भारत के सर्द मौसम में संसद आजकल काफी गर्म है.गर्म जनता के हितो के लिए विपक्ष कोई मांग कर रहा हो ये बात भी नही है.भारत के गरीब-गुरवा, दलित-बंचित, अबला-निर्वला, भय-भूख, भ्रष्टाचार-बेरोजगारी इनमे कोई मुद्दे में इतना दम कहाँ जो भारत के संसद का आवाज बने?कुछ दिन पहले संसद “रामजादे बनाम हरामजादे” पर ठप्प रही और अब धर्मांतरण के मुद्दे पर ठप्प किया जा रहा है. भारत के जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ो रूपये फूंके जा रहे है.प्रश्न है की क्या आज तक भारत में कभी धर्मांतरण हुआ या नही. १९४७ से लेकर २०१४ तक क्या भारत में हिन्दुओ को मुस्लिम या इसाई बनाया गया या नही? अगर आज के हालात पर ध्यान दे तो दो घटनाओ से इस मुद्दे की मंशा को समझा जा सकता है. एक तो संसद में विपक्ष का धर्मांतरण पर घटिया रवैया और दुसरा पडोसी राष्ट्र नेपाल में ब्रिटिश राजदूत एंडी स्पार्क्स का यह बयान की- “नेपाल के संविधान में धर्मांतरण की इजाज़त देने बाला प्रावधान हो”? क्या यह इसाइओ की दादागिरी नही है.नेपाल में ब्रिटिश राजदूत और भारत में मुस्लिम-इसाई परस्त सांसदो की हिन्दू विरोधी मानसिकता सारी कहानी इस धर्मांतरण के मुद्दे पर कह रही है. अगर देश के पूर्ववर्ती शासन देश के सविधान और जबरदस्ती घुसाए पंथनिरपेक्षता के प्रति संवेदनशील होती तो भारत आज ऐसी स्थिति में नही होती.अगर देश के फिरकापरस्तों की ज़मात को देश की चिंता होती तो सामान नागरिक संहिता लागू की गयी होती.मतान्तरण एक गंभीर अपराध होता क्योंकि इतिहास गवाह है मतांतरण से ही विश्व में राष्ट्रानान्तरं की घृणित खुनी खेल खेली गयी अफ़्रीकी-अमेरिकी देशों सहित इराक, इरान अफगानिस्तान पाकिस्तान बंगलादेश इसी मतान्तरण की नाजायज़ औलाद है.जिसका दंश विश्व में मानवतावादी और शांतिवादी भुगत रहे हैं..
इतिहास साक्षी है भारत का इतिहास मुसलमानों और इसाइओ की खुनी क्रूरता से रंगा पड़ा है.७११ में खुनी और लुटेरा मुहम्मद बिन कासिम से लेकर मुगलों के काल में हिन्दुओ को किस तरह से मुसलमान बनाया गया?जब ब्रिटिश गुलामी में भारत आया तब इसाइओ ने किस क्रूरता से भारतीय लोगो को इसाई में मतांतरित कर आज भारत को इस मुकाम पर ला खडा कर दिया है?जो कायर बुजदिल लोभी और व्यभिचारी थे वो भारत में मतांतरित हुए किन्तु जिनमे अपनी धर्म की शान थी वो निकृष्ट कार्य करना, खौलते तेल में तैरना स्वीकार किया, आरे से ज़िंदा दो भाग में कटना स्वीकार किया किन्तु अपने पूर्वजों के प्रति गद्दारी नही की अपने मूल धर्म को जीवन में बनाए रखा. आशा जगी की १९४७ के बाद मुसलमानों और इसाइओ के इस घृणित खेल पर रोक लगेगा .किन्तु १९४७ के बाद लाखो हिन्दुओ के लाशो और लाखो हिन्दू महिलाओं के शीलभंग पर सत्ता का स्वाद चखने बाला कांग्रेसी ज़मात और उसका नेतृत्व करने बाले और गलती से हिन्दू होने बाले? नेहरु और उसके बंशजो ने अबतक उसी खुनी परम्परा को जीवित रखा था वरना धर्मांतरण के मामले में दुनिया के कई देशो में बच्चों के साथ मिशनरीओं के पादीरयों द्वारा अनेक प्रकार के दुकृत्य किये हैं। इस मामले को लेकर दुनिया के अनेक देशो में हो रहे विरोंध के कारण पोप को माफी मागनी पड़ी। सैकडों नही करोडे मामले जिसमें पादरियों ने चर्च में पढने वालों बच्चों के साथ अनैतिक कार्य किये। इनके अपराध पर वहां की सरकार एवं न्यायालय कई को कडी सजा भी दी गई है। लेकिन इसके बाद भी दुनिया भर में नही रूक रहा है । पादरी और ननों द्वारा जिस प्रकार से धर्मान्तरण एवं अत्याचार हो रहा है ।
