आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी के भाजपा नेताओं से आत्मीय संबंधों का मामला गहराता जा रहा है। सुषमा स्वराज ने न केवल ललित मोदी की ब्रिटिश सरकार से वाणिज्यिक दस्तावेज दिलाने में मानवीय आधार पर मदद की बल्कि खुद ललित मोदी ने स्वीकार किया है कि स्वराज परिवार से उनके बहुत घनिष्ठ और गहरे संबंध हैं। सुषमा स्वराज अपनी बेटी के साथ उनसे लंदन में एक होटल में निजी तौर पर भी मुलाकात कर चुकी हैं जबकि सुषमा स्वराज पहले जाहिर कर रही थी कि ललित मोदी से उनका कोई खास निजी परिचय नहीं है। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से तो ललित मोदी के इतने ज्यादा संबंध हैं कि उनके सांसद बेटे दुष्यंत सिंह की कंपनी के 99 रुपए के भाव के शेयर उन्होंने एक लाख रुपए में खरीदे थे। सुुषमा स्वराज के पति और उनकी बेटी बिना फीस लिए ललित मोदी की पैरवी कर चुके हैं। वे इसके लिए जब लंदन गए थे तो ललित मोदी ने उन्हें बहुत महंगे होटल में ठहराया था जिसका पेमेंट आईपीएल से किया गया था।
ललित मोदी के रिकार्ड को देखते हुए यह घनिष्ठता बेहद आपत्तिजनक है। पांच वर्षों से भारत में उनकी सात सौ करोड़ रुपए की मनी लांड्रिंग व धोखाधड़ी जैसे संगीन अपराधों में पूछताछ के लिए तलाश चल रही है और वे आईडी को जवाब देने से बचने के लिए ब्रिटेन में शरण लिए हुए हैं। उनका पासपोर्ट निरस्त कर दिया गया था लेकिन हाईकोर्ट ने बहाल कर दिया। सरकार को चाहिए था कि इसके विरुद्ध वह अपील करती लेकिन जानबूझकर अपील नहीं की गई। ललित मोदी के साथ रहमदिली बरती गई और उन्हें पासपोर्ट मामले में इसलिए सरकार का अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिला क्योंकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हैं जिसकी जिम्मेदारी थी कि वह उनका पासपोर्ट बहाल न होने देने के लिए ऊंची अदालत में जाती। दरअसल यह वर्गीय समाज के दृष्टिकोण के अनुरूप है जो रिक्शा वाले को इसके लिए बहुत दुष्ट मानता है कि उसने पचास रुपए ज्यादा ले लिए लेकिन जो लोग देश और समाज का हित दांव पर लगाकर अरबों रुपए की हेराफेरी करते हैं वे इस दृष्टिकोण के मुताबिक भद्र पुरुष की श्रेणी में आते हैं। उनके लिए किसी तरह की नफरत या हिकारत की भावना का सवाल ही नहीं उठता। सही तौर पर एक सभ्य, सुसंस्कृत और नैतिक समाज में इस तरह की धारणा बेहद अनुचित कही जानी चाहिए। रिक्शा वाला या मजदूर अगर कोई बाजीगरी करता है तो वह इसके लिए प्राय: मजबूर रहता है क्योंकि भूख से मरने की बजाय हेराफेरी करके पेट भरने की जुगाड़ कर लेना कहीं से अधर्म नहीं है। भारतीय संस्कृति में तो इसे आपात धर्म के विशेषण के तौर पर चिह्निïत करके बहुत कुछ स्थिति स्पष्ट की गई है और भारतीय जनता पार्टी तो आपात धर्म, राज धर्म, लोक धर्म जैसी धार्मिक परिभाषाओं की एक्सपर्ट है। इस कारण उससे अच्छा इस बात को कौन समझ सकता है।
लेकिन संस्कृति विकृति में बदल गई जब लालचियों और मुनाफाखोरों को उनके गलत इरादों को सेफ पैसेज देने के लिए अर्थ को पुरुषार्थ घोषित किया गया। चार पुरुषार्थों की एक रचनात्मक व्याख्या है और एक दुष्ट व्याख्या भी है। सफेदपोश समाज इसकी दुष्ट व्याख्या को ग्रहण करता है और यह अनर्थ की बड़ी वजह है। यह अनर्थ आज से नहीं हो रहा। महाभारत काल में जिसे धर्मराज कहा गया वह अपनी पत्नी तक को जुए में दांव पर लगा देने वाला निर्लज्ज अधर्मी था। उसके इसी अधर्म की वजह से महाभारत का युद्ध छिड़ा जिसमें दुनिया का पहला साम्राज्य यानी हस्तिनापुर तिनके तिनके होकर बिखर गया और उस समय के संसार के सारे प्रमुख योद्धा वीरगति प्राप्त करने की नियति को विवश हुए। भारत की किस्मत में गुलामी का लेख लिखने की भूमिका महाभारत की वजह से ही तैयार हुई।
