पटना, 26 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल पटना और मुजफ्फरपुर में आयोजित विविध कार्यक्रमों में नये-नये वादे कर बिहारवासियों को एक बार फिर सब्जबाग दिखाने का काम किया । परंतु वह विगत लोकसभा चुनावों के दरम्यान किए गये वादों के पूरा नहीं होने पर बड़ी चतुराई से कतरा गये। सौ दिनों के भीतर भ्रष्टाचार को समाप्त करने और विदेषी बैंकों में जमा कालेधन को वापस लाकर सभी देषवासियांे के खाते में 15-15 लाख रुपये तकसीम करने के वादे की चर्चा करने से भी मुकर गए। वास्तविकता तो यह है कि विगत 14 महीनों के उनके शासन काल में भ्रष्टाचार के नये कीर्तिमान उनके संरक्षण में कार्यरत अनेक केन्द्रीय मंत्रियों, राजस्थान, मध्य प्रदेष, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री एवं कई मंत्रियों ने भ्रष्टाचार के मामले में यूपीए सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है। मोदी गेट और व्यापमं जैसे घोटाले तो अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं और नरेन्द्र मोदी की रहस्यमय खामोषी उनके असली चेहरे को बेपर्द कर रही है, फिर भी बड़ी बेषर्मी से वह नये-नये वादेकर आगामी बिहार विधान सभा चुनावों में बिहारवासियों की आंखों में धूल झोंककर कामयाबी की सीढि़याँ चढ़ने को आतुर हैं।
और तो और बिहार को विषेष पैकेज देने के वादे को ढ़ंडे बस्ते में डाल बिहार में सरकार बनाने के अपने सपने को साकार करना चाहते हैं और नये सिरे से वादे कर गये है कि आगे-आगे उससे भी कहीं ज्यादा पैंकेज देने वह पुनः बिहार आएंगे। दूरसंचार माध्यमों के जरिए बिहार को जातियता से मुक्त करने के सपने परोस रहे हैं और कल की अपनी सभाओं में बड़ी चालाकी से जातिवाद का कार्ड प्ले कर गये। पार्टी के राज्य सचिव सत्य नारायण सिंह ने प्रधानमंत्री की ढपोरषंखी घोषणाओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यही कारण है कि मुजफ्फरपुर के चक्कर मैदान में जुटे जनसमुदाय में उनकी बातों के प्रति गर्मजोषी का अभाव देखने को मिला। यहां तक कि राज्य के विभिन्न इलाकों से जुटाये गये भाजपा कार्यकत्र्ता भी आपस में चर्चा करते सुने गये कि चुनावों के मौके पर लोगों के बीच परोसने के लिए प्रधानमंत्री ने कोई नयी सौगात नहीं दी। इस प्रकार उनके बीच भी निराषा दिखी। भाकपा नेता ने बताया कि पार्टी के राज्य सचिवमंडल ने प्रधानमंत्री द्वारा बिहारवासियों को ठगने की प्रवृति की तीव्र भत्र्सना करते हुए राज्य की जनता से उनके झांसे में नहीं आने की अपील की ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का निष्चित मत है कि सम्प्रदायवाद और जातिवाद से बिहार की राजनीति को मुक्त करना आज की सर्वप्रमुख आवष्यकता है और संयुक्त वामपक्ष के इर्द-गिर्द ही इन विभाजक शक्तियों का वास्तविक विकल्प निर्मित किया जा सकता हेै जिसके लिए वामपंथी दल पहल कर चुके हैं। इनकी पोल खोलकर ही चुनावों में वामोन्मुख शक्तियों को एकजुट कर बिहार को जनपक्षी समावेषी विकास के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है। लोग अब समझ चुके हैं कि नरेन्द्र मोदी के राजपाट में अच्छे दिन काॅरपोरेट घरानों के आए हैं और आम लोगों के लिए और भी बुरे दिन कालगर्भ में है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें