जीरापुर- भारत भूमि चमत्कारों, अविष्वसनीय क्विदंतियों की देव भूमि के रूप में विख्याात है. सतयुग, त्रैता,द्धापर में भले ही कदम कदम पर चमत्कारिक स्थल रहे हो. पर कलयुग में भी सत प्रधान चमत्कारिक धार्मिक स्थलों की कमी नही है. उन्हें में से एक जीरापुर से महज 07 मिलोमीटर दूर छापी नदी तट पर स्थित छापेष्वर महादेव मंदिर. नदी के बीच निर्मित मंदिर तक पहुंचने के लिए बकायदा सेतू का निमार्ण कराया गया. सेतू निमार्ण से पहले नाव ही साहरा थी. नाग पंचमी, षिव रात्री, कार्तिक पूर्णिमा सहित अन्य पर्वो पर विषेष जत्रा अर्थात मेले लगते है. पडोसी सूबे राजस्थान के अलावा महाराष्ट, हरियाणा तक से हजारों श्रद्धालू आते है. नवाते आस्था,विष्वास से षीष. आषुतोष करते भक्तों की मनोकामनाएं पूरी.
छापी नदी बाढ के समय अपने प्रचंड वेग में मंदिर सहित ग्राम को नेस्तानाबूद कर देती है. बाढ की भयावहता से किनारे टूट जाते. धर बह जाते. मगर मजाल महादेव को धूनी देने वाला खप्पर अपने स्थान से टस से मस हो जाएं. भले ही बाढ 08 से लेकर 30 धंटे तक रहे. खप्पर यथावत रहता है. पुजारी सहित भक्त इसे चमत्कार मानते है. सच भी बाढ में भारी भारी वस्तू बह जाती. मगर बेहद हल्का खप्पर अपना स्थान नहींे छोडता. कार्तिक पूर्णिमा काल में एक भारी षिला तैरा करती थी. उक्त षिला के संग अन्य पतर््थर भी तेरा करते थे. इस अलोकिक नजारे को देखने के लिए सैलाब उमड पडता था. लेकिन पिछले 30 साल से षिला अब अपना स्थान नहीं छोडती. इसकी वजह ये बताई जाती हे कि किसी महिला ने अच्छी- बुरी अवस्था में षिला पर कपउे धौ डाले. अब ये षिला किनारे पर पडी है. ग्राम के लोग इस पर कपडे धौते है.
बाजार के अभाव में हल्दी उत्पादन फैल
भैसवामाता- कृषि विज्ञान केंद्र-राजगढ और उधानिकी विभाग ने राजगढ के किसानों को नगद एंव औषधिय फसल लगाने के लिए जमकर प्रेरित किया. जगह जगह कृषि मेले लगाएं. किसानों को उन्नत तकनीक सीखाने के लिए कराएं कए भ्रमण पर लाखों रूप्यां बर्बाद किया. लेकिन पिछले 17 सालों के अनुभव और कसरतों का नतीजा संतरा फसल से आगे नहीं बढ पाया. राजगढ के सारंगपुर, जीरापुर, ब्यावरा, नरसिंहगढ अचंल में सेकडों किसान संतरा उत्पादन करके अपनी आर्थिक हैसियत बढाने में कामयाब रहे. उनमें सबसे अग्रणी है- इंजीनियर सूरज नागर. श्री नागर कुषल इंजीनियर थे. लेकिन उन्हे नौकरी की तिमारदारी रास नहीं आई और कूद गए पुष्तैनी धंधे खेती में. कर दिखाया अपना हाथ जगन्नाथ. आज श्री नागर के तीन बगीजों में करीब 04 हजार पेड संतरे के है. जिससे उन्हे सम्मानजनक तरीके से 25 लाख सालाना से अधिक आय होती है. हर बगीचे को आध्ुानिक रूप दे दिया. पानी की तंगी का इलाज ड्ीप सिस्टम अपना कर किया. श्री नागर ने अपने ग्राम के अलावा आसपास के पचासों ग्राम के किसानों को प्रेरित किया. नतीजन अनेक ग्रामों में संतरे के बगीचे ललचाते है. संतरे अच्छी किस्म के आएं. इसलिए वे 12 महीने समय पर दवाएं, उर्वरक, र्जविक खाद देते रहते है. कीट नियंत्रण भी करते है. राजगढ के संतरे दिल्ली, कानपुर तक जाते है. कुछ दिनों बाद संतरे की तुडाई और पेकिंग का श्रीगणेष हो जायेंगा. इस साल बार बार गिरे मावठे से संतरे बडा,चमकदार और मिठास लिए हुए है. श्री नागर ने हल्दी उत्पादन भी हाथ अजमाया था. लेकिन कटु अनुभवों और कृषि विज्ञान केंद्र में व्याप्त लालफीताषाही, असहायोग के चलते हाथ खेचना पडा. उत्पादित हल्दी का लागत मूल्य तक नहीं निकल सका. वजह राजगढ में बाजार नहीं होना. बाजार हे महाराष्ट के सांगली में.