कॉलेजियम मामला: एमओपी तैयार करने से केंद्र का इन्कार - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 19 नवंबर 2015

कॉलेजियम मामला: एमओपी तैयार करने से केंद्र का इन्कार

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नयी दिल्ली 19 नवम्बर, केंद्र सरकार ने उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने से संबंधित मामले में मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) मसौदा तैयार करने से आज इन्कार कर दिया। न्यायमूर्ति जे एस केहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कल केंद्र सरकार के पाले में गेंद डालते हुए दो दशक से अधिक पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के मुद्दे पर सभी सुझावों पर विचार करने के बाद उसे एमओपी का मसौदा तैयार करने का जिम्मा सौंपा था। एटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने संविधान पीठ से कहा कि नियुक्ति प्रणाली में सुधार के लिए कॉलेजियम को देश भर से आये सुझावों पर खुद अंतिम निर्णय करना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि कॉलेजियम प्रणाली के तहत शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश एवं चार वरिष्ठतम सदस्य मिल-बैठकर निर्णय लेते हैं। यह व्यवस्था 1998 में केंद्र सरकार और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के राय मशविरे के बाद शुरू हुई थी और उसके बाद के सभी मुख्य न्यायाधीशों ने इस पर अमल किया। 

उन्होंने कहा कि यदि इस मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ खुद मसौदा प्रक्रिया पर न्यायिक आदेश सुनाती है तो वह मुख्य न्यायाधीश पर बाध्यकारी होगा। केंद्र सरकार ऐसी स्थिति बनने देना नहीं चाहती जिसमें मुख्य न्यायाधीश की भूमिका की अनदेखी हो। एटर्नी जनरल ने कहा कि सरकार या तो मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के साथ कोई मसौदा प्रक्रिया तैयार करेगी या प्रणाली में सुधार की जिम्मेदारी कॉलेजियम पर छोड़ देना चाहेगी। संविधान पीठ ने कल सुनवाई के दौरान मसौदे के लिए श्री रोहतगी को एक व्यापक खाका भी पेश किया था, जिसमें कॉलेजियम की मदद के लिए स्वतंत्र सचिवालय की स्थापना सहित विभिन्न महत्वपूर्ण उपाय शामिल किये जाने थे। हालांकि अदालत कक्ष में बैठे विभिन्न याचिकाकर्ताओं के वकीलों एवं न्यायविदों ने न्यायालय से एटर्नी जनरल की पेशकश को ठुकराने की सलाह दी थी। 

पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम और संविधान विशेषज्ञ राजीव धवन ने श्री रोहतगी की पेशकश का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार के सुझाव का स्वागत है लेकिन कार्यपालिका को मसौदा तैयार करने की भी अनुमति नहीं दी जा सकती। इस पर न्यायमूर्ति केहर ने कहा था कि जब शीर्ष अदालत सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून और तत्संबंधी 99वें संविधान संशोधन को निरस्त कर सकती है तो सरकार के मसौदा उपबंध को हटाने में उसे दिक्कत क्यों होगी? गौरतलब है कि उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने का सरकार का प्रयास हाल में विफल हो गया था। 

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