- गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई, जो बिरंचि संकर सम होई के बीच धूमधाम से मना गुरु पूर्णिमा
वाराणसी। धर्म एवं आस्था की नगरी काशी में में शुक्रवार को पूर्णिमा का दिन गुरुजनों, संतो व स्वामियों के नाम रहा। देवालयों, विद्यालयों से लेकर संत आश्रमों तक शिष्य अपने गुरुओं के पांव पखार उनकी पूजा कर आरती उतारी। जगह-जगह गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित गीत-संगीत के अलावा गुरु देवेभ्यो नमः आदि मंत्रोच्चार व जयकारों के बीच जाने-माने संतों व आचार्यों के आश्रमों में गुरु पूजा की धूम रही। लंका स्थित गढ़वा घाट आश्रम में गुरु पूर्णिमा पर्व पर श्रद्धा, आस्था व भक्ति का अनूठा संगम दिखा। आश्रम में गुरु गीता पाठ, पादुका पूजन, आरती, गुरु वंदना, भजन-कीर्तन व सम्मान समारोह के बाद स्वामी श्री सरनानंद जी महराज का दर्शन कार्यक्रम सुबह शुरु हुआ तो रात में ही थमा। देश-विदेश से आएं हजारों साधकों, अनुयायियों एवं आस्थावानों ने श्री स्वामी सरनानंद जी महराज को आदरांजलि अर्पित की। शीश नवाकर आर्शीवाद लिया।
आर्शीवाद वचन के दौरान श्री स्वामी जी ने कहा, गुरुबिन भव निधि तरै कोई, जौ विरंचि शंकर सम होई...। यानी मनुष्य यदि शंकर के समान भी हो जाए, फिर भी बिना गुरु की कृपा से भव सागर पार नहीं कर सकता है। गुरु के बिना शिष्य सफल नहीं हो सकता है, क्योंकि गुरुदेव उसे ऊपर चढ़ने की विधि तो बताते हैं, साथ ही पग-पग पर उसे अपना संरक्षण भी देते हैं। हर पल उसकी रक्षा करते हैं। गुरु शिष्य के संबंध का मूल आधार है ब्रह्मज्ञान और उसकी साधना। शिष्य अपने चिंतन एवं चित्त में अपने गुरुदेव की प्यारी प्यारी छवि को ही बसाता है। स्वामी जी ने कहा, साधना एक ऐसा दिव्य साधन है, जिसके द्वारा ब्रह्मांड के किसी भी रहस्य को जान सकता है। साथ ही गुरुदेव की प्रत्येक लीला मर्म को समझने के लिए ब्रह्मज्ञान और उसकी साधना ही एक मात्र साधन है। साधना के अभाव में शिष्य विकारों एवं संशयों के रोग से ग्रस्त हो जाता है। गुरु सेवा बहुत ही दुर्लभ है। सेवा अहंकार का मर्दन कर गुरु भक्ति की ओर प्रेरित करता है एवं सुसंस्कारों का वर्द्धन करती है। कहा, जिस दिन आप अपने गुरु के चरणों में समर्पित हो जाएंगे, उसी दिन से आपकी प्रगति उन्नति शुरू हो जाएगी।
उन्होंने हृदय की दुर्बलता त्यागने और अन्दर के शत्रुओं यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सरादि से लड़कर उन्हें परास्त-निरस्त कर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। कहा, संवेदना ही मनुष्य के अन्दर की मनुष्यता को जागती है और उसे महानता की ओर ले जाती है। हमें अपने अन्दर की संवेदना जगानी चाहिए। उन्होंने गुरु को भाव संवेदना की मूर्ति बताया और कहा कि गुरु वह कुम्भार है जो शिष्य के व्यक्तित्व को निखारता है और उसे सुगढ़ बनाता है। जैसे सूर्य के गर्मी से तपती भूमि को वर्षा से शीतलता और फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति हासिल करने की ताकत मिलती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि संसार रूपी सागर को पार करने के लिए सद्गुरु की शरण में जाने की आवश्यकता पड़ती है। वैसे भी, भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि ब्रह्मा और शंकर जैसा व्यक्ति भी गुरु के बिना संसार से पार नहीं उतर सकता है। गुरु से मिलने वाली दीक्षा की महिमा भी काफी अधिक है। गुरु के उपदेश का प्रभाव उनके प्रति असीम श्रद्धा व विश्वास रखने से हो पाता है। दीक्षा गुरु आध्यात्मिक गुरु होते हैं।


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