हाल ही में पर्यावरण से जुडी एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमे बताया गया है कि वर्ष 2014 दुनिया का सबसे गर्म साल रहा है। रिपोर्ट में इस बात की आशंका व्यक्त की गई है यह सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। यह रिपोर्ट पर्यावरण से जुड़े किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के माथे पर चिंता की लकीरें खींच सकती है। गर्म होने का यदि यही सिलसिला रहा तो मानव सभ्यता को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इसका उदहारण हमें बहुत बार देखने को मिला है। तबाही के निशान आज भी मौजूद है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इससे न तो हम इंसानों ने कोई सबक सीखा है और न ही सरकार इस आपदा से प्रभावितों की मदद के लिए कोई विशेष प्रबंध कर रही है। वर्ष 2013 में कुदरत ने उत्तराखंड में तबाही और बर्बादी की ऐसी खौफनाक दास्तान लिखी थी जिसके बाद यह त्रासदी विनाष के पैमाने पर सिरमौर बन गयी। आलम यह है कि उस खौफनाक तबाही में जो लोग बच गए वह उसको याद कर आज भी सहम जाते हैं और भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि वह प्रकृति के प्रकोप से सभी को बचाए। बाढ़ की वह त्रासदी तो समय के साथ खत्म हो गयी लेकिन उसके जख्म आज भी देवभूमि के सीने पर बहुत सारी कहानियां छोड़े हुए हैं। उसी में एक कहानी रूद्रप्रयाग के एक छोटे से गांव षिला अमरापुरी की है। यहां बाढ़ आयी तो तबाही के साथ बहुत सारे बदलाव लेकर आयी। बाढ़ में लोगों का सब-कुछ बर्बाद हो गया। बाढ़ के बाद हजारों लोग रोजगार की तलाष में पलायन को मजबूर हुए। वैसे गांव से पलायन कोई आष्चर्यजनक बात नहीं है लेकिन इतने बड़े पैमाने पर जब लोगों के पलायन का कारण जानने की कोषिष की गई तो सच्चाई कुछ और ही थी। वास्तव में बाढ़ के बाद लोगों के पुनर्वास के लिए राज्य और केन्द्र सरकार की ओर से जो बड़ बड़े वादे किए थे समय गुजरने के साथ उस पर जंग लग गया। सरकार की ओर से लोगों के पुनर्वास के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया है। यहां के लोग आज भी मजबूर हैं और दूर-दूर पहाड़ों से घास काट कर लाते हैं जिससे उनके जानवर पल सकें और परिवारों का निर्वाह हो सके।
बाढ़ से पहले उत्तराखंड में पर्यटन से लोग बड़े पैमाने पर रोजगार से जुड़े हुए थे। लोगों के घर-बार के साथ साथ पर्यटन के भी तहस-नहस हो जाने की वजह से अब उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं बचा है। लोग रोजगार के लिए मारे मारे फिर रहे हैं। बाढ़ से पहले यहां पर्यटन के फलने-फूलने की वजह से जिन ढ़ाबों पर पहले लोगों की चहल-दिखाई देती थी उन्हीं पर अब सन्नाटा पसरा हुआ है। रूद्रप्रयाग और आस-पास के होटल पर छाई खामोषी इस बात की गवाह है। इस बात को मजबूती तब मिली जब मैंने एक होटल पर ढ़ाबा मालिक और स्थानीय निवासी को झगड़ते देखा। जब मैंने इसका कारण जानना चाहा तो ढ़ाबा मालिक ने बताया कि बाढ़ के बाद पहले ही बिक्री काफी कम हो गयी है उपर से यह उधार वाले परेषान किए रहते हैं? असल में उसके कहने का मतलब था कि यह लोग दिहाड़ी के मजदूर हैं जो हमारे रोज के ग्राहक हैं। कभी-कभी इनके पास पैसा नहीं होता तो यह लोग उधार पर ही खाना मांगते हैं। अगर इन लोगों को मना कर दो तो दूसरे ढ़ाबे पर चले जाने की धमकी देते हैं। अब आप ही बताइए कि हमें भी तो खर्चा चलाना है! हम अपने बाल-बच्चों को लेकर कहां जाएं? मैनें उनसे पूछा कि आपकी आजकल कितनी आमदनी हो जाती है तो इसका जबाब देते हुए उन्होंने कहा जितना आपका आज बिल आया है उतनी बचत एक सप्ताह बीत जाने पर हो जाती है। हमारा बिल तकरीबन 470 रूपये के करीब था। खैर गणित की कमजोरी के कारण मैं