एक दषक पहले तक षरद ऋतु आते हीं बिहार के ताल-तलैया, झील, नदियां प्रवासी पक्षियों के मधुरिम कलवर से गुलजार हो जाता था। सैकड़ों की तादाद में पक्षियों का झुंड नीले असामान में बादलों के बीच उमड़-घुमड़कर पर्यावरण की स्वच्छता का पैगाम देते थे, पर्यटकों को आकर्शित करते थे। किसान अपने खेतों में पक्षियों के कलरव के मधुतान में पटवन करते हुए असीम आनंद की अनुभूति महसूस करते थे। बच्चों को इन प्रवासी पक्षियों की गगनचुंबी उड़ान हर्शित करती थी। आज भी हमारे बच्चे झुंड के साथ दौड़ते धमा-चैकरी मचाते हैं, मनोहर दृष्य देखते ही बनती है। कई दुर्लभ पक्षियों को यौन षक्ति बढ़ाने व स्वास्थ्य लाभ आदि जैसी भ्रांतियों की वजह से षिकार किया जा रहा है।
बिहार के तराई क्षेत्र में चिड़ीमार की चांदी है। दिनभर हाथ में जाल, कंपा (लस्सेदार बांस से बना) लेकर मैदानी भू-भागों में चिडि़या मारते नजर आ रहे हैं। इनका मकसद है चंद पैसों के लिए पक्षियों का षिकार करना। डिंगवच, गैरी, झिल्ली, बगेरी, लालसर, हरियल, पोर्टचाई स्पाटिल, टीलकूट, बहूमणि, हंस, ष्वंजन, चाहा, क्रेन, आइविस, डक, अंधिगा, साइबेरियन आदि पक्षियों की झंुड सितंबर माह से मेहमान बनकर आते हैं। चिड़ीमार इन पक्षियों का षिकार करके बाजार में पुलिस की नाक के सामने खुलेआम बिक्री करके जेब गर्म करने से गुरेज नहीं करते। 200-500 रुपये तक प्रवासी पक्षियों को बेचा जा रहा है। खरीदार आम आदमी से लेकर खास आदमी तक है।
मुजफ्फरपुर जिले के बसैठा बाजार स्थित बसैठा-कमलपुर चैर में सितंबर माह से मेहमान पक्षियों का आना षुरू हो जाता है। इस बाबत सरैंया थाना ने बसैठा चैक के इलाके में चिड़ीमार की सूचना मिलने पर छापेमारी की। लेकिन नतीजा सिफर रहा। पुलिस के आने की भनक लगते हीं पक्षी विक्रेता चंपत हो गये। इस दौरान षक के आधार पर कुछ चिड़ीमारों को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ कर मामले को रफा-दफा कर दिया। थाना प्रभारी ने कहा कि छापेमारी की गयी पर, वहां कोई पक्षी विक्रेता नहीं मिले। स्थानीय गणमान्य लोगों का कहना है कि सर्दी के मौसम में चैर में पक्षियों का खुलेआम षिकार होता है। खरीदार भी बड़े रसूकदार होते हैं। दूसरी ओर यह पहली बार पुलिस छापेमारी हुई है। खैर, जो हो पर चिड़ीमारों में दहषत जरूर है।
औराई प्रखंड अंतर्गत कोकिलवारा में पक्षियों की कलरव ध्वनि मंद पड़ गयी है। किंवदंती है कि ढाई सौ वर्श पूर्व दरभंगा महाराज के भाई लक्ष्मेष्वर सिंह ने कोकिलवारा पोखर का निर्माण करवाया था। यह पोखर तकरीबन 5 एकड़ के भू-भाग में अवस्थित है। जो चिडि़या पोखर के नाम से मषहूर है। एक समय यहां मेहमान पक्षियों की गूंज से पूरा वातावरण चहचहा उठता था। पूर्व ग्रामीण मंत्री रघुवंष सिंह ने पोखर का ऐतिहासिक महत्व को जानकर पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का आष्वासन दिया था। आज यह पोखर अपने हाल पर रो रहा है। पूरे पोखर में घास व जलकुंभी उपज गये हैं। आसपास के पषु-पक्षियों का बसेरा यह पोखर कुव्यवस्था का दंष झेल रहा है। यहां न तो न श्रद्धालु स्नान करने आते हैं और न जीव-जंतु प्यास बुझाने।
