लम्बी अनिश्चत्ता के बाद आखिर दिल्ली मे भी चुनाव की डुगडुगी बज गई। इसी के साथ नई सरकार के लिए होने वाली जंग का मैदान भी सज चुका है। इस चुनाव के एलान का इंतजार करते – करते करीब एक साल बीत गया ।पिछले साल फरवरी मे ही केजरीवाल दिल्ली की गद्दी लोकपाल के मुद्दे पर एकाएक छोड़ कर चले गये थे । अब एक दम बदले हुये राजनीतिक माहौल मे इस बार दिल्ली विधान सभा के चुनाव होने जा रहे हैं ।लेकिन एक करोड़ 30 लाख मतदाताओं के साथ – साथ इस बार राजनीतिक दलों के पास भी फैसले लेने और रणनीति तय करने के लिए कुछ ही हफ्तों का समय है ।पिछले चुनाव की तरह इस बार भी दिल्ली के दगंल मे तीन ही राजनीतिक दलों के मुकाबले मे रहने की उम्मीद की जा रही है । भाजपा पिछले साल से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजय रथ पर सवार है , चुनावों की घोषणा भी उसके अनुकूल माहौल और मंशानुसार हुयी है ।चुनाव की घोषणा से ठीक पहले प्रधानमंत्री की अभिनंदन रैली से ये साफ संकेत मिल गया कि भाजपा ने उनके नेतृत्व मे ही इस बार भी चुनावी वैतरणी पार करने का फैसला कर लिया है । पहले से भाजपा की ओर से किसी को मुख्यमंत्री घोषित किये जाने की अब बहुत कम समभावनाऐं हैं ।हरियाणा , महाराष्ट्र और झारखण्ड मे सरकार बनाने कामयाब होने लेकिन जम्मू कश्मीर मे सत्ता तक पहुंच कर भी नाकाम होने के बाद भाजपा दिल्ली मे सरकार बनाने को लेकर जिस तरह आश्वस्त है उससे उसने अपने लिए चुनौती बढ़ाली है । ताजा हालातों मे ये कहना गलत नही होगा कि दिल्ली विधान सभा चुनाव भाजपा के साथ – साथ खुद मोदी के लिए अग्निपरीक्षा से कम साबित नही होने वालें हैं ।वहीं किरण बेदी के भाजपा का दामन थामने से अब दिल्ली का दंगल कुछ ज़्यादा दिलचस्प दिखने लगा है ।आम आदमी पार्टी के लिए अब अपना घर महफूज रखने की भी एक बड़ी चुनौती है ।दिल्ली के हालातों से लग रहा है कि शजिया इल्मी भी भाजपा का हाथ थामने वाली हैं ।
हालांकि ये चुनाव महज दिल्ली विधानसभा के हैं, लेकिन इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की साख दांव पर लगी है। कांग्रेस के पास फिलहाल खोने के लिए कुछ भी नहीं है। अगर दिल्ली का किला मोदी फतह कर लेते हैं तो फिर उनके विजय रथ को रोक पाना लगभग असंभव हो जाएगा, और वहीं केजरीवाल पिछली बार की तरह एक बार फिर अपना करिश्मा कायम रख पाने मे कामयाब हो
जातें हैं तो वे पूरे देश में मोदी के विरोघी राजनीतिक दलों की धुरी बन जाएंगे। करीब एक साल पहले जब दिल्ली में चुनाव हुए थे तो उस वक्त न तो मोदी का कद इतना बड़ा था और न ही उनके नाम पर चुनाव लड़े जाते थे और यही हाल केजरीवाल का भी था । उस दौरान बस कांग्रेस विरोध की जबरदस्त लहर थी। हर कोई मानकर चल रहा था कि केजरीवाल की आप सीट तो लाएगी पर सरकार बनाने लायक नहीं , लेकिन नतीजों ने सबको चौंकाया दिया । यह अलग बात है कि उन नतीजों का सम्मान किसी भी पार्टी ने नहीं किया। बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी सरकार बनाए या न बनाए, इसको लेकर उहापोह में फंसी रही। आप ने कांग्रेस की मदद से सरकार तो बनाई, पर ऐसी गैर राजनीतिक हरकत की जिससे सरकार गिर गई। बाद में हालात यह हो गई कि केजरीवाल अभी तक जब भी दिल्ली की जनता का सामना करतें हैं तो अपनी इस गलती के लिए माफी मांगना नही भूलतें हैं और ऐसा करना उनकी मजबूरी भी है ।