इस पर ज्यादा सोच नहीं पाया लेकिन उसकी आमदनी कम होने की वजह से उसकी झल्लाहट का मुझे एहसास हो चुका था। ढ़ाबे मालिक का कहना था कि होटल पर बिक्री कम होने की वजह से दो ही सब्जिया बनाते हैं, अगर कोई दूसरी सब्जी ग्राहक आर्डर करता है तो तुरंत मंगवाकर बनवाते हैं। उसके ढ़ाबे पर पड़े खाली पतीले उसकी कई बातो की सच्चाई को प्रमाणित कर रहे थे और साथ ही बर्तन में लगे मकड़ी के जाले कुदरत की उस त्रासदी के बारे में हमें सोचने पर मजबूर कर रहे थे जिसका कहर 2013 में यहां बरपा था। बाढ़ से पहले यहां के होटल पर्यटकों की आवाजाही से गुलजार रहते थे लेकिन आज सन्नाटे के बीच अपनी खामोषी और बेबसी पर रो रहे हैं।
आपदा से केवल लोगों का व्यापार ही प्रभावित नहीं हुआ है बल्कि खेती पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा है। बाढ़ से हुई तबाही का जिक्र करते हुए गांव के प्रधान ने बताया कि हमारे खेतों की उपजाऊ मिट्टी पानी के बहाव के साथ खिसक कर नदियांे मे घुल गई और उसने हमारे उत्पादन को भी तहस नहस कर दिया। अब हम न तो पत्थरों पर फसल उगा सकते हैं और न ही कंकड़ों से पेट भर सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जिन खेतों के टुकड़ों से पहले तीन परिवारों का पेट पल जाता था उनसे आज एक परिवार का निर्वाह भी बड़ी मुष्किल से हो रहा है। जब उनसे सरकार की ओर से दी जाने वाली मदद के बारे में पूछा कहा तो उन्होंने बताया कि सरकार अभी सड़कों की मरम्मत करने में लगी हुई है जब सड़कों की मरम्मत पूरी हो जाएगी तो षायद हमारी दयनीय स्थिति की ओर ध्यान देगी। हमें एक गैर सरकारी संगठन की ओर से थोड़ी बहुत मदद जरूर दी गयी थी। यहां आते तो बहुत लोग हैं लेकिन आप ही की तरह सवाल पूछते हैं और चले जाते हैं, करता कोई कुछ नहीं।
उत्तराखंड में कुदरत के प्रकोप ने बड़ी-बड़ी इमारतों को खिलोने की तरह ढहा दिया। जिन इमारतों में कभी लोगों की आवाजे गूंजा करती थीं उन बहुत सी इमारतों में अब सिर्फ कंकाल के रूप में नींव की उधड़ी हुई ईंटे नजर आती हैं। कुछ इमारतों के ऊपर का हिस्सा इस तरह क्षतिग्रस्त हुआ है कि उनमें लगे सरियों का ढ़ाचा देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुदरत ने इन खुबसूरत इमारतों को क्षतिग्रस्त करने में कितना जोर लगाया होगा। एक गांव की रहने वाली गुंडी देवी को जैसे ही पता चला कि दिल्ली से कुछ लोग आए हैं जो त्रासदी को लेकर सवाल पूछ रहे हैं तो वह मुआवजे की आस में हमारे पास दौड़ते हुए आयी और हमें अपने घर के अंदर ले गई। बाढ़ से अपने घर को हुए नुकसान के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें घर बनवाए हुए अभी एक साल हुआ था लेकिन प्रकृति के प्रकोप ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। हमारा घर अपनी जगह से आगे खिसक गया है, फर्ष और दीवारों में दरारें पड़ गई हैं। गुंडी देवी कैमरे की ओर इषारा करते हुए कहने लगी कि इन दरारों की भी तस्वीरें ले जाओ और सरकार को दिखाओ और उनसे पूछो कि हमें इसका मुआवजा क्यों नहीं मिला? मायूसी के साथ वह आगे कहती कि क्या तुम्हें पता है कि कितना मुष्किल होता है एक इंसान का पहाड़ों में घर बनाना। हमें गुंडी देवी के भाव समझ में आ रहे थे और साथ ही साथ कुदरत की चेतावनी भी सुनाई दे रही थी जो यह बताना चाहती है कि विकास के नाम पर जब जब उसके साथ छड़ेछाड़ होगा मानव को उसके भयानक गुस्से का प्रकोप झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। लेकिन अभी सबसे पहली प्राथमिकता पीडि़तों को राहत पहुँचाना है जो मुआवज़े के लिए सरकारी सहायता का आज भी इंतज़ार कर रहे हैं।
राजेश कुमार
(चरखा फीचर्स)

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