसूचना विभाग से जारी कार्डो आदि प्रमुख साक्ष्य न सिर्फ पत्रकार बल्कि उस पते पर रहने के लिए पर्याप्त आधार है, लेकिन भदोही पुलिस है कि उन्हें पत्रकार नहीं होने का बयान सहित हाईकोर्ट के स्थगन आदेश व जिला न्यायालय से मिली जमानत आदेशों को भी खारिज कर दिया। इतना ही नहीं जिन तीन मुकदमों को आधार बनाकर गुंडाएक्ट व जिलाबदर किया गया है उसमें खुद पुलिस ने आरटीआई रिपोर्ट में मुकदमों को खत्म होने की बात कही गयी है, उन्हें भी अपनी करतूतों को छिपाने के लिए दरकिनार कर दिया है। मुहर्रम के दिन भड़की हिंसा, तोडफोडद्व टेन पर पथराव, मस्जिद में पुलिस द्वारा तोडफोड आदि घटनाओं के मामले में दोनों पक्षों की रपट व गिरफतारी जैसे साक्ष्य भी पुलिस व प्रशासनिक अफसरों की ओर से जारी बयान में कह दिया है कि तोडफोड आदि की घटना हुई ही नहीं है, जो हुआ था उसे आपस में सलटा लिया गया है। प्रशासनिक लापरवाही की घटना सहित सरकार गठन के दौरान जुलाई 2012 में कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव की मौजूदगी में बिना किसी इजाजत विजय मिश्रा जेल के बाहर आकर कार्यक्रम में सरीक होना, माफिया अतीक अहमद की मौजूदगी, अवैध बालू खनन, सड़कों के निर्माण में धांधली आदि की कवरेज समाचार पत्र में खबर के रूप में प्रस्तुत करना ही सुरेश गांधी के लिए अभिशाप बन गया। वह बाहुबलि विधायक सहित पहले से चिढे जिला प्रशासन व पुलिस के निशाने पर आ गए। सत्ता पक्ष का विधायक होने के नाते व प्रशासन की किरकिरी होने के नाते जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक भी सुरेश गांधी को दुश्मन की तरह देखने लगे। उसके बाद कानूनी हथकंडे से शुरू हुआ पत्रकार सुरेश गांधी का उत्पीड़न बदस्तूर जारी है। पीडि़त पत्रकार पर गुंडाएक्ट जिलाबदर व धमकी देने तक के मुकदमें लाद दिए गए। जबकि जबकि बाहुबलि विधायक विजय मिश्रा पर लूट, हत्या, डकैती, अपहरण, फिरौती, गुंडा टैक्स सहित 64 मामले दर्ज है। लेकिन उसके विरूध कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो रही है क्योंकि सत्ता प्रमुखों का उस पर बरदहस्त बताया जाता है। सत्ता का गुरूर इस कदर सिर चढकर बोल रहा है कि उसकी दबंगई के आगे कानून बौना पड़ने लगा है। उसकी काले कारतूते व प्रशासन की खामिया मीडिया में सुर्खिया न बने इसलिए पत्रकार पर पुलिसिया कहर जारी है। 

पत्रकार सुरेश गांधी के जिलाबदर के दौरान उनकी नामौजूदगी में 16 साल से तिनका-तिनका जुटाई गयी गृहस्थी व विवाह में मिले सामानो व जेवर आदि सहित 25 लाख से भी अधिक की गृहस्थी भी पुलिस ने लूटवा दिया। कोतवाल संजयनाथ तिवारी सारी सीमाएं लांघकर श्री गांधी के खिलाफ बिना किसी अपराध के गुंडाएक्ट व जिलाबदर की कार्यवाही की। इस बाबत श्री गांधी ने 23 मार्च 2013 को दोपहर मे एसडीएम न्यायालय में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई की कार्यवाही के तीनोें मुकदमों मे पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त है, तो कोतवाल ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही को साजिश मे लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रपट दर्ज कर दी। रपट में कहा गया है कि दो साल से गांधी विनोद गुप्ता के मकान में किराए पर रहते है और न ही किराया देते है औ न ही मकान खाली करते है। 