महिलाों की हिफाजत की ले शपथ, आमराय से बने कानून : राष्ट्रपति - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

रविवार, 25 जनवरी 2015

महिलाों की हिफाजत की ले शपथ, आमराय से बने कानून : राष्ट्रपति

pranab address nation
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आम सहमति से कानून बनाने. आतंकवादी घटनाों से कड़ाई से निपटने. महिलाों का आदर करने तथा निवार्चित प्रतिनिधियों से जनता के भरोसे पर खरा उतरने की अपील करते हुये आज कहा कि धर्म एकता की ताकत है और इसे टकराव का कारण नहीं बनने दिया जाना चाहिए और भड़कीले भाषणों से बचना चाहिए। राष्ट्रपति ने 66वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संदेश में महिलाों के प्रति हो रही हिंसा तथा सीमापर आतंकवाद पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए देश की सुरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने तथा महिलाों को उनके अधिकार देने की बात कही है ताकि भारत दुनिया में एक महाशक्ति बन सके। श्री मुखर्जी ने कहा कि जो देश महिलाों को आदर देता है और उनका सशक्तिकरण करता है. वहीं विश्व की महाशक्ति बन सकता है।. हर भारतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाों की हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विधायिका के बिना शासन संभव नहीं है लेकिन यह ऐसा मंच है जहां शिष्टातापूर्ण संवाद के माध्यम से कानून द्वारा जनता की आकांक्षाों को साकार करने के लिए तंत्र का निर्माण किया जाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाने में आम सहमति बनाने का दरकार है। बिना चर्चा कानून बनने से संसद की भूमिका को धक्का पहुंचता है। इसे जनता का भी विश्वास टूटता है और यह लोकतंत्र तथा कानून से संबंधित नीतियों के लिए अच्छा नहीं है।

श्री मुखर्जी ने कहा कि नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का बार.बार उल्लंघन तथा आतंकवादी हमलों को देखते हुए उनकी रोकथाम के लिए न केवल ठोस कूटनीति. बल्कि एक कड़ी सुरक्षा प्रणाली बनाने की जरूरत है। वििभन्न देशों के बीच टकराव ने सीमाओं को खूनी हदों में बदल दिया है तथा आतंकवाद को बुराई का उद्योग बना दिया है। आतंकवाद तथा हिंसा हमारी सीमाओं से घुसपैठ कर रहे है और हम ऐसे शत्रुओं का जोखिम नहीं उठा सकते जो हमारी प्रगति में बाधा पहुंचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते। विश्व को आतंकवाद के इस अिभशाप से लड़ने में भारत का साथ देना चाहिए। उन्होंने आर्थिक प्रगति को लोकतंत्र की परीक्षा बताते हुये कहा कि वर्षा 2015 उम्मीदों का वर्षा है। आर्थिक संकेतक बहुत आशाजनक हैं। बुनियादी क्षेत्र की मजबूती  राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की दिशा में प्रगति कीमतों में कमी  विनिर्माण में तेजी के संकेत तथा पिछले वर्षा कृष्ि उत्पादन में कीर्तिमान हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत हैं। वर्ष 2014..15 की पहली दोनों तिमाहियों में पांच प्रतिशत से अधिक की विकास दर 7से 8 प्रतिशत की उच्च विकास दर की दिशा में शुरूआती बदलाव के संकेत हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी राष्ट्रीय महवाकांक्षा जनता के जीवन स्तर को तेजी से ऊंचा उठाना तथा ज्ञान देशभक्ति  करूणा ईमानदारी तथा र्कतव्य बोध से संपन्न पीढि़यों को तैयार करना है। इसके लिए हमें अपनी शैक्षिक संस्थाओं में गुणवत्ता के लिए प्रयास करने चाहिए ताकि हम निकट भविष्य में 21वीं सदी के ज्ञान क्षेत्र के अग्रणियों में अपना स्थान बना सकें। इसके लिए उन्होंने पुस्तक संस्कृति पर जोर देते हुये युवाों को संचार एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल विशेष ध्यान का आह्वान किया ताकि 21वीं सदी भारत की मुठ्ठी में आ जाये। श्री मुखर्जी ने कहा कि पिछला वर्षा कई तरह से विशिष्ट रहा  खासकर इसलिए कि तीन दशकों के बाद जनता ने स्थाई सरकार के लिए एक अकेले दल को बहुमत देते हुए सत्ता में लाने के लिए मतदान किया और इस प्रक्रि या में देश के शासन को गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों से मुक्त किया है। मतदाता ने अपना कार्य पूरा कर दिया है अब यह चुने हुए लोगों का दायित्व है कि वह इस भरोसे का सम्मान करें। यह मत एक स्वच्छ  कुशल कारगर  लैंगिक संवेदनायुक्त पारर्दशी जवाबदेह तथा नागरिक अनुकूल शासन के लिए था। 

राष्ट्रपति ने कहा कि एक सक्रि य विधायिका के बिना शासन संभव नहीं है लेकिन कानून के द्वारा जनता की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए आपसी सहमति से कानून बनाने की जरू रत है पर बिना चर्चा कानून बनाने से संसद की कानून निर्माण की भूमिका को धक्का पहुंचता है और इससे जनता का विश्वास टूटता है। यह न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही इन कानूनों से संबंधित नीतियों के लिए अच्छा है। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू    सरदार पटेल  सुभाष चंद्र बोस  भगत सिंह  रवीन्द्रनाथ टैगोर. सुबस्रण्यम भारती आदि को याद करते हुये कहा कि इन लोगों ने भारत माता की आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी परंतु मुझे यह देखकर दुख होता है कि जब महिलाओं की हिफाजत की बात होती है तब उसके अपने बच्चों द्वारा ही भारत माता का सम्मान नहीं किया जाता। बलात्कार    हत्या  सडकों पर छेड़छाड़  अपहरण तथा दहेज हत्याओं जैसे अत्याचारों ने महिलाओं के मन में अपने घरों में भी भय पैदा कर दिया है। श्री मुखर्जी ने कहा कि टैगोर महिलाओं को न केवल घर में प्रकाश करने वाली देवियां मानते थे वरन उन्हें स्वयं आत्मा का प्रकाश मानते थे। माता पिता  शिक्षकों और नेताओं के रू प में हमसे कहां चूक हो गई है कि हमारे बच्चे सभ्य व्यवहार तथा महिलाओं के प्रति सम्मान के सिद्धांतों को भूल गए हैं। हमने बहुत से कानून बनाए हैं परंतु हर एक भारतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाओं की हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए। केवल ऐसा ही देश वैश्विक शक्ति बन सकता है जो अपनी महिलाओं का सम्मान करे तथा उन्हें सशक्त बनाए। श्री मुखर्जी ने भारतीय संविधान को लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक बताते हुये कहा कि यह ऐसे भारत के सामाजिक आर्थिक बदलाव का पथ प्रर्दशक है जिसने प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है. सहनशीलता का पक्ष लिया है तथा वििभन्न समुदायों के बीच सदभाव को बढावा दिया है। परंतु इन मूल्यों की हिफाजत अत्यधिक सावधानी और मुस्तैदी से करने की जरूरत है लेकिन निहित स्वार्थों एवं उन्माद तथा वाणी की हिंसा से लोग आहत होते हैं। इसलिए गांधी जी ने कहा था कि धर्म एकता की ताकत है हम इसे टकराव का कारण नहीं बना सकते।

कोई टिप्पणी नहीं: