विशेष आलेख : मौसम बदलाव का मुकाबला बारहनाजा से - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

विशेष आलेख : मौसम बदलाव का मुकाबला बारहनाजा से

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जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है। मौसम की अनिष्चितता बढ़ गई है। बदलते मौसम की सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ रही है। अब कोई भी मौसम अपने समय पर नहीं आता। जबकि किसान का ज्ञान व बीज मौसम के हिसाब से ही हैं। इससे किसानों की खाद्य सुरक्षा और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह एक बड़ी समस्या है। लेकिन उत्तराखंड के किसानों ने अपनी परंपरागत पहाड़ी खेती व बारहनाजा (मिश्रित) फसलों से यह खतरा काफी हद तक कम कर लिया है। 
              
वैसे तो इस समय हमारे देष के किसान अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहे हैं और यह संकट हरित क्रांति, सरकारी कृषि नीति और बाजार की नीतियों से आया है। जलवायु बदलाव का संकट भी मौजूदा विकास नीतियों से जुड़ा हुआ है। बेतहाषा औद्योगीकरण, षहरीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति ने इसे पैदा किया है। लेकिन मौसम बदलाव ने इसे और बढ़ा दिया है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन समुदायों को भुगतना पड़ रहा है जिनकी आजीविका सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है। किसान उनमें से एक है। 
            
उत्तराखंड में बीज बचाओ आंदोलन के प्रमुख विजय जड़धारी गढ़वाल जिले के एक गांव जड़धार में रहते हैं। उसी गांव के नाम पर उन्होंने अपना नाम कर लिया। विजय जड़धारी प्रयोगधर्मी किसान हैं। करीब तीन दषक पहले षुरू हुआ बीज बचाओ आंदोलन अब पहाड़ में फैल गया है। महिलाएं गांवों में बैठक कर इस चेतना को आगे बढ़ा रही हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के लोग अपने पारंपरिक बीजों से बारहनाजा की फसलें उगाते हैं। षुद्ध खानपान और पोषण की दृष्टि से जैव विविधता का संरक्षण भविष्य की आषा है।  

live aaryaavart dot comअगर हम उत्तराखंड की ही बात करें तो यहां सिंचित खेती 13 प्रतिषत और असिचिंत खेती 87 प्रतिषत है। सिंचित खेती में विविधता नहीं है जबकि असिंचित ख्ेाती में विविधता है। यह खेती पूरी तरह बारिष पर निर्भर है और जैविक भी है। देष में हरित क्रांति का संकट सामने आ गया है। देष के जिन इलाकों में किसान आत्म हत्या कर रहे हैं, वह वही इलाके हैं जहां हरित क्रांति का असर है। जलवायु परिवर्तन के दौर में सूखा, अतिवृष्टि ने यहां भारी तबाही मचाई है। 2013 जून में तो यहां असमय हुई भारी बारिष व बादल फटने से जो कहर बरपा है, उससे लोग अब तक नहीं उबर पाए हैं। ंइस बार अच्छी बारिष नहीं हुई। सिर्फ 14-15 अगस्त को अधिक बारिष हुई। बादल फटे। यह अप्रत्याषित थी, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। फिर बारिष नहीं हुई।
              
आज मौसम धोखा दे रहा है। कोई भी ऋतु समय पर नहीं आती। मानसून को चैमासा कहते हैं। आषाढ़, सावन, भाद्रपद व आष्विन में सबसे ज्यादा बारिष होती थी। अब बारिष कब आती है और चली जाती है, पता ही नहीं चलता। जब ऋतु समय पर नहीं आती तो फसल भी समय पर नहंी आती। हमारे परंपरागत देषी बीज ऋतु के मुताबिक पकते हैं। चतुर्मास जून के आखिर से षुरू होकर अक्टूबर तक थम जाता था। कहावत है कि ‘‘आठ गथे आषाढ़-छाला बरसना।’’ मानसून की पहली बारिष बहुत गरजना के साथ होती थी। बादल उमड़-घुमड़ कर चारों तरफ से आते थे। बरसते थे और नमी छा जाती थी। सावन के महीने को अंधियारा महीना कहते थे। न दिन में सूरज निकलता था, न रात में चांद-तारे। सावन में तारा नहंी दिखना चाहिए। 
        