23 मार्च को काजीपुर रोड स्थित मकान मालिक के घर में घूसकर मारपीट कर 5 लाख की रंगदारी मांगी। रंगदारी न देने पर लात घूसों से मारकर जान से मारने की धमकी दी। उसी दिन रात साढे आठ बजे दर्ज इस झूठी रपट में पुलिस ने बिना छानबीन किए दो और पत्रकारों का नाम दर्जकर मकान मालिक के चहेतो की गवाही लेकर चार्जसीट लगा दी। सवाल यह कि श्री गांधी उस मकान में पिछले 15-16 सालों से रह रहे है। तभी से नाम व पते जगह-जगह सरकारी अभिलेखों समेत प्राइवेट संस्थानों में दर्ज है। अगर गांधी ने 23 मार्च को मकान मालिक के घर गए तो काल डिटेल के साथ ही मोबाइल लोकेशन आदि की छानबीन क्यों नहीं की गयी। जो व्यक्ति पिछले 16 सालों से पत्रकारिता कर रहा हो और तमाम प्रशासनिक आफिसर आए और चले गए तब किसी को गांधी गुंडा नजर नहीं आएं। किसी से रंगदारी नहीं मांगी और न ही किसी भी जनता ने कोई मुकदमा ही लिखाया। तो फिर अचानक तत्कालीन अफसरों की निगाह में कैसे गुंडा बन गया और सप्ताहभर में गुडांएक्ट की कार्यवाही कर जिलाबदर कर दी। खास बात तो यह है कि किराए को लेकर मकान मालिक से विवाद था तो पहले क्यों नहीं रपट लिखी गयी। मकान मालिक ने न्यायालय में क्यों नहीं बेदखली का वाद दाखिल कर गांधी को नोटिस भेजवाई। रपट उस उक्त लिखी गयी जब पुलिस के झूठे गंुडाएक्ट की कार्रवाई पर श्री गांधी ने 23 मार्च को दोपहर में एसडीएम न्यायालय में अभिलेखों व साक्ष्यों के साथ झूठे आरोपों को चैलेंज किया। इतना ही नहीं झूठे तथ्यों पर पुलिस ने श्री गांधी सहित जिन दो और पत्रकारों के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट प्रेषित की है उसमें वादी विनोद गुप्ता से 24 मार्च व 30 मार्च को लिए गए बयान में कहा गया है कि श्री गांधी मकान खाली नहीं कर रहे है और किराया नहीं देते। 23 मार्च को घर पर आकर लात घूसों से मारने के बाद 50 हजार रुपये की रंगदारी मांग रहे है। इसके बाद 7 अप्रैल के बयान में हुबहू उन्ही पुलिसिया शब्दो व भाषा का इस्तेमाल करते हुए बयान दिया कि श्री गांधी 5 लाख रूपये की रंगदारी मांग रहे थे और न देने पर कमरा नहीं खाली करने व जान से मारने की धमकी दी और गांधी के साथ दो और पत्रकार नशीर कुरैशी व आफताभ आलम थे। सवाल यह है कि पूर्व के बयान में विनोद गुप्ता ने न हीं दो और पत्रकारों का नाम लिया और न ही रंगदारी 5 लाख की कही, जबकि सभी बातों को पुलिस की रटी-रटाई भाषा में बयान किया। इतना ही नहीं जिन तीन और गवाह अजय मौर्या पुत्र जवाहर लाल मौर्या निवासी चैरी रोड ब्लाक के पीछे, दिनेश मौर्या पुत्र ओमप्रकाश मौर्या व अंकूर खत्री पुत्र गोपीनाथ खत्री निवासी चकइनायत ने भी एक ही पुलिसिया भाषा में रटी-रटाई बयान दी है और तीनों का घर घटनास्थल से काफी दूर है। जबकि मकान मालिक का घर लबेरोड पर है अगल-बगल कई दुकाने है और वह खुद अलग-अलग स्थानों पर बने मकानों किराए पर दी हुए है और उनके घर पर तमाम लोगों का जमावड़ा रहता है। गवाही में किसी भी स्थानीय दुकानदार या पडोसी का नाम नहीं लिया गया है गवाह वहीं है विनोद गुप्ता के बेटे सुमित गुप्ता के दोश्त है, जिसके बारे में काफी लोग जानते है। वैसे भी अंकुर खत्री व दिनेश मौर्या ने डीआईजी को भेजे गए अपने हलफनामें में पहले ही कह चुके है कि उनके सामने धमकी मारपीट आदि की घटना नहीं हुई है। ना ही श्री गांधी ने 5 लाख की रंगदारी ही मांगी है। इतना ही नहीं रपट व बयान में लात-घूसों की बात कही गयी है जबकि मेडिकल रिपोर्ट में घातक चोटो की बात है। जिस एमबीएस अस्पताल की रिपोर्ट है उसके बारे में एक-दो नहीं कई बार समाचार पत्रों में खबरे छपी है कि पैसे के बल पर एमबीएस में बनती है फर्जी मेडिकल रिपोर्ट। 