सांगली, कच्ची हल्दी भेजने की रिस्क उठाना बहुत सरदर्द वाला और नुकसान दायक रहा. श्री नागर के संग दर्जन भर से अधिक उत्साही किसानों ने भी हल्दी उत्पादन किया था. सबकों भारी नुकसान का सामना करना पडा. यदि हल्दी को पका कर भेजते तो भाव माकूल मिलते. हल्दी पकाने का एक सयंत्र केन्द्र सरकार ने कृषि विज्ञान केंद्र राजगढ में लगवाया था. लेकिन भारी कमीषन खौरी के चलते सयंत्र के नाम पर कबाड रोप डाला. इस कबाड से 01 टन भी हल्दी पकाई नहीं जा सकी. ये स्थापना काल से फेल हो गया. इसके फैल होते ही राजगढ में हल्दी उत्पादन की उज्जवल संभावनाओं ने दम तोड दिया. श्री नागर का मानना हे कि राजगढ में यदि हन्दी पकाने की माकूल व्यवस्था हो जाएं तो हल्दी की खेती राजगढ की तकदीर-तस्वीर बदल सकती है. चैखी,बहूपयोगी,स्वास्थ्यवर्धक फसल है. सरदर्द और धाटे ने श्री नागर सहित अन्य किसानों को हल्दी उत्पादन से तौबा करने के लिए मजबूर कर दिया. सबसे हैरत की बात ये हे कि कृषि विज्ञान केंद्र भी अब आराम के केंद्र में बदल गया. किसान हित में चलने वाली गतिविधियां ठप्प. न अधिक उत्पादन देने वाले किसी फसल के बीज की खौज की जा सकी.
रामगढ- अब न गढ और न राम
कुरावर- मालवा-ए-कष्मीर नरसिंहगढ से महज 06 किलोमीटर दूर सतपुणा की श्रेणियों में बसा कभी का वैभवषाली इतिहासिक रियासत,षाही ठिकाना रामगढ अब श्रीहीन, कांतिहीन हो चुका है. रखरखाओं के अभाव में गढी खंडहर में बदल चुकी है. उसमें जगी जगह झांड-झंकार उग आएं. दीवारे ढह जाने से सुरक्षा के इंतजाम ध्वस्त. इसके वारिस बस वारिस भर रह गए. षाही गरूर ने गढी से उठाकर एक खपरेल पोष दलान में ला पटका. खेती नाम की बची. उनके पास आन-बान-षान ही ष्षाही यादों के सिवा कुछ नहीं बचा. गढी के जिस हिस्से में न्याय के लिए तहसील लगाई जाती थी. वहां रखे लकडी के सिहासन पर पुरखों की तस्वीरे रखी है. उन पर से धूल साफ करने वाला कोई नहीं. तहसील में जगह जगह सीलन आ चुकी है. चमक और ताप खौ चुकी है. 125 मीटर उंचे पहाड पर एक समृद्ध नगर होने के अवषेष ष्षौर्य-वैभव की कथा बयान करते है. वहां किला भी रहा होगा. किले के अंदर बस्ती रही होगी. खंडहर हो चुके किले और बस्ती के चिन्ह करीब 04 वर्ग किलोमीटर क्षैत्र में फैले हुए है. किले की पष्चिमी दीवार से लगी 02 किलोमीटर लंबी समतल सडक बहुत कुछ सौचने के लिए मजबूर कर देती है. प्राचीन काल में किस इंजीनियरिंग कमाल और यंत्रों से पहाड को समतल करके रथ-बग्गी चलने योग्य बनाया गया होगा. आधुनिक युग में ये कमाल संभव तो हे लेकिन काफी समय एंव धन साध्य है. सडक से लेकर किले और किले के बाहर तक जगंली पेड-पौधों की भरमार. ग्वालों से ये क्षैत्र दिन भर आबाद रहता है. खंडहर हो चुकी बस्ती से एक किलोमीटर दूर ग्वाल महाराज का स्थान भी है. तमाम ग्वाले पूजा-अर्चना करते है. ध्वस्थ किले से करीब 06 सौ मीटर दूर पानी का एक स्त्रौता है. ये बारिस के कुछ महीनों तक विषुद्ध पानी से लबरेज रहता है. जनवरी लगते ही सूख जाता है. इस साल बार बार गिरे मावठे की वजह से इसमें कुछ पानी है. राजतंत्र कालीन रामगढ के वैभव को लोकतंत्र चट कर गया. संकरी, कीचड सनी गलियां. विकास की हर आंच से दूर. ष्षायद ही किसी बीपीएल कूपन धारक को इन्द्रिरा आवास, कपिलधारा कूप, मेढ बंधान का सूख मिला होगा. निर्मल नीर कूप, सामुदायिक भवन, पंचायत भवन, आंगनवाडी, स्वास्थ्य केंद्र,षाला भवन आदी सब बन गए. मगर लोकतंत्र उनको भौतिक रूप में दिखने नहीं देता. यदि उन्हें खौजना हो तो जनपद की अलमारी में बंद कागजों में ही खौजा जा सकता है. यदि लोकतंत्र के खेवनहारों में राम का सत होता तो गढ की ख्यााति कम न होंती.


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