जम्मू कश्मीर के कार्यवाहक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने पिता फारूक अब्दुल्ला के नक्शे कदम पर चल रहे हैं और राज्य में 2002का इतिहास दोहराया जाता नजर आ रहा है । वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में भी खंडित जनादेश आया था। हालांकि उस समय नेशनल कांप्रेंस .नेकां.28सीटों के साथ सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी थी तथा 20सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे और 16सीटों के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी .पीडीपी.तीसरे नम्बर की पार्टी थी। सबसे बडी पार्टी होने के बावजूद नेकां ने सरकार बनाने का दावा नहीं किया था।तत्कालीन कार्यवाहक मुख्यमंत्री डा फारूक अब्दुल्ला ने भी कार्यवाहक मुख्यमंत्री पद बने रहने से इनकार कर दिया था।उस समय भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने डा अब्दुल्ला से कार्यवाहक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का आग्रह किया था।दोनों शीर्ष नेताों के आग्रह के बाद डा अब्दुल्ला ने पार्टी के पदाधिकारियों के अलावा राज्य के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक करके स्थिति पर विचार शविर्मश किया था।
बैठक के बाद डा अब्दुल्ला ने अपने रूख पर बरकरार रहने का फैसला किया. उन्होने कहा था कि वह नैतिकता के आधार पर यह निर्णय ले रहे हैं. इसके बाद तत्कालीन राज्यपाल गिरीश चंद्र सक्सेना ने 18 अक्टूबर को राज्यपाल शासन लगा दिया था।उनके बेटे उमर ने सीमा पर फायंिरग और बाढ की आपदा का हवाला देकर कार्यवाहक मुख्यमंत्री पद से मुक्त होंने की इच्छा व्यक्त की है । बारह वर्ष पहले के राज्य के सियासी मंच के कई किरदार अभी भी मौजूद हैं. पीडीपी संरक्षक मुफती मोहम्मद सईद की भूमिका में कोई बदलाव नहीं आया है ।वह उस समय भी गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश कर रहे थे. तब और अब में फर्क इतना है कि उस समय वह कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए प्रयासरत थे जबकि अब वह भाजपा के साथ गठबंधन की कोशिश में लगे हैं. वर्ष 2002 मे 15 दिन राज्यपाल शासन लगा और उसके बाद कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन सरकार बनी 1हालांकि कांग्रेस की अपेक्षा चार सीटें कम मिलने के बावजूद तीन शतीन वर्ष के कार्यकाल में मुफती सईद पहले मुख्यमंत्री बने थे 1 वर्ष 2002 का इतिहास हूबहू दोहराया जाएगा या इसमें कोई बदलाव आयेगा.यह आने वाला समय ही बतायेगा।

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