नीति आयोग की पहली बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा उत्तराखण्ड को मिले विषेष राज्य का दर्जा
देहरादून, 8 फरवरी, (निस)। हम नवोदित पर्वतीय राज्य हैं। हमारे पास संसाधनों की कमी हैं। अतः हमारा आग्रह है कि हमारा विशेष राज्य का दर्जा बनाये रखा जाए और हमारी सारी योजनाएं 90ः10 के अनुपात में रखी जाए। यह बात मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की पहली बैठक में राज्य का पक्ष रखते हुए कही। बैठक शुरू होने से पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि हमारे एक कैबिनेट मंत्री का निधन हो गया है, जिसके अंतिम संस्कार में उन्हें षीघ्र ही हरिद्वार जाना है। इस पर प्रधानमंत्री ने श्री रावत को सहर्श अपना पक्ष रखने की अनुमति दी। मुख्यमंत्री श्री रावत ने बैठक में दूसरे नम्बर पर काफी खुषगवार माहौल में अपनी बात प्रधानमंत्री के समक्ष रखी। अपना पक्ष रखने के बाद मुख्यमंत्री श्री रावत हरिद्वार के लिए रवाना हो गये।
उत्तराखण्ड को मिले ग्रीन बोनस
बैठक में मुख्यमंत्री श्री रावत ने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारा सुझाव है कि 12वीं पंचवर्षीय योजनाकाल की वर्तमान व्यवस्था में कोई परिवर्तन न किया जाय। नार्थ ईस्टर्न काॅउन्सिल की तर्ज पर सेंट्रल हिमालयन काउसिल गठित की जाय। योजना आयोग द्वारा वर्ष 2013 में योजना आयोग के सदस्य श्री बी.के.चर्तुवेदी की अध्यक्षता में जो समिति गठित की गई थी, उसकी संस्तुतियों को स्वीकार कर हिमालयी राज्यों के लिए लागू किया जाए। उत्तराखण्ड जैसे राज्यों को ग्रीन बोनस दिया जाए। केन्द्र सरकार के एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखण्ड के वनों के द्वारा दी जाने वाली पर्यावरणीय सेवा का वार्षिक मूल्य 16 लाख करोड़ रूपया है। सकल घरेलू उत्पाद का आकलन करते वक्त ग्रीन एकाउंटिंग को भी ध्यान में रखा जाए, ताकि जंगल हमारे लिए भार न हो सके। भागीरथी ईको सिस्टम जोन नोटिफिकेशन-2012 को निरस्त किया जाए, जिसके अन्तर्गत एक छोटे से जिले के 4200 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र को ईको सेंसटिव जोन घोषित किया गया हैं। इस सम्बंध में राज्य में भागीरथी नदी घाटी विकास प्राधिकरण पहले से गठित है।
ट्रांस हिमालयन हाईवे का हो निर्माण
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की सीमाएं अन्तर्राश्ट्रीय सीमाओं से लगी हुई है, इसे देखते हुए उचित होगा कि सीमा सड़कों, रेलवे लाईन, हवाई पट्टी, संचार साधन आदि अवस्थापना विकास कार्यों को केन्द्र सरकार स्वयं अपने संसाधनों से कराये। इस सम्बन्ध में राष्ट्र की सुरक्षा तथा राज्यों के सीमान्त क्षेत्रों के विकास के दृष्टिगत ट्रांस हिमालयन हाईवे का निर्माण किया जाय। भारत-नेपाल से लगी टनकपुर-जौलजीवी मार्ग के निर्माण में तेजी लायी जाय। जौलीग्राण्ट हवाई अड्डे को अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे तथा पन्तनगर को कार्गो हवाई अड्डे के रूप में विकसित किया जाय। अन्य हवाई पट्टियों यथा नैनी-सैनी, चिन्यालीसौड, गौचर आदि का सुदृढीकरण एवं