1956 में मध्य प्रदेश में इसाई अत्याचारों की पराकाष्ठा पर बनी नियोगी कमिशन, १९८२ में तमिलनाडु के वेणुगोपाल आयोग, १९८९ में ओड़िसा के वाधवा आयोग आदि के सिफारिशों को यदि फिरकापरस्तों की ज़मात लागू कर दी होती तो आज देश में ये माहौल नहीं होता. किन्तु जिस इसाइओ के रहमोकरम पर सत्ता का स्वाद नेहरुवियनो ने प्राप्त किया था उसे इस देश में मतान्तरण करने की छुट देकर इस देश की आस्था और विश्वास के साथ इनलोगों ने धोखा दिया है. जिस महात्मा गांधी के रोम-रोम को बेचकर खाती रही पार्टिया उनके विचारों की ढिढोरा पिटती है १९३५ में वही गांधीजी का कहना था-“अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मै कानून बना सकूँ तो मैं मतान्तरण का सारा धंधा ही बंद करा दूँ.” किन्तु ६० साल में भी ऐसा नही हो सका आखिर क्यों?
पूरा नार्थ-ईस्ट इसाई में कन्वर्ट होने के कारण आज देश की एकता और अखंडता को चुनौती दे रहा है. झारखंड उडिसा, गुजरात, मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियों के संग्दिध गतिविधियों के स्थानीय नागरिकों का विरोध का सामना करना पडा है । इन सभी घटनों जिम्मेंदार ईसाई संस्था भी है।इसाइओ के यीशु कहता है –“जो मेरे साथ नही वह मेरे विरोध में है (मत्ती १२:३०)”क्या इस देश की सरकारों ने इन देशद्रोही तत्वों पर कारवाई की, कभी संसद में मुद्दा को उठाया ?कभी नही क्योंकि इन मिशनरियो के सहारे अंतरराष्ट्रीय गिरोहों के संरक्षण में इनके दलाल देश विदेश की शैर सपाटा कर भारत के संस्कार और संस्कृति को निकृष्ट बताने को आतुर रहते हैं.
जहां संविधान भारत के हर नागरिक को समान बताती है वहीँ इसी देश में एक मुस्लिम १५ साल या उससे अधिक उम्र के महिलाओं से चार-चार शादिया कर सकता है.जब मन चाहे तलाक दे सकता है और महिला को गुज़ारा भत्ता भी देने की ज़रूरत नही है. ऐसे इस्लामी मानसिकता से देश की जनसँख्या और विकास को विकृत किया जा रहा है? यदि हिन्दू हैं तो १८ साल या उससे ऊपर उम्र के महिला से वह भी सिर्फ एक शादी कर सकते है यदि तलाक देते है तब आजीवन गुज़ारा भत्ता दो.क्या ये भारत के संविधान का उलंघन नही है.क्या भारत एक इस्लामी देश है जहां शरिया लागू है.केरल,पश्चिम बंगाल,असम,बिहार उत्तर प्रदेश,लक्ष्य दीप जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में आज इन मुस्लिम तंजीमो की अनेक असंदिग्ध गतिविधिया चल रही है जहाँ आज भी राज्य की पुलिस जाने से कतराती है गर पुलिस गयी भी तो उनपर हमला होता है और सरकारे मूकदर्शक बनी रहती है.आखिर क्यों? शाह्बानो प्रकरण में देश की न्यायपालिका और संविधान की सरेआम इंडिया गेट पर बलात्कार करने बाले फिरकापरस्तों की ज़मात और देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बताने बाले कुनवा किस मुह से आज धर्मांतरण पर संसद के बक्त को जाया कर रहा है?
