जनता दल परिवार को फिर से एकजुट करने की कवायद के बीच 4 दिसंबर के बाद ताजा बैठक 10 जनवरी को हुई जिसमें मुलायम सिंह यादव, प्रो. रामगोपाल यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव व नीतीश कुमार शामिल हुए। सारे नेताओं ने पहले से ही एकीकृत जनता दल की सांगठनिक रूपरेखा के सारे अधिकार मुलायम सिंह के पास सुरक्षित कर दिए हैं। मुलायम सिंह ने ही इस बारे में बैठक बुलाने की पहल की थी। बाद में मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव के बीच रिश्तेदारी के भी संबंध बन गए जिससे इस प्रक्रिया को और बल मिला। इसके बावजूद अभी जो तय हुआ है उसके मुताबिक 15 जनवरी तक पहले चरण में सिर्फ जद यू व राष्ट्रीय जनता दल का विलय होगा जबकि लोगों को इस बात में ज्यादा उत्सुकता है कि समाजवादी पार्टी इस विलय को लेकर कहां तक गंभीर है और विलय के बाद बनने वाले ढांचे के बारे में मुलायम सिंह यादव के विचार क्या हैं।
मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का जब गठन किया था उस समय उनकी पार्टी में कई नेता थे। समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन में वे खुद बेनीप्रसाद वर्मा को बुलाने गए थे ताकि पार्टी में प्रभावशाली प्रतिनिधित्व की स्थिति उभर सके। उस समय मुलायम सिंह का प्रभाव मंडल इतना मजबूत नहीं था कि वे पार्टी के सफल भविष्य की उम्मीद केवल अपने बूते पर संजो सकते। पार्टी का जब राष्ट्रीय स्वरूप तैयार किया गया तब उसमें अपने जमाने के छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्रा को महासचिव की जिम्मेदारी उन्होंने दी। एक लोकतांत्रिक पार्टी की तरह शुरूआत में समाजवादी पार्टी भी सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी थी लेकिन जैसे-जैसे मुलायम सिंह का कद बढ़ता गया वैसे-वैसे उन्होंने अपने बराबर के कद के नेताओं को या तो अधीनस्थ बनकर रहने की नियति स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया या उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन्होंने पार्टी को अपनी निजी जागीर की तरह पेश करने के लिए कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि न होते हुए भी जनेश्वर मिश्र की जगह अमर सिंह को महासचिव पद पर थोप दिया गया और जनेश्वर मिश्र उपाध्यक्ष बना दिए गए जो शोभामात्र का पद माना जाता है। इसके बाद भी पार्टी में कोई विद्रोह नहीं हुआ। आज तो उनकी पार्टी में सारे पद उनके परिवार के लोगों के पास हैं और अच्छे-अच्छे नेता पार्टी में सेवक की भूमिका में हैं। समाजवादी पार्टी को एक लोकतांत्रिक पार्टी कहना इन हालातों में बहुत मुश्किल है।
अब जनता दल परिवार के दलों का एकीकरण होता है तो उन्हें इस संस्कृति में बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। तत्काल में नीतीश, शरद, इसके बाद इनेलो से भी बात चल रही है तो ओमप्रकाश चौटाला और एचडी देवगौड़ा तक इसमें शामिल होंगे और इसके कारण पार्टी का सांगठनिक ढांचा एक व्यक्ति केेंद्रित नहीं हो सकता। न ही पार्टी के सारे पद परिवार के लोगों को ही सौंपने पर आसानी से सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। तमाम नेता अपने-अपने राज्यों में खुद मुख्तारी चाहेंगे। साथ ही राष्ट्रीय सांगठनिक ढांचे में बराबरी के पद। इसका असर मुलायम सिंह की अपनी पार्टी पर भी पड़ सकता है। निश्चित रूप से मुलायम सिंह इसको लेकर ऊहापोह में हैं जिस वजह से शुरूआत करने के बावजूद मुलायम सिंह पहले चरण में विलय की प्रक्रिया से दूर रहना चाहते हैं। मुलायम सिंह को केवल एक बात पता है कि लालू यादव से उनकी जिस ढंग की रिश्तेदारी हुई है उसके बाद उनके साथ लालू को अधीनस्थ बनकर कार्य करने में कोई असुविधा नहीं है। अगर जद यू और राजद के विलय के बाद बनने वाले संगठन के मुखिया लालू हो जाएं तो उनके जरिए इन दोनों दलों के नेताओं का अपना स्वाभिमान व महत्वकांक्षाएं छोड़कर मुलायम सिंह यादव के प्रति शरणम गच्छाम होने का रास्ता तैयार हो सकता है। बिहार व उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में एकाधिकार बनाने के बाद इन्हीं शर्तों पर मुलायम सिंह के लिए हरियाणा और कर्नाटक के नेताओं से बातचीत करना आसान हो जाएगा।
यह मुलायम सिंह का अपना ख्याल है पर बात इतनी आसान नहीं है। फिलहाल तो जनता दल यू में ही दरबारी षड्यंत्र शुरू हो गया है। नीतीश की लोकप्रियता से जले भुने बैठे शरद यादव उनके साथ अपना हिसाब बराबर करने के लिए मुलायम सिंह की प्रभुता तात्कालिक तौर पर स्वीकार करने को तैयार हैं इसीलिए वे इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित कर रहे हैं और इसी रणनीति के तहत वे लालू के प्रति भी अपना पुराना बैरभाव किनारे कर चुके हैं। वैसे जनता दल परिवार का नाम इसे दिया जाना भ्रामक है। जनता दल परिवार तो टूटा ही इसलिए कि इसमें दो राजनीतिक संस्कृतियों के बीच जंग छिड़ गई थी। जनता दल का चेहरा वीपी सिंह थ जो कांग्रेस की उदार राजनीतिक संस्कृति को और स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के जरिए परिस्कृत करके आदर्श स्थापित करना चाहते थे। दूसरी ओर उनकी पार्टी का जनाधार लोकदल परिवार में निहित था जिसने चौ. चरण सिंह के जमाने से ही फासिस्ट और लोकतंत्र विरोधी संस्कृति को व्यवहारिक राजनीति में अपनाया था। आज नीतीश भी कुछ-कुछ वीपी सिंह जैसे स्वभाव की वजह से ही लोकदल परिवार की संस्कृति से अलग-थलग से हैं। इसी कारण विलय की प्रक्रिया में वे चक्रव्यूह में घिरे नजर आते हैं। बहरहाल इन सारी स्थितियों के बीच जनता दल परिवार का विलय तमाम जटिल प्रश्नों से घिरा है। फलस्वरूप इसका अंजाम क्या होगा इस पर फिलहाल कोई भविष्यवाणी करना आसान नहीं लगता।
के पी सिंह
ओरई

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