विस्तार किया जाय। जल विद्युत ऊर्जा को साफ सुथरी उर्जा बताया गया है तब भी पर्यावरण के नाम पर हमारी अनेकों योजनाएं रोक दी गई है अथवा स्वीकृति हेतु लम्बित पडी हुई है। अतः राज्य की लंबित विद्युत परियोजनाओं पर शीघ्र निर्णय लिया जाय। भारत की प्रमुख नदियों के उद्गम स्थल उत्तराखण्ड को वाटर हब के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में पहल करते हुए हमने इन नदियों के जलागम क्षेत्रों में वृक्षारोपण एवं जलाशयों के निर्माण की योजना बनाई है, जिसमें हमें मदद की आवश्यकता है। अतिवृष्टि एवं भूस्खलन के कारण नदी तल एवं तटों में भारी मात्रा में गाद के रूप में रेत, बजरी, पत्थर जमा होने से नदियों का बहाव प्रभावित होता है और नदी तटों पर कटाव एवं भूक्षरण असामान्य रूप से अधिक होता है। अतः नदियों की सफाई की दृष्टि से इनके दोहन को खनन की श्रेणी से बाहर रखा जाय। नमामि गंगे परियोजना के लिए बधाई देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह योजना मां गंगा को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। श्री रावत ने कहा कि इस योजना के सम्बन्ध में मेरा परामर्श है, कि योजना को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि गंगा के उद्गम स्थल उत्तराखण्ड को जल संवर्धन हब के रूप में विकसित किया जाय। इस दिशा में हमने स्वयं पहल करते हुए नदियों के जलागम क्षेत्रों में वृक्षारोपण तथा छोटे-छोटे जलाशयों के निर्माण की योजना (जल संवर्धन योजना) भी पूरे उत्तराखण्ड मेें प्रारम्भ की है। राज्य का 70 प्रतिशत भू-भाग वन क्षेत्र है। इससे प्राप्त होने वाले पर्यावरणीय लाभ पूरे देश को मिल रहे हैं, किन्तु इनके संरक्षण एवं विकास का बोझ हमें उठाना पड़ रहा है। अतः हमें पर्यावरणीय सेवाओं के एवज में ग्रीन बोनस दिया जाय। सकल घरेलू उत्पाद के अनुमान लगाने में पर्यावरणीय क्षति तथा पर्यावरण सुरक्षा पर किये गये व्यय का संज्ञान लेना जरूरी है तभी सतत् विकास की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। इसी के आधार पर राज्यों को उनके द्वारा किये गये प्रयासों एवं उसके लिए किये जा रहे त्याग एवं पंगुताओं को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय बजट में विशेष व्यवस्था की जाय जैसा कि चतुर्वेदी कमेटी ने भी संस्तुत किया है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण इसके लिए बने विशेष प्रोजेक्ट
आपदा के कगार पर स्थित ग्रामों का पुनर्वासन किया जाना है। जून, 2013 की आपदा के बाद ऐसे ग्रामों की संख्या 337 से अधिक हो चुकी है, जिन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाना आवश्यक है इसके लिए वन भूमि की अदला-बदली करनी होगी। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण इसके लिए विशेष प्रोजेक्ट तैयार करने में राज्य की सहायता करें। राज्य सरकार को विश्वास में लिए बगैर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा भागीरथी जलग्रहण क्षेत्र उत्तरकाशी जनपद का 4180 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबन्धित कर दिया गया, स्थानीय ग्रामीणों को अपना एक कमरा बनाने के लिए भी पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति लेनी होगी, ऐसी स्थिति में लोग क्षेत्र से पलायन करने के लिए बाध्य हो रहे है, अतः इसे वापस लिया जाय। पर्वतीय क्षेत्रो विशेषकर सीमान्त क्षेत्रों में विभिन्न प्रतिबन्धों के चलते एवं बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग यहाँ से शहरो की ओर पलायन कर रहे है, जिससे वर्तमान शहरों पर अत्यधिक दबाव बढ गया है इससे पुराने शहरो मंे सुविधाओं के अभाव में मलिन बस्तियां बढ रही है। अतः शहरी अवस्थापना सुविधाओं पर अधिक ध्यान देना होगा।
देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेष मेट्रो सेवा से जोड़े जांय
देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश मेट्रो सेवा बनाये जाने से मदद मिलेगी। वर्तमान शहरों के छोटे आकार एवं बढते दबाव को देखते हुए सुझाव है कि रूद्रपुर-किच्छा-पन्तनगर-हल्द्वानी-काठगोदाम शहरों के लिए एकीकृत करते हुए स्मार्ट सिटी योजना के अन्तर्गत विकसित किया जाय तथा इन्हे आपस में मेट्रों से जोडा जाय। धार्मिक महत्व के स्थलों के कारण प्रत्येक वर्ष लगभग 3-4 करोड़ अतिरिक्त आबादी का बोझ हमें उठाना पड़ता है, इससे हमारी शहरी बुनियादी सुविधाओं पर बोझ बढ जाता है। 2010 के महाकुम्भ में लगभग 8 करोड़ यात्री राज्य में आये। अतः शहरी विकास से सबंधित योजनाओं यथा जेएनएनयूआरएमए पेयजल, स्वास्थ्य एवं सफाई आदि योजनाओं के लिए जनसंख्या मानकों में इस भ्रमणशील आबादी का संज्ञान लिया जाय और शहरों के वहन क्षमता पर अत्यधिक दबाव के दृष्टिगत स्मार्ट सिटी के चयन के मानकों में शिथिलता दी जाय। अगले वर्ष राज्य में अर्द्धकुम्भ आयोजित हो रहा है, जिसमें पूर्व की भांति देशी-विदेशी श्रद्धालुओं द्वारा भाग लिया जायेगा। इसके लिए अभी से हरिद्वार कुम्भ क्षेत्र तथा इसके आस-पास आवश्यक सुविधाऐं विकसित की जानी है। इसके लिए भारत सरकार से सहायता की अपेक्षा है। डिजीटल इंडिया में उपयोग में आने वाले उपकरणों से सम्बन्धित बड़े उद्योग हरिद्वार तथा उधमसिंह नगर के औद्योगिक क्षेत्रों में लगाये जाये, जो कि मेक इन इंडिया की भावना के अनुरूप होगा। बैठक में केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली, राजनाथ सिंह, सहित अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्री उपस्थित थे।
जोरदार बर्फवारी ने खोली सरकार के दावों की पोल
देहरादून, 8 फरवरी(निस)। सरकार ने शीतकालीन पर्यटन का बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन पिछले दिनों हुई जोरदार बर्फवारी ने सरकार के दावों की पोल खोल दी है। सरकार मोटरमार्ग से एक माह बाद भी बर्फ नहीं हटा पाई, जिसके चलते एक माह से पर्यटक चोपता के दीदार नहीं कर पा रहे हैं। जिले में शीतकालीन पर्यटन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन प्रदेश सरकार इस दिशा में ठोस पहल नहीं कर पा रही है। सरकार पर्यटकों को पर्यटन स्थलों तक पहुंचाने में नाकाम साबित हो रही है। बताते चलें कि देवरियाताल, मद्महेश्वर, चोपता, दुगलबिट्टा, पवालीकांठा