विशेष आलेख : क्यों सो गए दास्तां कहते कहते - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 27 जुलाई 2014

विशेष आलेख : क्यों सो गए दास्तां कहते कहते

अनीस भाई उर्दू भाशा सिर्फ भाशा ही नहीं बल्कि एक सम्पूर्ण हिंदुस्तानी संस्कृति  है। इस भाशा का जन्म भारत में हुआ लेकिन कुछ लोग अपनी तंग नज़री की वजह से इस भाशा को एक खास समुदाय से जोड़कर देखते हैं। जी हां यह प्रवचन हैं चरखा के अध्यक्ष षंकर घोश का। जिनका जन्म 14 सितंबर 1935 को पटना षहर में एक वरिश्ठ सरकारी अधिकारी एन एम घोश के घर में हुआ जो अंगे्रज़ी हुकूमत के दौरान बड़े पद पर कार्यरत थे जबकि इनकी माता घरेलू , धार्मिक और देष प्रेमी महिला थीं। षंकर घोश अपने चार भाई बहनों में सबसे बड़े थे। इनकी बुनियादी षिक्षा मिषनरी के अलग अलग स्कूलों में होती रही। इसलिए अंगेज़ी भाशा पर महारत रखते थे। षायद यही वजह थी कि उन्हें उर्दू भाशा नहीं आती थी लेकिन उर्दू न जानने का मलाल उन्हें जिंदगी भर रहा। उर्दू और उर्दू वालों से उनकी  मोहब्बत बहुत ज़्यादा थी। इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1997 में जब उन्होंने अपने बेटे संजोय घोश के असम में उल्फा के आतंकवादियों के हाथों अपहरण होने के बाद चरखा की कमान संभाली तो उन्होंने महसूस किया कि चरखा फीचर सर्विस को देष की दो बड़ी भाशाओं हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा उर्दू में भी षुरू किया जाना चाहिए। उन्होंनेे इस बात को महसूस किया कि देष में एक तबका ऐसा भी है जो सिर्फ उर्दू भाशा ही जानता है। इसलिए अगर हमने इस तबके के साथ काम नहीं किया तो यह हमारे काम के साथ नाइंसाफी होगा। इस ख्याल के आते ही मिस्टर घोश ने 2005 में चरखा फीचर सर्विस में उर्दू को भी षमिल किया। इस तरह उन्होंने दो बड़े काम किए एक तो उर्दू वालों की आवाज़ को चरखा हिंदी और अंग्रेज़ी फीचर सर्विस के माध्यम से बुलंद किया दूसरा सामाजिक मुद्दों पर उर्दू ज़बान में लिखे गए लेखों को उर्दू अखबारों और पत्रिकाओं में जगह दिलवाई। ?
           
shankar ghoshयह षंकर घोश का वह कारनामा था जो उन्होंने बड़ी खामोषी के साथ अंजाम दिया। आज चरखा हिंदुस्तान की तीन बड़ी भाशाओं में नौजवान ग्रामीण लेखकों के ज़रिए सामाजिक मुद्दों को प्रिंट मीडिया में लाने का काम बखूबी कर रही है। खासकर बिहार और जम्मू एवं कष्मीर में नौजवान उर्दू ग्रामीण लेखकों का एक बड़ा तबका न सिर्फ चरखा से जुड़ा हुआ है बल्कि अपने क्षेत्रों के सामाजिक मुद्दों को फीचर सर्विस के माध्यम से प्रिंट मीडिया में उजागर करने काम लगातार कर रहा है। इनके ज़रिए उठाए गए मुद्दों पर अधिकारियों ने न सिर्फ कान धरा है बल्कि इनकी समस्याओं का हल निकालने की भी कोषिष की है। मिस्टर घोश के इस कदम से एक ओर जहां आज बेआवाज़ उर्दू वालों की आवाज़ को एक ज़ोरदार मिल रही है वहीं उर्दू समाचार पत्रों को उर्दू में लिखने वाले नये नये कलमकार मिल रहे हैं। पहले उर्दू के जो लेखक अपने को ज़मीन पर बोझ समझते थे उनमें अब आत्मविष्वास की बहाली हो रही है। आज चरखा के ज़्यादा तक ग्रामीण लेखक किसी न किसी अखबार के लिए नौकरी कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर जम्मू प्रांत के पुंछ जि़ले में सैय्यद एजाज़ उल हक़ बुखारी, सिद्दीक अहमद सिद्दीकी, सैय्यद अनीस-उल-हक और रमीज़ राजा आदि। इसके अलावा चरखा अपने ग्रामीण लेखकों का ऐसे संगठनों से भी परिचय कराती है जो अपने क्षेत्र में बेहतर काम करने वालों को पुरस्कार देती है। चरखा की ग्रामीण लेखिका निकहत परवीन और कष्मीर के कुपवाड़ा से षगुफ्ता वानी को उर्दू में लिखे गए लेख की वजह से लाडली मीडिया अवार्ड मिला।  इसका पूरा श्रेय षंकर घोश को ही जाता है जिन्होंने अपनी कोषिषों के ज़रिए उर्दू वालों में एक गज़ब का जज़्बा पैदा किया। 
           