श्री गांधी का कहना है कि उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के दौरान से ही उच्चाधिकारियों समेत उच्च न्यायालय से अपने आवेदनों के जरिए कह चुके है कि पुलिस अपनी खामियों को छिपाने के लिए ही कार्रवाई कर रही है जो अब पुलिस अपने बचत में खामियों को छिपाने के लिए लूटेरों की मदद कर रही है। कालोनी में रह रहे लोगों को बयान न देने के लिए धमकी दी जा रही है। इतना ही नहीं जमानत व स्थगन आदेश के बाद पुलिस ने 13 जून को श्री गांधी को पकड़कर सरेराह मारा-पीटा व डीजीपी के कहने पर छोड़ दिया उसमें भी पुलिस मुठभेड की फर्जी रपट दर्ज की है। हालांकि उच्च न्यायालय ने पुलिस की इस झूठे कार्रवाई पर प्रोसिडिंग स्टे दे दिया है। पुलिस की इस कार्रवाई न सिर्फ बच्चों की पढाई लिखाई चैपट हो रही है बल्कि श्री गांधी अपनी पत्रकारिता भी नहीं कर पा रहे है। श्री गांधी का कहना है कि एक दशक पूर्व बाहुबलि सांसद धनंजय सिंह के नाम पर सरेराह इनकांउटर में चार निर्दोष युवकों की हत्या के मामले में 36 पुलिसकर्मियों को जेल के सलाखों में ढकलने सहित दलित महिला संतोषी बलात्कार कांड के आरोपी को अपनी कलम के ताकत पर न सिर्फ जेल भेजवा चुके है। उस दौरान भी प्रशासनिक अधिकारियों का कोपभाजन बनना पड़ा, लेकिन वह पीछे नहीं हटे। उसी तर्ज पर आज भी वह किसी भी हाल में पीछे नहीं हटने वाले। न्यायालय में विश्वास व इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले गांधी का दावा है कि वह पूरे दमखम के साथ पुलिस व प्रशासनिक ज्यादितियों का मुकाबला करेंगे।

उत्पीड़न की कार्रवाई व पूर्व की शिकायतें, डीएम अमृत त्रिपाठी ने 25 मार्च 2013 को नोटिस चस्पा कराई 
26 मार्च को रजिस्टर्ड पत्र से राष्टीय मानवाधिकार आयोग समेत मुख्यमंत्री, डीजीपी, प्रमुख गृह सचिव, आईजी वाराणसी, राष्टपति, राज्यपाल समेत सभी जिम्मेदार अधिकारियों व प्रेस कौंसिल आदि को भेजा। पत्र में कहा वह पत्रकार है। पुलिस व प्रशासन अपनी नाकामी छिपाने के लिए झूठी कार्रवाई कर रही है। लेकिन सुनवाई नहीं हुई 01-04-2013 को फिर उन्हीं अधिकारियों को पत्र भेजकर मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता द्वारा दर्ज झूठी रपट की जांचकर इक्सपंज करने की मांग की। पत्र में डिस्टिक्ट बार एसोसिएसन, ज्ञानपुर व भदोही तहसील बार एसोसिएसन के अध्यक्ष सहित सौ से अधिक अधिवक्ताओं के हस्ताक्षरित पत्र के अलावा दो दर्जन से अधिक सभासद व कालीन निर्यातकों, पत्रकार संगठनों सहित समाजसेववियों के हलफनामा भी संलग्न थे। हलफनामा में सभी ने कहा था कि गांधी अच्छे पत्रकार है उनकी असामाजिक कार्यो में संलिप्तता नहीं रही है। लेकिन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी नहीं सुना और 9 अप्रैल को उना पक्ष सुने बगैर जिलाबदर की कार्यवाही कर दी। झूठी मुकदमें की भी जांच नहीं होने दी। और इसी दिन मेरे मकान के आसपास व मुहल्ले में डुगडुगी बजाकर उन्हें गुंडा व अपराघी कहलवाया गया। 9 अप्रैल को ही एनएचआरसी समेत सीएम, प्रमुख गृह सचिव, डीजीपी आदि सभी जिम्मेदार अधिकारियों से रजिस्टर्ड पत्र भेजकर की। कहा, पुलिस उन पर एक-दो और फर्जी मुकदमें लगा सकती है। पुलिस मेरी हत्या भी करा सकती है, मारपीट सकती है, बर्बाद कर सकती है, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। 