मुजफ्फरपुर जिले के पष्चिमी इलाके में इन दिनों साइकिल पर पिजंड़े में लालसर, बगेरी, हरियल, गैरी, अंधिगा आदि पक्षियों को चिड़ीमार सड़क पर घुम-घूमाकर बेच रहे हैं। सबसे ज्यादा खरीदार गांव के रसूकदार व मयखाने वाले हैं। हरेक ताड़ी, षराब आदि दुकानों पर इन मेहमान पक्षियों को आग में भूनकर देसी षराब के साथ चिखने के रूप में बिक रहा है। जिले के साहेबगंज, पारू, सरैंया, मोतीपुर प्रखंड के चैर में चिड़ीमार अपना जाल बिछा रहे है। दूसरी ओर संभ्रांत परिवार के षौकीन बंदूक लिए षिकार की तलाष में चैर, दियारा, ताल-तलैया, नदी-नहर की खाक छान रहे हैं। पारू प्रखंड के युवा अमरेन्द्र कुमार कहते हैं कि कुछ साल पहले तक जब मंत्री-विधायक ही मेहमान पक्षी के स्वागत के बजाय षिकार करते नजर आते थे, तो अनुमान लगा सकते हैं कि वर्तमान स्थिति क्या हो सकती है? बिहार के किसी भी इलाके में जाकर देखिए सबसे ज्यादा आज भी मेहमान पक्षियों का षिकार बंदूकधारी हीं करते हैं। जिले के राकेष कुमार षाही कहते हैं कि पुलिस महकमे की ओर से ठोस कदम नहीं उठाये जाने के कारण प्रवासी पक्षी का षिकार बदस्तूर जारी है। बिहार में करीब छह पक्षी अभ्यारण्य है, जिसका काम पक्षी का संरक्षण व संवर्द्धन करना है। पर, वन विभाग के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। ऐसे में अगर इन पक्षियों को बचाना है तो इन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी की मानें तो मेहमान पक्षी हिमालय के पार, मध्य व उत्तरी एषिया-पूर्वी उत्तरी यूरोप से बिहार की ओर रूख करते हैं। जो लद्दाख, चीन, तिब्बत, जापान, रूस, साइबेरिया, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, मंगोलिया, पष्चिमी जर्मनी, हंगरी, भूटान आदि से आते हैं। लेकिन सरकारी स्तर पर प्रयास विफल हो रहा है। जिस वजह से मेहमान पक्षी का संरक्षण होना मुष्किल प्रतीत होता है। पूरे देष में पक्षियों की 1200 से अधिक प्रजातियां व करीब 21 सौ उपप्रजातियां पायी जाती है। जिनमें 350 प्रजातियां प्रवासी है, जो षरद ऋतु के आगमन के साथ यहां आती है। बिहार में 300 प्रजातियां पायी जाती है, जिनमें पच्चास फीसद मेहमान पक्षी हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई, षहरीकरण, जलाषय के मृत होने की वजह से प्रवासी पक्षियों का आना कम हुआ है। बेतिया स्थित वाल्मिकी नगर व्याघ्र परियोजना की ओर से पक्षियों के संरक्षण की दिषा में सकारात्मक पहल हो रही है। पर, प्रषासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण मेहमान पक्षी के मांस से चिड़ीमार की जठराग्नि पूरी हो रही है।
पर्यावरणविद् अनिल प्रकाष कहते हैं कि पक्षियों की तस्करी व आखेट होने की वजह से दुर्लभ पक्षी भी विलुप्त होने के कगार पर हैं। सर्दी के समय मेहमान पक्षी बर्फीली जगहों से गर्म जगहों पर पलायन करते हैं। ज्यादतर पक्षी जोडि़यों में होते हैं। पर स्वदेष लौटते समय अपने साथी से बिछुड़ जाते हैं। विडंबना है कि बिहार की धरती ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के लिए जानी जाती है। पर चंद लोगों की आत्मा की तृप्ति के लिए प्रवासी पक्षियों को तीर-कमान और बंदूक की गोलियों से छलनी कर दी जाती है। धीरे-धीरे प्रवासी पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। पहले गांव के तालाब, पोखर, बरगद का पेड़, पीपल का पेड़, कदम्ब का पेड़ इन प्रवासी पक्षियों की कलरव ध्वनियों से नादमय हो जाता था। बहरहाल सरकारी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाना चाहिए। कानूनी रूप से चिड़ीमारों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। नहीं तो इन पक्षियों की मधुर ध्वनियां केवल किताबों के पन्ने तक सिमट कर रह जायेगी और हमारी आने वाली पीढ़ी कुदरत के इन अनमोल तोहफों से वंचित रह जाएगी।
अमृतांज इंदीवर
(चरखा फीचर्स)

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