फिरकापरस्तों की सरकार के शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आज़ाद ने कहा था-“भारत जैसे देश को जो एकबार मुसलमानों के शाशन में रह चूका है कभी भी त्यागा नही जा सकता है और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है की उस खोई हुई मुस्लिम सत्ता को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्नं करे.”(बी.आर.नंदा, गांधी पैन इस्लामिज्म,इम्पिरियालिज्म एंड नेशनलिज्म पेज-११७ )ऐसे इस्लामी राज्य की बकालत करने वाले और फिरकापरस्त व्यक्ति कभी भारत के संस्कार को आत्मसात कर सकता है? उसी का फल है देश की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ गुलाम और नौकर पैदा करने की कुब्बत रखता है ना की देशभक्त.आखिर आगरा पर बबाल मचाने बाले सांसदों,दलों, मिडियाकर्मिओ और कलमघिस्सुओं को अपने गिरेवाँ में झांकना चाहिए की अबतक उनकी चुप्पी इस देश को इस मुकाम पर ला खड़ा किया और जो बबाल काट रहें है उनमे विद्रूपता की बू आती है.
१९९१ की जनगणना के अनुसार केरल में हिन्दू-५७.३५ वहीं २०११ में घटकर २८ फीसदी हो गये.१९९१ में में भारत में हिन्दुओ की जनसँख्या-८२.४१% मुसलमानों की ११.६७% और इसाइओ की २१.५% थी वर्ष २०११ में ये आंकड़ा हिन्दू-८०.५%, मुस्लिम-१३.४% और इसाइओ की २२.६% हो गयी. दक्षिण भारत के अधिकाँश राज्य आज पेट्रो डालर तो उत्तर भारत के अधिकाँश राज्य यूरो डालर के लालच और बलात मतांतरण से त्रस्त है और देश की तथाकथित सेकुलर सरकारे अपनी रोटी सकती और इस देश के बेटी बेचती रही?जिस तरह से इस्लाम कहता है की जो मुसलमान नही वो काफिर है तो इस देश की मिटटी में जन्मने बाला हर व्यक्ति जिसका पुण्यभूमि, मातृभूमि भारत है वह यदि कहता है जो “रामजादे नही वो हरामजादे है” पर बबाल क्यों मचता है?अब भी यदि वास्तव में देश की संसद मतान्तरण जैसे मुद्दे पर संवेदनशील है तो अबिल्म्व इस पूर्ण प्रतिबंध लगाने हेतु क़ानून बनाए.जबतक अल्पसंख्यक के नाम पर भारत के संस्कार - संस्कृति को देश की सियासत सरेआम कुंठित करती रहेगी उसे कुछ भी करने को सरकारी छुट देती रहेगी समाज अशांत होता ही रहेगा. नेपाल में ब्रिटिश राजदूत जिनका साम्राज्य तो चला गया किन्तु साम्राज्यवादी मानसिकता से पीड़ित एंडी स्पार्क्स के जोशुआ जोश से हट कर भारत के सांसद भी अपने को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण से निकाल बाहर कर भारत की वसुधैव कुटुम्बकम को स्थान दे सारा वितंडावाद स्वयं खत्म हो जायेगी.
संजय कुमार आज़ाद
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