22 अप्रैल 2013 पत्र संख्या पी 2/सी/2204130195 में अंडर सके्रटरी चिराब्रता सरकार ने प्रमुख गृह सचिव उप्र व राज्यपाल ने पत्रांक संख्या पी-2415/जीएस दिनांक 29 अप्रैल 2013 में अनुसचिव श्री राज्यपाल मधुबाला सहगल ने प्रमुख गृह सचिव को भेजकर जांच एवं उत्पीड़नात्मक कार्रवाई पर रोक का आदेश दिया। लेकिन, कोतवाल संजयनाथ तिवारी के चलते उत्पीड़नात्मक कार्रवाई जारी रहा। जब सुरेश गांधी जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर रहकर मुकदमों की पैरवी कर रहे थे, तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी की साजिस में आकर मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता आदि ने दिनांक 07-05-2013 को जब उनकी पत्नी रश्मि गांधी बाजार गयी थी तो इन लोगों ने शाम 5 बजे कमरे में लगे तालो को तोड़कर आलमारी में रखे विज्ञापन के 1 लाख 55 हजार रुपये नगद, सोने की दो चेन, सोने की दो अंगूठी व सोने की चार चूड़ी सहित कई जरुरी कागजात उठा ले गए। उस दौरान मकान मालिक विनोद गुप्ता व उसके बेटे सुमित गुप्ता व उसके दो अन्य साथियों मां-बहन की भद्दी-भद्दी गाली देते हुए धमकी दी थी कि सुरेश गांधी को कोतवाल संजयनाथ तिवारी से रिपोर्ट कराकर जिलाबदर करा दिया है और वह जिस दिन कोतवाल के चंगुल में आयेगा कोतवाल संजयनाथ उसका हाथ-पैर तोड देंगे-जेल में बंद कर देंगे। कोतवाल संजयनाथ तिवारी से मेरी सेटिंग है। इस मकान में तुम लोगों को नहीं रहने देंगे। अभी तो जेवर व नगदी ले जा रहे है कमरा खाली नहीं किया तो फिर से ताला तोडकर सारा सामान उठा ले जायेंगे और तुम्हारी रपट भी नहीं लिखी जायेगी और तुम्हारे गांधी को जेल भेजवाकर ही छोड़ेंगे। इस घटना के तुरंत बाद सुरेश गांधी की पत्नी रश्मि गांधी ने कोतवाली पुलिस से शिकायत कर तहरीर दी, लेकिन जब रपट नहीं लिखा गया। 

08 मई 2013 को समस्त अधिकारियों को रश्मि गांधी ने पत्र भेजा कि उसके मकान का ताला तोड़कर लूट किया गया है लूट की घटना के बाद जब कोतवाली पुलिस तहरीर नहीं ली तो वह 10 मई 2013 को पुलिस अधीक्षक विजय कुमार दीक्षित से मिली। इसके बाद भी रपट नहीं लिखी गयी। 30 मई 2013 को रश्मि गांधी ने सीजीएम न्यायालय में 156 3 के तहत वाद दाखिल करने के लिए अधिवक्ता से याचिका तैयार कराई, देर हो जाने से याचिका दाखिल नहीं हो सका। 01-06-2013 को न्यायालय में याचिका दाखिल हो गया। इसके बाद अपने वह कमरे पर आई और ताला बंद कर अपने पति के मौसी के लड़के की शादी में शामिल होने के लिए बनारस से अपने पति सुरेश गांधी व बच्चों के साथ रांची चली गई। 01-02-2014 को ही मकान मालिक कोतवाल संजयनाथ तिवारी के सह पर कमरे का ताला तोड़कर 16 साल से तिनका-तिनका जुटाई गयी पूरी गृहस्थी सामान व मेरे विवाह में मिले सामानों को लूट ले गए, जिसकी अनुमानित कीमत 25 लाख रुपये से भी अधिक की है। रांची में संपंन शादी को निबटाकर 6 जून को बनारस आ गए। इसके बाद मकान मालिक की ओर से दर्ज फर्जी मुकदमें में हाईकोर्ट इलाहाबाद के आदेश पर जिला न्यायालय में हाजिर होकर 25 जून 2013 तक के लिए अंतरिम जमानत ले ली। 14 जून 2013 को साढे 5 बजे स्टेशन रोड भदोही स्थित पीएनबी एटीएम से पैसा निकाल रहा था कि उसी समय कोतवाल संजयनाथ तिवारी अपने हमराहियों के साथ पहुंच गए और श्री गांधी को पकडकर सरेराह लाठी-डंडे से मारने-पीटने लगे। मारपीट कर घसीटते हुए कोतवाली ले गए। इस दौरान श्री गांधी जेब में रखे हाईकोर्ट व जिला न्यायालय के आदेश को दिखाकर चिखता रहे कि जिलाबदर के मामले में हाईकोर्ट ने दिनांक 20-05-2013 को ही रोक लगा दी है, मकान मालिक के मुकदमें में जिला न्यायालय से 25 जून तक के लिए अंतरिम जमानत हुई है, लेकिन कोतवाल संजयनाथ तिवारी व उसके हमराह एक भी नहीं सुने और लाठी-डंडे से मारते रहे। कोतवाली ले जाकर मेरे में पैर में कील ठोक दिया। जखम पर नमक छिड़का। 

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