एक तारा दिखाई दिया तो कहते थे- एक विस्बा अनाज कम हो जाएगा। इस माह में रिमझिम बारिष होती थी। हफ्तों तक झड़ी लगी रहती थी। बारिष के साथ कुहरा होता था। कुहरा जमीन से पैदा होता था। रिमझिम बारिष का पानी जमीन में समा जाता था। ऐसे मौसम में आसमान षांत होता था और गर्जना नहीं होती थी। भादो में जोर की बारिष होती थी। धूप भी होती थी। कभी-कभी बारिष होती थी और कभी कभी घाम भी होता था। इसी प्रकार षरदकालीन मौसम में नवंबर के मध्य में बारिष होती थी। दिसंबर से बर्फ और पाला पड़ना षुरू हो जाता था। जड़धारी बताते हैं कि उनके गांव में तीस साल पहले तीन फुट बर्फ पड़ती थी, अब तीन इंच भी नहीं पड़ती है। एक-दो इंच पडती है वह भी जल्द ही पिघल जाती है। 1980 के बाद से बर्फ ही नहंी देखी है।
          
तापमान इतना कम हो जाता था कि बाल्टी में पाले की परत जम जाती थी। बिल्कुल कांच की तरह। तालाबों में पाले की परत पत्थर से भी नहीं टूटती थी। आंगन में जमी बर्फ को पिघलाकर पषुओं को पानी पिलाते थे। खेतों की फसलें जैसे गेहूं बर्फ के नीचे दब जाता था। गेहूं दबने से उसमें ज्यादा कंसे फूटते थे। ज्यादा बालियां आती थी। बर्फ के पानी से खेत में मई-जून तक नमी बनी रहती थी। जबकि अप्रैल में  ही गेहूं की फसल आ जाती है। ंबर्फ और पाले से दो फायदे थे-एक, भूमि में जितने भी फसलों के लिए हानिकारक कीट व कीड़े-मकोड़े होते थे, वह मर जाते थे और दूसरा, फसलें भी अच्छी होती थी। यहां की अच्छी जलवायु, बारिष व बर्फ के कारण यहां के किसान एक जमाने में खाद्यान्न, जंगली फल-फूल और सब्जियों की उपज के कारण संपंन्नता और खुषहाली के साथ जीवनयापन करते थे। ं
           
लेकिन बारिष के वह चार माह अब गायब हो गए हैं। पहले पूरे देष का मानसून एक होता था। पर अब अलग-अलग मानसून हो गया है। अब एक ही गांव में दो-तीन तरह की बारिष होती है। ग्लेषियर सिकुड़ रहे हैं और पीछे की ओर भाग रहे हैं। सैकड़ों सालों से जमी बर्फ पिघल रही है। नई बर्फ नहीं बन रही है। लेकिन मौसम परिवर्तन से किसान बहुत कुछ सीख रहे हैं और वह इसी अनुसार खेतों में फसल बोते हैं। जहां जलवायु बदलाव का सबसे ज्यादा असर धान और गेहूं की फसल पर हुआ है वहीं बारहनाजा की फसलें सबसे कम प्रभावित हुई हैं। 
            
