बसपा सुप्रीमों की चुप्पी की एक वजह यह भी हो सकती है कि गठबंधन के भविष्य की नतीजे की तलाश में किया हो। बहरहाल, उपचुनाव नतीजा अमित शाह एंड कंपनी को पसीने छुड़ाने वाला तो है ही, आत्ममंथन का भी है। यूपी में कितना विकास हो रहा है, कितना बिजली मिल रही है, सड़कों के निर्माण से लेकर ब्लाक स्तर तक किस कदर लूट मची है, किस कदर थानों में फर्जी मुकदमें हो रहे है, अपराध की घटनाओं में बाढ़ आ गई है, यह सब किसी से छिपा नहीं है। लेकिन योगी आदित्यनाथ-साक्षी महाराज के भाषण से चीढ़कर न चाहते हुए भी अल्पसंख्यक समुदाय ने सपा को वोट कोस-कोस कर दिया। इस चुनाव में अगर मायावती व आम आदमी पार्टी होती तो वह देखता कि कौन बीजेपी को हरा रहा है उसे वोट करता और इसी कंफयूजन का भाजपा को फायदा मिलता। जैसा कि अब तक होता आ रहा है। इसका मतलब कत्तई नहीं सोचना चाहिए कि सपा कों जनता ने जनाधार दिया है। यह जनता है, हर बार नये विकल्प पर विचार करना भलीभाति जानती है।
उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनाव के परिणाम जो आएं, वह तो होना था। वजह भी साफ है, मायावती यानी बसपा का चुनाव न लड़ना। ऐसा करना मायावती की विवशता भी थी और मजबूरी भी। उन्हें परिणाम का अंदाजा पहले से ही था। इस हालात में खिसकते अपने वोट बैंक को बचाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है। मतलब, मायावती की चुप्पी ने उपचुनाव परिणाम उन्हें बहुत कुछ बता गया। भविष्य में मुलायम के साथ यदि जाने की मजबूरी आई तो वह अपना सकती है। हालांकि यह प्रयोग कांशीराम के रहते पहले भी सफल हो चुका है जब भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने के दौरान ठेंगा दिखा दिया था। फिरहाल भाजपा के लिए तो खतरे की घंटे है ही, इसे इंकार नहीं किया जा सकता। नतीजा अमित शाह एंड कंपनी को पसीने छुड़ाने वाला है और आत्ममंथन का भी। भाजपा के लिए संकेत है कि जनता योगी आदित्यनाथ व साक्षी महाराज जैसे लोगों का मंचीय भाषण नहीं सुनना चाहती। दोनों के बयान से चीढ़कर न चाहते हुए भी अल्पसंख्यक समुदाय ने सपा को वोट कोस-कोस कर दिया। इस चुनाव में अगर मायावती, व आम आदमी पार्टी होती तो वह देखता कि कौन बीजेपी को हरा रहा है उसे वोट करता और इसी कंफयूजन का भाजपा को फायदा मिलता। जैसा कि अब तक होता आ रहा है। कम वोटिंग परसेंटेज, युवाओं और वोटरों का उपचुनाव में हिस्सा न लेना, भी एक वजह हो सकता है भाजपा की हार का।
अपने कुशासन के बावजूद मुलायम अगर विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं तो उन्हें अपने आचरण में परिवर्तन लाते हुए माफियाओं, बाहुबलियों, लूटेरे प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की छुट्टी करनी होगा। वरना जनता गाली देकर एक बार, दो बार ही पसंद करती है बार-बार नहीं। उत्तर प्रदेश में कितना विकास हो रहा है, कितना बिजली मिल रही है, सड़कों के निर्माण से लेकर ब्लाक स्तर तक किस कदर लूट मची है किसी से छिपा नहीं है। साम्प्रदायिकता को रोकने के लिए एक बड़ा वोट बैंक ने गाली दे-देकर पानी पी-पीकर वोटिंग किया है तो इसका मतलब कत्तई नहीं सोचना चाहिए कि आपकों जनता ने जनाधार दिया है। यह जनता है, हर बार नये विकल्प पर विचार करना भलीभाति जानती है। जहां तक मायावती का सवाल है तो वह अपने को चुप रखने के मिशन में काफी हद तक सफल रहीं। लालू-नीतीश