उच्चतम न्यायालय ने झारखंड में नक्सली हिंसा का मुकाबला करने के लिए बने गोपनीय सेवा कोष के कथित दुरुपयोग के मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच की अधिसूचना रद्द करने के झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से आज इंकार कर दिया। शीर्षा अदालत ने इस मामले की भविष्य में सुनवाई की संभावना बरकरार रखते हुए कहा कि जनहित याचिका की बजाय झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील दायर की जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायमूर्ति ए के सिकरी की खंडपीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच की अधिसूचना निरस्त कर दी थी। याचिकार्कता इस आदेश के खिलाफ जनहित याचिका दायर नहीं कर सकता है। इस आदेश के खिलाफ या तो राज्य सरकार को विशेष अनुमति याचिका दायर करनी चाहिए थी या आप खुद ऐसा करते।
न्यायालय ने रांची स्थित सामाजिक कार्यर्कता राजू कुमार को उचित अपील दायर करने की छूट प्रदान की. जिसके बाद उनके वकील निर्मल कुमार अंबष्ठ ने यह सुझाव मानते हुए याचिका वापस ले ली। सामाजिक कार्यर्कता ने इस याचिका में गोपनीय सेवा कोष के नाम पर राज्य पुलिस अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर धन निकाले जाने और इसका वितरण करने के तरीके की सीबीआई जांच का निर्देश देने का अनुरोध किया था. इस कोष का इस्तेमाल मुखबिरों को पैसा देने के लिए होता है।
याचिका में इस कोष का दुरूपयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मामले र्दज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था। इस कोष का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसी संवैधानिक संस्था ॉडिट नहीं करती. बल्कि इसका प्रशासनिक ॉडिट ही होता है। वर्षा 2004श05 में इस कोष के लिए 50 लाख रुपए का प्रावधन किया गया था. जिसे 2005..06 में बढाकर 8.30 करोड रुपए कर दिया गया था। याचिका में दावा किया गया था कि तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, स्पेशल ब्रांच झारखंड ने अधिकृत किये जाने के बिना ही 5.6 करोड रुपए निकाल लिये थे। राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में इस मामले की सीबीआई जांच के लिये सहमति व्यक्त की थी. लेकिन बाद में उच्च न्यायालय ने इसकी अधिसूचना निरस्त कर दी थी।

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