भारतीय संस्कृति की व्याख्या के दो पहलू हैं। परंपरागत पहलू में असमंजस पैदा करके नैतिक बल को क्षीण किया गया इसीलिए आधुनिक काल में हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर डा. नामवर सिंह तक को भारतीय संस्कृति के मामले में दूसरी परंपरा की खोज का नारा लगाना पड़ा। अतीत में भी सांस्कृतिक स्तर पर इसी तरह के द्वंद्व उभरे जिनसे अपने समय की वैचारिक क्रांति के रूप में उपनिषदों का प्रतिपादन हुआ। ललित मोदी वास्तविक तौर पर देखा जाए तो आर्थिक पुरुषार्थी नहीं हैं। ऐसे लोग आर्थिक जगत के डकैत हैं जो अपने स्वार्थों के लिए आर्थिक उदारीकरण के बीहड़ में समाज की हर अच्छाई को लूटने का काम कर रहे हैं। बुनियादी तौर पर क्रिकेट का खेल आज जुए के खेल का पर्याय बन चुका है। यह खेल अगर भारत के कर्ता धर्ताओं में जरा भी स्वाभिमान है तो राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से इसे बेहद गर्हित घोषित करके बंद किया जाना चाहिए। यह केवल इंगलैंड के गुलाम रहे देशों में खेला जाता है यानी इस खेल का प्रचलन जिन देशों में जारी है उन्हें हमेशा याद बनी रहती है कि कभी अंग्रेज उनके मालिक थे और आईपीएल के युग तक पहुंचते पहुंचते तो यह खेल पूरी तरह सट्टे के खेल में बदल गया है। आज जब आईपीएल मैच चलते हैं तो गांव-गांव में सट्टा शुरू हो जाता है। सट्टा यानी जुआ और जिस देश ने जुए के कारण महाभारत जैसी त्रासदी झेली हो कम से कम उस देश के किसी शुभचिंतक को इस खेल को महिमा मंडित करना ही नहीं चाहिए। ललित मोदी इस सट्टेबाजी का सरताज है लेकिन मानवीय आधार पर उसे वाणिज्यिक दस्तावेज दिलाने में मदद की बात कहकर सुषमा स्वराज ने उसको शराफत का जो प्रमाण पत्र देने की कोशिश की है उसके लिए उनकी जितनी निंदा की जाए कम है।
मुलायम सिंह यादव या लालू प्रसाद भी एक स्तर पर भ्रष्ट और जनविरोधी नेताओं की टोली के सिपहसलार हैं। हालांकि कांग्रेस जो ललित मोदी के बहाने नरेंद्र मोदी सरकार की नाक में दम कर रही है वह भी बहुत कोई दूध की धुली नहीं है लेकिन अब यह मुद्दा कांग्रेस बनाम भाजपा का नहीं रह गया। मोदी और उनकी पार्टी व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान का जो ढोल पीटना जारी रखा है क्या वह केवल एक फरेब है। किसी भी वैचारिक लक्ष्य को मूर्त रूप में हासिल करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके तहत ऐसी कार्यनीति अपनाई जाती है जो आदमी के व्यवहार में शामिल होकर अंत में उसका ब्रेन वाश करते हुए उसे वैचारिक लक्ष्य के अनुरूप अपनी मानसिकता ढाालने को तैयार कर दे। महिमा के जो प्रतिमान इस देश के सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ पश्चिमी शक्तियों ने थोपे हैं अगर आज भी देश उनके प्रति नतमस्तक रहता है तो लोगों का माइंड सेट कैसे बदल सकता है और कैसे वह समाज खड़ा हो सकता है जो सही तौर पर संस्कृति और सभ्यता का अनुशीलन करे। अगर ऐसा होगा तो मोदी और लंपट पूंजीवाद के हर महारथी के प्रति वर्ग शत्रुता लाजिमी होगी जिसका अभाव फिलहाल भाजपा में पूरी तरह नजर आ रहा है और इसीलिए उसे अगर एक यथास्थितिवादी पार्टी माना गया है तो इसमें कुछ अन्यथा नहीं है।
के पी सिंह
ओरई
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