जम्मू एवं कष्मीर में पिछले दिनों हुई भारी बारिष और बाढ़ ने लाखों लोगों के जीवन को अस्त व्यस्त कर दिया। राज्य के लोगों ने बाढ़ की वजह से तबाही का यह खतरनाक मंज़र लगभग 60 साल बाद देखा। इस तरह की प्राकृतिक आपदा को रोका तो नहीं जा सकता मगर इसकी वजह से होने वाले जान और माल के नुकसान को कम तो किया जा सकता है। सषस्त्र बलों और एसडीआरएफ के ज़रिए चलाए जा रहे राहत और बचाव कार्य की सराहना पूरे देष हुई। लेकिन सवाल यह उठता है कि हम पुरानी आपदाओं से अनुभव लेकर आने वाली आपदाओं से होने वाले नुकसान को क्यों नहीं रोक पाते? बाढ़ की वजह से राज्य में बुनियादी ढ़ाचा पूरी तरह से तहस नहस हो चुका है। बाढ़ ने पीएचई की 90 जल आपूर्ति योजनाओं को बुरी तरह प्रभवित किया है जबकि 4 बोर वैल पुरानी पुंछ, मेज़ फार्म, कलाई और चंडक क्षतिग्रस्त हो गए हैं। लोक निर्माण विभाग के अंर्तगत आने वाले 3 मुख्य पुल षेरे-कष्मीर, दुंदक और पमरोट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं जबकि सुरनकोट और मंडी के 18 पुल बाढ़ के साथ बह गए। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग की 121 सड़कों को बाढ़ ने ज़बरदस्त नुकसान पहंुचाया है। लैंड स्लाइड की वजह से पुंछ डिवीज़न में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी हुई 27 जबकि मेंढ़र में 29 सड़कों को नुकसान हुआ। आंकड़ों से स्पश्ट है कि पुंछ में सड़क संपर्क पूरी तरह से तहस नहस हो चुका है। ऊपर से संचार सुविधाओं के खस्ताहाल होने की वजह से बाढ़ में फंसे लोगों का अपनों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। मकान, पुल और स्कूल सब कुछ बाढ़ की भेंट चढ़ गए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य में पहले से ही बदहाल षिक्षा व्यवस्था क्या दोबारा पटरी पर लौट पाएगी? बाढ़ के प्रकोप से पूरे पुंछ में 198 स्कूल प्रभावित हुए हैं जिनमें से 46 को ही अभी तक क्रियाषील बनाया गया है। अध्ययन-अध्यापन का कार्य सुचारू रूप से चलाने की वजह से 33 इमारतों को किराए पर लिया गया है जबकि 37 टैंटों की अभी भी ज़रूरत है।
पुंछ से सिर्फ 10 से 12 किलोमीटर दूरी पर सीमावर्ती गांव सलोतरी स्थित है। 21 वीं सदी के इस दौर में भी यह गांव तमाम बुनियादी से वंचित है। लेकिन यहां की सबसे बड़ी समस्या षिक्षा की है। इस गांव में षिक्षा की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए मैं इस गांव के मोहल्ला खुब्बीनाड़ी वार्ड नंबर पांच के एक प्राईमरी स्कूल में गया तो स्कूल की हालत को देखकर दंग रह गया। स्कूल में दस बच्चों की कक्षा में एक अध्यापक कान पर हैडफोन लगाए बैठे थे। उस अध्यापक ने जब मुझे देखा तो कान से हैडफोन हटाकर अपनी जेब में डाल लिया। कक्षा में अध्यापक का यह रवैया देखकर मुझे अटपटा सा लगा।
स्कूल रिकार्ड के मुताबिक स्कूल में सिर्फ 33 बच्चे हैं। अध्यापक मोहम्मद रकीब ने बताया कि स्कूल में पीने के पानी का बंदोबस्त नहीं है। उन्होंने आगे बताया कि स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए टाट भी नहीं था जिस टाट पर बच्चे बैंठे हैं वह मैं आर्मी वालों से मांगकर लाया हंू। आर्मी वालों ने कुर्सियां दो साल पहले दी थीं जो छह माह में टूट गयीं थीं। मैंने जब उनसे पूछा कि स्कूल में मीड डे मील क्यों नहीं बनता तो इस पर उनका कहना था कि यहां पर सड़क की कोई सुविधा नहीं हैं। झुलास के बस अड्डे से राषन का सामान कंधे पर लादकर लाने में बड़ी दिक्कत होती है जिसकी वजह से मीड डे मील का खाना नहीं बन पाता है। इसके अलावा सबसे बड़ी वजह यह है कि सरकार राषन के लिए पैसा भी नहीं देती है। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि सरकार अगर राषन मुहैया करा भी दे तो मीड डे मील का खाना अच्छा कैसे बन सकता है क्योंकि खाना बनाने वाले की तनखाह सिर्फ 1000 से 1500 रूपये है। इतने कम पैसों में आप काम करने वाले से पूरी संजीदगी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इसके अलावा स्कूल की इमारत के पीछे पानी की निकासी के लिए नालियां नहीं बनी हुई हैं जिसकी वजह से गंदा पानी कमरों में आ जाता है। इसी गांव के एक और स्थानीय निवासी मोहम्मद कासिम (42) से जब मेरी बात हुई तो उन्होंने बताया कि हमारे गांव में ज़्यादातर छात्र-छात्राएं 8 वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं क्योंकि यहां सड़क की कोई सुविधा नहीं है और हाईस्कूल यहां से चार किलोमीटर की दूरी पर है। मायूसी के साथ अपने दर्द का इज़्हार करते हुए वह आगे कहते हैं कि हमारे गांव में एक हाईस्कूल होना चाहिए ताकि यहां के बच्चे भी पढ़कर लिखकर गांव और देष का नाम रोषन कर सकें। स्कूल की समस्या के बारे में गांव के एक और स्थानीय मोहम्मद इकबाल का कहना है कि हमारे गांव में सड़क नहीं है जिसकी वजह से अध्यापक समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाते हैं जिससे बच्चों की पढ़ाई का काफी नुकसान होता है।
बाढ़ के बाद पुंछ में षिक्षा का बुनियादी ढ़ाचा भी बुरी तरह तहस नहस हुआ है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पहले से ही बदहाल षिक्षा व्यवस्था क्या दोबारा पटरी पर लौट पाएगी? बुनियादी ढ़ाचे के पुनर्निर्माण और लोगों के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को जल्द से जल्द कदम उठाने की ज़रूरत है ताकि पुंछ के लोगों की जिंदगी दोबारा से सुचारू रूप से चल सके।
नज़ारत हुसैन शाह बुखारी
(चरखा फीचर्स)


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