हिंदी को न्यायालयों की आधिकारिक भाषा नहीं बनायी जा सकती : केंद्र - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

हिंदी को न्यायालयों की आधिकारिक भाषा नहीं बनायी जा सकती : केंद्र

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केंद्र सरकार ने हिंदी को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कामकाज की आधिकारिक भाषा बनाये जाने से इन्कार किया है। सरकार ने कल शीर्ष अदालत के समक्ष दायर अपने हलफनामे में कहा है कि  किसी भी भाषा को न्यायाधीशों पर थोपा नहीं जा सकता। हिंदी को इन न्यायालयों में कामकाज की आधिकारिक भाषा बनाने में केंद्र सरकार को सख्त विरोध का सामना करना पड़ा है। 
      
सरकार ने 18वें विधि आयोग की सिफारिशें मान ली हैं. जिसमें कहा गया है कि हिंदी को आधिकारिक भाषा  बनाना सार्थक नहीं है। जजों को अपना निर्णय अपनी पसंद की भाषा में सुनाने का अधिकार होना चाहिए। हर एक नागरिक और हर एक अदालत को उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय जाननेशसमझने का अधिकार है और यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी ही अभी फिलहाल ऐसी भाषा है जिससे यह काम हो सकता है। 
      
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि यदि हिंदी को जबरन थोपा गया तो न्यायिक प्रशासन के साथ..साथ न्यायाधीशों की क्वालिटी और उनके निर्णयों पर भी बहुत बुरा असर पडे़गा। दोनों पक्षों के वादशविवाद, कानून की किताबें और केस स्टडी लगभग सभी अंग्रेजी में होते हैं। ऐसे में जजों के लिए अग्रेजी बस संप्रेषण का काम नहीं कर रही होती, बल्कि यह उनके निर्णय का एक हिस्सा होती है। ऐसे में बेहतर है कि जजों पर यह छोड़ दिया जाए कि वह किस भाषा में अपना निर्णय सुनाते हैं।

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