मंडुवा, रामदाना, झंगोरा, कौणी की फसलें अच्छी हुईं। 2009 में सूखे के बावजूद रामदाना की अच्छी पैदावार हुई और मंडुवा, झंगोरा भी पीछे नहीं रहे। मध्यम सूखा झेलने में धान और गेहूं की अनेक पारंपरिक किस्में भी धोखा नहीं देती हैं। बर्फानी नदियां-जैसे गंगा, यमुना, अलकनंदा, भागीरथी, भिलंगना, रामगंगा, कोषी पिंडर आदि हैं। लेकिन इनका पानी खेतों में नहीं जाता। बड़ी नदियों के अलावा यहां कई गाड-गधेरा यानी गैर-बर्फानी छोटी-छोटी नदियां हैं। यही नदियां लोगों की आजीविका का मुख्य आधार रही हैं। क्योंकि इनसे ही सिंचाई के लिए नहरें निकालकर लोगों ने अपने प्यासे खेतों को पानी पिलाया है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल इलाके में किसान और खास कर महिला किसान अपने परंपरागत देषी बीजों से बारहनाजा की फसलें उगाते हैं। बारहनाजा यानी बारह अनाज। लेकिन इसमें अनाज ही नहीं बल्कि दलहन, तिलहन, मसाले व रेषा वाली फसलें षामिल हैं। यह सभी मिश्रित फसलें ही बारहनाजा हैं। यहां बीज बचाओ आंदोलन के प्रमुख विजय जड़धारी बताते हैं कि बारहनाजा में 12 फसलें ही हों, यह जरूरी नहीं। भौगोलिक परिस्थिति, खान-पान की संस्कृति के आधार पर इसमें 20 से अधिक फसलें भी होती हैं। जिनमें कोदा (मंडुवा), मारसा (रामदाना), ओगल (कुटटू ), जोन्याला (ज्वार ), मक्का, राजमा, गहथ (कुलथ ), भट्ट (पारंपरिक सोयाबीन), रैंयास नौरंगी, उड़द, सुंटा लोबिया, रगड़वास, गुरूंष, तोर, मूंग, भगंजीर, तिल, जख्या, भांग, सण सन, काखड़ी खीरा इत्यादि फसलें हैं। 
            
आज जहां पारंपरिक बीज ढूंढने से नहीं मिलते वहीं बीज बचाओ आंदोलन के पास उत्तराखंड की धान की 350 प्रजातियां, गेहूं की 30 , जौ 4, मंडुआ 12, झंगोरा 8, ज्वार 3, ओगल 2, मक्की 10, राजमा 220, गहथ 3, भट्ट 5, नौरंगी 12, संुटा 8,तिल 4, भंगजीर 3 प्रजातियां हैं। इनकी समस्त जानकारी है। उनके पास जिंदा जीन बैंक है। इसके अलावा  दुर्लभ चीणा, गुरूष, पहाड़ी काखड़ी, जख्या सहित दर्जनों तरह की साग-सब्जी के बीज उगाए जा रहे हैं और किसानों को दिए जा रहे हैं। उत्तराखंड जैव विविधता के मामले में और जगहों से आज भी अच्छा है। यहां सैकड़ों पारंपरिक व्यंजन हैं। फल, फूल, पत्ते और कंद-मूल हैं, जो लोगों को निरोग बनाते हैं। पानी के स्त्रोत सूख न जाएं इसलिए जंगल बचाने का का काम किया जा रहा है। जड़धार का जंगल जो कभी उजड़ चुका था, अब हरा-भरा हो गया हैबांज-बुरास का यह जंगल कई जल स्त्रोतों का उद्गम स्थल है, जिससे सीधे पाइप के माध्यम से लोगों को बारह मास पानी उपलब्ध है। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि मौसमी बदलाव के कारण जो समस्याएं और चुनौतियां आएंगी, उनसे निपटने में भी यह खेती कारगर है। कम बारिष, ज्यादा गर्मी, पानी की कमी और कुपोषण बढ़ने जैसी स्थिति में बारहनाजा खेती सबसे उपयुक्त है। इस खेती में मौसमी उतार-चढ़ाव व पारिस्थितिकी हालत को झेलने की क्षमता होती है। इस प्रकार सभी दृष्टियों, खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, जैव विविधता और मौसम बदलाव में उपयोगी और स्वावलंबी है। पारंपरिक खेती व जंगल बचाने का यह जैव विविधता संरक्षण का यह काम सराहनीय होने के साथ साथ अनुकरणीय है और जलवायु परिवर्तन के इस कठिन दौर में मार्गदर्षक भी। 







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बाबा मायाराम
(चरखा फीचर्स)

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