के प्रयोग को मायावती ने यहां चुनाव न लड़कर टटोलने की कोशिश की है, जिसके संकेत उन्हें मिल गए है कि भविष्य में अगर कभी मुलायम के साथ जाने की मजबूरी हुई तो इसे आजमाया जा सकता है। सपाई भी मान रहे है कि बसपा का एक बड़ा धड़ा उपचुनाव में उनके साथ रहा। यहां स्पष्ट कर देना जरुरी है कि मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका जो हाल के घटनाओं से व्यथित था और मायावती अपना आस्था जता रहा था, वह भी साम्प्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए अपना गुस्सा पीकर सपा को वोटिंग कर दिया है। अगा बसपा मैदान में होती तो वह ऐसा कदापि नहीं करती। हो सकता था मुलायम-अखिलेश के जंगलराज से खिसियाई आम जनमानस, जो सेकुलर में विश्वास रखती है बसपा को ही वोट करता और उसका प्रत्याशी जीत के पायदान पर दिखाई पड़ता। वैसे भी दो राज्यों बिहार व झारखंड के उपचुनावों का नतीजा बता दिया था कि आने वाला वक्त गठबंधन का है।
जहां तक भाजपा की बात है तो उसके साथ तो यह होने वाला ही था। जिस तरह बेलगाम हुई महंगाई और जीते सांसदों द्वारा कर्मठ कार्यकर्ताओं से लेकर पीडि़त जनता की अनदेखी कर रहे है उसमें भारतीय जनता पार्टी को झटका लगना ही था। जो युवा नरेंद्र मोदी के लिए जान की बाजी तक लगा दी थी, उसका सांसदों ने जिस कदर उपेक्षा की है उनका मनोबल तो टूटना ही है। युवाओं व आम जनता को उम्मीद थी कि बेलगाम होती प्रशासन को उसके सांसद नियंत्रित करेंगे, लेकिन वह सिर्फ माला पहनने में ही व्यस्त दिखे। शायद यही वजह रहा कि आम जनमानस सहित युवा चुप रहने में ही अपनी भलाई समझे। जो युवा नौकरी छोडकर कर्ज लेकर रात दिन भाजपा का प्रचार किया अब उनकी पूछ नहीं रही। बीजेपी में जो सांसद जीते वह लगातार उनकी उपेक्षा कर रहे है। जीते सांसद अब सिर्फ चापलूसो व सपा-बसपा के दलाल पार्टी का कार्यकर्ता सांसदों के साथ मिलकर मजे कर रहे है। उपचुनाव में भाजपा ने आदित्यनाथ के जरिए वह प्रयोग दोहराने की कोशिश की जिसे जनता पहले ही नकार चुकी है। सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का प्रयोग विकास की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। जातिवादी समीकरणों ने भाजपा को फिर वहीं पहुंचा दिया जहां वह पहले खड़ी थी। कल्याण सिंह के बाद प्रदेश भाजपा के मौजूदा नेताओं में आक्रामकता का घोर अभाव है। वे मूल मुद्दों को लेकर दुविधा, असमंजस से घिरे हुए हैं। इसलिए न हिंदुत्व को लेकर मुखर हो पा रहे हैं और न विकास को हिंदुत्व के एक अपरिहार्य अंग के रूप में मतदाताओं को समझा पाए। बहुत दिनों से यूपी में टॉप टू बॉटम संगठन के ओवरहालिंग की जरूरत महसूस की जा रही है। उपचुनाव में कही भी भाजपा के सांसद या दिग्गज नेता नहीं दिखे। बसपा की नामौजूदगी का बहाना बता कर भले ही हर को हंसी में टाल दिया जाएं, लेकिन यूपी का नतीजा अमित शाह एंड कंपनी को कितना पसंद करती है इसका संकेत मिल गया है।