पिछले चुनाव में बीजेपी का चेहरा हर्षवर्धन थे, अब हालात बिल्कुल अलग है। आज हर्षवर्धन केन्द्र में मंत्री तो हैं और दिल्ली की राजनीति में कहीं नहीं दिखते हैं । आज बीजेपी के पास बस एक ही चेहरा बचा है, वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है। न कोई उसके आगे और न कोई उसके पीछे। तभी तो प्रधानमंत्री बनने के बाद जितने भी राज्यों में चुनाव हुए वहां पर किसी राज्य के नेता का चेहरा सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा गया। हर जगह बस मोदी और मोदी ही नजर आये ।10 जनवरी को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई बीजेपी की रैली में ये बात साफ तौर पर नजर आई कि भाजपा के लिए ये चुनाव भी नरेन्द्र मोदी ही लड़ेगें । हर जगह नजर आ रहे मोदी के 24 फुट के कट आउट्स से भी इस बात को बल मिलता है । दिल्ली बीजेपी के नेता रामलीला मैदान की तरह 12 और रैली करवाने का इरादा रखते है । ऐसा लगता है कि दिल्ली में बीजेपी ये मान चुकी है कि उसके पास केजरीवाल के मुकाबले कोई चेहरा नहीं है इसलिए वह अपने सबसे बड़े हथियार मोदी के बूते मैदान में उतर आई है।
पार्टी के विज्ञापन पर भी गौर करें तो उसमें बस मोदी ही दिखते है।लेकिन अब केजरीवाल के साथ कभी जन आंदोलन की शुरूआत करने वाली पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी के भाजपा का दामन थामने से हो सकता है कि वह यहां अपनी रणनीति मे आने वाले दिनों मे कुछ बदलाव करे ।किरण बेदी के तरकश मे भी वही तीर हैं जो आम आदमी पार्टी के तरकश मे हैं ।क्षवि के मामलें मे वह कहीं से भी केजरीवाल से उन्नीस नही हैं ।भाजपा ने ऐन चुनाव के समय किरण बेदी को अपने पाले मे ला कर बड़ा दांव चला है और आप के लिए बड़़ा झटका भी माना जा रहा है ।अगर भाजपा किरण बेदी को आगे कर के चुनाव मेदान मे ताल ठोकती है तो किरण और केजरीवाल का मुकाबला भी कम दिलचस्प नही होगा ।किरण बेदी के सामने आने से अन्ना हजारे की भूमिका पर भी कयास लगाया जाने लगा है । इसमें कोई दो राय नहीं है कि केन्द्र के स्तर पर किसी भी पार्टी के पास आज मोदी के टक्कर का कोई नेता नहीं है। किसी के पास ऐसा करिश्मा नहीं है जो मोदी के आसपास भी ठहरता हो। लेकिन बात जब राज्यस्तर पर आती है तो कई ऐसे चेहरे नजर आते हैं जो मोदी को बखूबी टक्कर देते हैं और वहां, मोदी की दाल गलती नहीं नजर आती है।बात चाहे बंगाल की करें तो ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में जयललिता के आगे मोदी का जादू नहीं चला।जम्मू कश्मीर मे भी उनका विजयी रथ पीडीपी के सामने सुस्त रफतार से चला । यानि जहां पर जनता को कोई ठोस विकल्प दिखा वहां पर उसने उसी पर भरोसा जताया। कमोवेश अब दिल्ली में भी कुछ ऐसे ही हालात बनते दिख रहे हैं । अब तक के कई सर्वे मे भी ये बात सामने आयी जिसमे हर जगह बीजेपी और आप के बीच फासला महज पांच फीसदी वोट का ही दिखता है । वहीं अगर बात दिल्ली के मुख्यमंत्री की हो तो हर जगह केजरीवाल ही नजर आते हैं। जैसे केन्द्र में मोदी में करिश्मा है वैसा ही दिल्ली में केजरीवाल का करिश्मा दिखता है।इसी लिए भाजपा ने कोई जोखिम ना उठाते हुए किरण बेदी को ला कर दिल्ली के मतदाताओं को भ्रमित होने से बचाने की कोशिश की है ।