समेत कई पर्यटक स्थलों पर बर्फवारी के बाद पर्यटक जाना चाहते हैं, लेकिन सुविधाएं न होने से पर्यटकों को दिक्कतें हो रही हैं। ऊखीमठ-चोपता-मंडल मोटरमार्ग तो हर साल बर्फवारी से महिनों तक बंद रहता है। पर्यटक अखिलेश सिंह का कहना है कि बर्फबारी के बाद चोपता जाने का प्लान तो बनाया था, लेकिन जैसे-तैसे दुगलबिट्टा तक ही पहुंच पाए। यहीं से मजबूरन वापस आना पड़ा। अधिशासी अभियंता प्रवीण कुमार का कहना है कि बर्फवारी से ऊखीमठ-चोपता व ऊखीमठ पलद्वाड़ी मोटरमार्ग बंद हो गए थे, जिन्हें यातायात के लिए खोल दिया गया था। समय-समय पर बर्फबारी के बाद सड़क से बर्फ हटाई जाती है।
15 साल से जान हथेली पर रखकर सफर करने को मजबूर ग्रामीण
गोपेश्वर, 08 फरवरी(आरएनएस)। पिछले पंद्रह साल से ग्रामीण कांडईपुल मोलागाड़ सेमा बैरासकुंड मोटर मार्ग पर जान हथेली पर रखकर सफर करने को मजबूर हैं। कांडई पातल नामक स्थान पर एक किलोमीटर सड़क लगातार धंस रही है। इसके अलावा, आठ से अधिक स्थानों पर भी डेंजर जोन लगातार राहगीरों की आवाजाही रोक रहे हैं। पीएमजीएसवाइ और लोनिवि के कर्णप्रयाग डिविजन के पास इस सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी है, लेकिन दोनों विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। घाट ब्लॉक के पगना, कांडई समेत 20 से अधिक गांवों को यातायात सुविधा से जोडने के लिए वर्ष 2000 में कांडईपुल से बैरासकुंड तक 16 किलोमीटर मोटर मार्ग का निर्माण किया गया। लेकिन इसका खास फायदा लोगों को नहीं मिल सका। कांडई पातल नामक जगह पर यह सड़क 15 सालों से धंस रही है। इस स्थान पर तकरीबन एक किलोमीटर क्षेत्र धंसने से सवारियों को उतरकर पैदल पार जाना पड़ता है। इसके बाद फिर वाहन में बैठकर अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। इसके अलावा, आलई गदेरा, खिदारी गदेरा, अमिलबाड़ी गदेरा, चैधार तोक समेत आठ से अधिक स्थानों पर सड़क की स्थिति कमोवेश खतरनाक ही है। इन डेंजर जोन पर प्रतिवर्ष भूस्खलन व सड़क धंसाव के चलते ग्रामीणों को यातायात सुविधा से महरूम रहना पड़ता है। इस सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी दो-दो विभागों पर है। लेकिन सड़क का रखरखाव करने की बजाये दोनों बार एक-दूसरे पर ही जिम्मेदारी डालते हैं। बैरासकुंड संघर्ष समिति के सदस्य सेमा गांव निवासी हिम्मत सिंह रावत का कहना है कि इस सड़क की दशा को सुधारने के लिए संघर्ष समिति कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुकी है। लेकिन विभाग इस सड़क को सुधारने की बजाये मुंह फेर रहे हैं। अधिशासी अभियंता आदर्श गोपाल का कहना है कि यह सड़क आपदा के दौरान कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हुई थी। पूर्व में डेंजर जोन पर क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत का कार्य किया गया। परंतु भूस्खलन के चलते यह सड़क फिर कई जगह क्षतिग्रस्त हो गई है। इसकी मरम्मत के लिए धनराशि की मांग की गई है।
इन गांवों के लोगों को हो रही दिक्कतें
-पगना, कांडई, माणखी, चर्री, खलतरा, मटई, बैरासकुंड, सेमा, चाका मोठा समेत 20 से अधिक गांव।