इस दौर में जहां सपा अपने हर कार्यकर्ता की कमाई के लिए खुली छूट दे रखी है, थानेदार से लेकर मंत्री का मोबाइल हर समय उसके लिए मौजूद रहता है ऐसे में बीजेपी सांसदों ने बीते 100 दिनों में अपनों से इतनी दूरी बना ली है कि कार्यकर्ता कमाई तो दूर हाल चाल भी नहीं ले सकता है। ईमानदारी की अलख ने अपनों को ही अलग कर दिया है ऐसे में छुटभैया नेता जो सौ दो सौ वोट की अवकात रखता है वो फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहा है। बीजेपी को यदि यूपी में बेहतर भविष्य बनाना है तो जनता के साथ इस भटके हुए कार्यकर्ता के लिए कुछ सॉलिड करना होगा। जबकि वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र गौतम की मानें तो बसपा के लिए बजी खतरे की घंटी है यह उपचुनाव। दलित वोटों की ठेकेदारी करने वाली बसपा को दलित समाज ने 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के विधान सभा चुनाव तथा 2014 तक हुए लोकसभा चुनाव में हुई गलतियों को सुधारने का मौका दिया था। लेकिन बसपा 1984 वाले दौर से बाहर नहीं आ पा रही है। यही वजह है कि दलित समाज के युवाओं ने उपचुनाव में दूसरे राजनीतिक दलों को वोट करके संकेत दे दिए हैं कि अब वे बंधुवा वोटर नहीं हैं। सुभाकर दुबे जी भी मानते है, उपचुनाव में बीजेपी की शिकस्त के कारण योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज है। मोदी इस समय देश के हीरो हैं और देश का हर व्यक्ति चाहता है की उनका नेता मोदी जैसा हो किन्तु आदित्य और साक्षी ने साम्प्रदायिकता से भरे बयां देकर सब गुड गोबर कर दिया। कुछ हद तक इस बात में दम है, क्योंकि दोनों के बयान से अल्पसंख्यक काफी आक्रोशित दिखा और न चाहकर भी बसपा के अभाव में कोस-कोस कर सपा को वोट कर दी। आशुतोश शुक्ला का सवाल है कि मीडिया का जो तबका बीजेपी की हार का कारण तलाश रहा है उसे यह भी साफ कर देना चाहिए कि ये बीजेपी की हार है या गुंडाराज और बलात्कारियों के शासन की जीत है।
पिछले कुछ दिनों से मोदी सरकार की उपलब्धियों का ब्योरा देकर विकास दर को पटरी पर लाने की बात कही गयी, जो कुछ हद तक सच भी है। लेकिन मोदी का वह नारा जिसमें उन्होंने सबका साथ सबका विकास की बात की है, उसे लागू करना होगा। क्योंकि आम जनता को फिलहाल राहत नहीं मिली है। जनता चाहती है कि मोदी सरकार अब कम से कम अगले 100 दिनों में महंगाई की मार से उसे बचाए। राजस्थान और गुजरात में भाजपा को सत्ताधारी पार्टी होने का फायदा नहीं मिला। मतलब साफ है राज्य सरकार के कामकाज से भी जनता खुश नहीं है, क्योंकि इतनी जल्दी मोहभंग होने की बात तो आती नहीं है। जो पार्टी केन्द्र और इन दो राज्यों में सुनामी सरीखे जोर के बूते में सत्ता में बैठी, उस पार्टी के पैर एकदम से खिसक गए। इसलिए राज्यस्तरीय चुनाव की बात कहकर भाजपा इसे खारिज नहीं कर सकती। दरअसल जहां गैर भाजपादलों की सरकार है वहां भी उसे फायदा नहीं मिला। कहने का तात्पर्य यह है कि मतदाता अब सिर्फ विकास के नारों में नहीं उलझने वाला, उसे रिजल्ट चाहिए। विकास की जो धारा मोदी बहा रहे है, उसमें सिर्फ उपभाक्तावाद है, इंफ्रास्टक्चर के नाम पर कंस्टक्सन है। बड़ी-बड़ी कंपनियों को लाभ पहुंचाना व एफडीआई है। इसमें जनता को कोई सरोकार नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, विदेश नीति का सब्जबाग दिखाकर सत्ता में आने के बाद अब फिर से नया प्रयोग लव जेहाद, स्टेट के शीर्ष नेताओं का काउंटर कर योगी आदित्यनाथ-साक्षी महराज के भड़काउ भाषण व मोहन भागवत के हिन्दू राष्ट की दुहाई के बीच उपचुनाव ने संकेत दे ही दिया कि हिन्दू वोट बैंक तो एकजूट हो नहीं रहे उल्टे साम्प्रदायिकता के नाम पर दुसरी चीजें जरुर प्रभावित हो रही है।
(सुरेश गांधी)

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