इसी के चलते केजरीवाल के लिए इस बार ये चुनाव आसान नही हैं । आम आदमी पार्टी और उसके नेता को ‘ड्रामेबाज’ कहकर उनकी आलोचना की जा रही है । आम आदमी पार्टी के साथ ये भी दिक्कत है कि उसका छोटा-सा जीवनकाल उसके पल-पल परिवर्तित निर्णयों से कुछ ज़्यादा ही भर गया है ।उनके साथ अब टेलीविज़न चैनलों की ओबी वैन्स अब जमी नहीं रहती हैं, वे सारे अखबारों के मुखपृष्ठ पर भी नहीं हैं ।मीडिया का ये साथ अब एक तरह से मोदी को मिल गया है । आरामतलब नेताओं को देखते-देखते ऊब चुकी जिस जनता ने पूरे जोश से उनका स्वागत किया था ,उसके सामने अब उन्हीं की तरह तकदीर और तस्वीर बलने का दावा करने वाले मोदी भी है दिल्ली का ये ऐसा पहला विधानसभा चुनाव चुनाव है, जिसमें कांग्रेस कहीं से भी लड़ाई में नजर नहीं आ रही। दिल्ली कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा रही और 15 साल तक दिल्ली की प्रदेश सरकार की अगुवाई करने वाली शीला दीक्षित के बाद कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नजर नहीं आता।हांलाकि कांगेस ने साफ सुथरी छवि वाले पूर्व मंत्री अजय मांकन को आगे कर के दिल्ली के लोगों को एक विकल्प जरूर दिया है ।वहीं ये चुनाव कांग्रेस की नये नेतृत्व के लिए भी चुनौती है, जिसकी अगुवाई अरविंदर सिंह लवली और हारुन यूसुफ जैसे नेता कर रहे हैं।अन्तरकलह से निपटना इस बार सभी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती है। कांग्रेस पिछले चुनाव से इस समस्या से जूझ रही है। उसके तमाम नेता लगातार पार्टी से किनारे जा रहे हैं, वहीं बीजेपी के सामने ऐसी दिक्कत तो है, लेकिन बड़ी टूट की संभावना नजर नहीं आती। आम आदमी पार्टी के साथ ये दिक्कत पिछले दिल्ली चुनाव के साथ ही शुरू हो गई थी। आप की सरकार बनने के साथ ही विनोद कुमार बिन्नी ने बगावत की थी तो सरकार जाने के बाद अश्विनी महाजन और एमएस धीर जैसे पार्टी के बड़े नेताओं ने बगावती तेवर बुलंद किये । इस समय भी कई बड़े नेता पार्टी के लिए सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं , जोकि आप के लिए बड़ी चुनौती है।
दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार मुद्दा भी बदल गया है । पिछले चुनाव में जहां भ्रष्टाचार चुनाव का मुद्दा था, वहीं इस चुनाव में मुद्दा विकास है। आप ने भ्रष्टाचार विरोधी अपने मुद्दे में बदलाव कर सब्सिडी देने और स्थानीय सरकार को प्राथमिकता दी है। वो अब लोगों को समझाने में जुटी है कि दिल्ली में पिछली बार सरकार से भागना उनकी गलती थी, लेकिन अब वो नहीं भागेगी। वहीं भाजपा ने दूसरे राज्यों की तरह यहां भी इस बार सिर्फ विकास के मुद्दे को हथियार बनाया है।इस बार एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है , वह है पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की लड़ाई । बीजेपी केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार की दुहाई दे रही है, तो आप पूरी तरह से बहुमत की आस में है। केजरीवाल लोगों से वादे कर रहे हैं, कि जनता इस बार चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत दे, ताकि वो 5 साल तक राज्य की सेवा करें।इस बार मतदाताओं के मन मे कांग्रेस के खिलाफ पुराना गुस्सा भी नही है।बहरहाल इतना तो तय है कि इस बार दिल्ली के ताज का मुकाबला कांटे का होगा और ये चुनाव तीनों ही पार्टियों की दिशा और दशा तय करेंगे जिसका असर आने वाले दूसरे राज्यों के चुनावों पर भी
पड़ेगा
** शाहिद नकवी **
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