ये हैं डेंजर जोन
-कांडई पातल, चाका व मोठा के बीच आलई गदेरा, सेमा में खिदारी गदेरा, अमिलबाड़ी गदेरा, चैधार तोक समेत आठ से अधिक स्थान।
हिमालय बचाओ अभियान के तहत समीर रतूड़ी का अनशन जारी
देहरादून, 8 फरवरी(निस)। मलेथा के ग्रामीणों ने क्रशर विरोधी मुहिम के तहत रविवार को राष्ट्र्रीय राजमार्ग के मलेथा तिराहे पर पर्यटन मंत्री दिनेश धनै का पुतला फूंका और उनके खिलाफ नारेबाजी की। वहीं मलेथा में हिमालय बचाओ अभियान के समीर रतूड़ी का अनशन 10वें दिन भी जारी रहा। रविवार को मलेथा तिराहे पर एकत्र हुए आक्रोशित ग्रामीणों ने पर्यटन मंत्री धनै के मीडिया को दिए बयान की निंदा करते हुए कहा कि इससे प्रतीत होता है कि मंत्री भी स्टोन क्रशर मालिकों के पक्ष में हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि मलेथा सहित विकासखड क्षेत्र में मानकों के विपरीत चल रहे स्टोन क्रशरों की जांच कर उन्हें भी बंद किया जाय, साथ ही प्रदेश में लगे सभी स्टोन क्रशरों की जांच कर उचित कार्यवाही की जाए और इससे संबंधित नीति घोषित की जाए। इस दौरान पुलिस ने आंदोलनकारियों को पुतला जलाने से रोकने का प्रयास भी किया। जब पुतले में आग लगी तब पुलिस उसे बुझाने के लिए पानी डालने लगी। इस दौरान पानी की बाल्टी को लेकर आंदोलनकारी व पुलिस के बीच खींचतान भी हुई। इस मौके पर अद्वैतानंद महाराज, त्रिलोक चंद्र सोनी, भवानी देवी, पीबी डोभाल, जगदंबा प्रसाद रतूड़ी, बिमला देवी नेगी, प्रधान शूरवीर बिष्ट, देव सिंह नेगी, सत्यनारायण सेमवाल, खेम सिंह चैहान, भूपत सिंह राणा, दिनेश भट्ट आदि मौजूद थे। वही अनशनकारी के समर्थन में नीरज नेगी, प्रवीन महर, नवीन गुसांई, देवेंद्र रावत क्रमिक अनशन पर बैठे रहे।
सीएम से वार्ता को होंगे रवाना
मलेथा के ग्रामीण क्रशरों को बंद करने के संबंध में मुख्यमंत्री से वार्ता के लिए सोमवार को देहरादून के लिए रवाना होंगे। अनशनकारी समीर रतूड़ी ने बताया कि इस वार्ता में वह ग्रामीणों के प्रतिनिधिमंडल के साथ ही स्वयं भी भाग लेंगे।
पंत पहुंचीं समर्थन देने
क्रशर के विरोध में मलेथा में चल रहे आंदोलन को समर्थन देने के लिए उत्तराखंड महिला मंच की संयोजक कमला पंत भी यहां पहुंची। उन्होंने कहा कि मलेथा में जो क्रशर लगाए जा रहे हैं, वह सरकार की विकास विरोध मुहिम है। उन्होंने कहा कि यहां की महिलाओं का आंदोलन प्रदेश के लिए चिपको आंदोलन की तरह एक नया अभियान है। वहीं जिला पंचायत सदस्य सोना सजवाण ने भी अनशन स्थल पर पहुंचकर ग्रामीणों की मांगों का समर्थन किया है।
नैथाणा से भी हटाए जाएं क्रशर
नैथाणा, रानीहाट, चैरास, सुपाणा क्षेत्र में संचालित किए जा रहे स्टोन क्रशरों को भी बंद किया जाए। जिला पंचायत के पूर्व सदस्य महिपाल सिंह बुटोला ने इस मुद्दे पर कीर्तिनगर प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस क्षेत्र में चल रहे तीन स्टोन क्रशर को बंद नहीं किया गया तो उपजिलाधिकारी कीर्तिनगर के कार्यालय पर घेराव और जनांदोलन किया जाएगा।

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