ज़्यादी तौर पर षंकर घोश जी से मेरा जो संबंध रहा मैं उसे कभी भूल नहीं पाऊंगा। मैं पहली बार चरखा से अगस्त 2008 में जुड़ा था। मैं किसी भी लिहाज़ से उनके बराबर नहीं था लेकिन फिर भी वह मुझे अनीस भाई कहा करते थे। इस दौरान कुछ खट्टे मीठे अनुभव भी हुए। यहां तक की किसी ने मेरे खिलाफ षिकायतों की एक लंबी सूची पेष की, जब मुझे पता चला तो मैंने कहा कि षंकर सर मैं इनमें से एक एक सवाल का जबाब देना चाहता हंू, उन्होंने मेरी एक न सुनी और कहा बेटे मुझे तुम पर पूरा विष्वास है, जाओ अपना काम करो। जाते समय उन्होंने मुझ से कहा कि अगर गली का कोई कुत्ता तुम पर भौंके तो तुम जबाब दोगे। अपने साथ घटी एक दूसरी घटना के बाद मैंने मिस्टर घोश को एक मेल लिखा और कहा कि सर मैं अब चरखा के साथ काम नहीं कर सकता क्योंकि मेरा नाम मिस्टर खान है। उन्होंने कहा बेटे तुम परेषान न हो मैं तुम्हारे साथ हंू। मैंने उनसे कहा कि मैं अपना निजी फोन पर जम्मू एवं कष्मीर के लेखकों की काल प्राप्त नहीं करूंगा, उन्होंने कहा कोई बात नहीं और फौरन अपने नाम से एक मोबाइल फोन खरीदकर हमें इस्तेमाल करने के लिए दे दिया। इस घटना के बाद मैं चरखा के लिए काम तो करता रहा लेकिन साथ में दूसरी नौकरी भी देखता रहा। इसी दौरान एक चैनल में मेरा चुनाव हो गया। मैंने आॅफिस आकर जब इस बारे में षंकर सर को बताया तो उन्होंने मुझे बधाई देते हुए कहा कि बेटे यह तुम्हारी जिंदगी है जो चाहे करो, मैं तुम्हारी तरक्की में रोड़ा नहीं बनूंगा, मगर दो दिन सोच लो फिर फैसला करना। मुझे विष्वास है कि आपको यहां से ज़्यादा पैसे मिलेंगे और नाम भी, मगर चरखा को जितना तुम समझ पाते हो षायद दूसरा और कोई नहीं। 
          
अगले दिन जब मैं आॅफिस आया तो देखा कि षंकर सर के जिस्म पर कई चोट के निषान लगे हुए थे। मैंने उनसे पूछा सर यह कैसे हुआ तो उन्होंने कहा कि षाम को चहल कदमी के लिए निकला था, कुछ सोचता हुआ जा रहा था कि एक गड्ढ़े में गिर पड़ा। दिल ही दिल मैं इस चोट का अपने आप को जि़म्मेदार मान रहा था। कुछ देर बार उन्होंने मुझसे सवाल किया कि आपने चैनल की नौकरी के बारे में क्या सोचा? मैंने कहा कि सर मुझे कहीं नहीं जाना है। यह सुनते ही उनका चेहरा खिल उठा, ताली बजाकर बोले षाबाष बेटे मुझे बहुत खुषी है। जब षंकर घोश अस्पताल में जिंदगी की आखरी सांसे गिन रहे थे तो उस वक्त में जम्मू एवं कष्मीर में था। जिस दिन मैं वापस आया उसी दिन यानी 14 जून रात 11 बजे उनके देहांत की खबर मिली। अगली सुबह मै जब षमषान घाट पहुंचा तो बड़ी बड़ी मीडिया षख्सियतों का मजमा लगा हुआ था। जब मेरी नज़र षंकर घोश की लाष पर पड़ी तो ऐसा महसूस हुआ कि वह कह रहे हैं कि अनीस भाई जून के महीने में बगैर एसी के एक पल भी गुज़ारना मुष्किल होता था अब यह लोग मुझे दहकती आग के हवाले करने जा रहे हैं, मैं चाहकर उनके इस काल्पनिक प्रष्न का उत्तर न दे सका। आंखों से न चाहते हुए भी आंसू निकल पड़े, जबकि ज़बान कह रही थी कि कहां से लाऊं कि तुझ सा कहंू जिसे। 




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अनीस-उर-रहमान-खान
(चरखा फीचर्स)

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