अंतरिक्ष में भारत का लोहा मनवाने वाला मंगलयान ने दो जनवरी को मंगल ग्रह की कक्षा में सौ दिन पूरे कर लिए। मंगलयान का जीवनकाल वैसे तो एक साल माना जा रहा है लेकिन इसरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इसमें काफी ईंधन बचा है। यह दस से पंद्रह साल तक भी सेवाएं दे सकता है। महज 450 करोड़ रुपये में मंगल मिशन को पूरा करने वाले भारत के लिए यह एक और उपलब्धि होगी। श्रीहरिकोटा से पांच नवंबर को पीएसएलवी सी 25 के जरिये प्रक्षेपित मंगलयान 24 सितंबर को लाल ग्रह की कक्षा में पहुंचा था।
भारत ने इसके जरिये पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुंचने की उपलब्धि हासिल की थी। मंगलयान लगातार लाल ग्रह के वायुमंडल की तस्वीरें बेंगलुरु स्थित नियंत्रण कक्ष को भेज रहा है। इसे अहमदाबाद की स्पेस एप्लीकेशन सेंटर एंड फिजिकल रिसर्च लेब्रोरेटरी में अध्ययन के लिए भेजा जाता है।
मंगलयान ने 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त हुए इसरो अध्यक्ष राधाकृष्णन को शुभकामनाएं देने के साथ ट्वीट किया था कि वह पूरी सही तरीके से काम कर रहा है। मंगलयान और लाल ग्रह के बीच सूर्य आएगा तब इसका धरती से संपर्क टूट जाएगा। ऐसे वक्त मंगलयान की असली क्षमता का पता चल पाएगा। मंगलयान के बैटरी सिस्टम और इलेक्ट्रानिक उपकरणों पर भी निर्भर करेगा कि वह कब तक काम करता रहेगा।
मार्स आर्बिटर यानी मंगलयान ने 19 अक्तूबर को मंगल ग्रह के निकट से गुजर रहे साइडिंग स्प्रिंग धूमकेतु श्रृंखला को 40 मिनट तक अपने कलर कैमरे में कैद किया था। उसने मंगल के दो में से एक चंद्रमा की तस्वीरें भी भेजी हैं। इसके अलावा मंगल के उत्तरार्ध में उठने वाले धूल भरे तूफान और उसके ज्वालामुखी वाले इलाके इलिसियम की तस्वीरें भी ली हैं।
24 सितंबर को लाल ग्रह पहुंचा था
- पांच नवंबर 2013 को प्रक्षेपित किया गया था मार्स आर्बिटर
- 10 से 15 साल तक भी सेवाएं दे सकता हैं हमारा मंगलयान
- 421 गुना 76993 किमी की मंगल की कक्षा में चक्कर लगा रहा
- 72 घंटे, 51 मिनट 51 सेकेंड में मंगल का एक चक्कर लगाता है
- पांचों उपकरण ठीक ढंग से काम कर रहे मार्स आर्बिटर के
- 2014 के 25 शीर्ष खोज में शामिल किया था टाइम मैगजीन ने
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