भारतीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने की जरुरत ; राष्ट्रपति - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 21 नवंबर 2015

भारतीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने की जरुरत ; राष्ट्रपति

need-indian-value-restablished-president
नयी दिल्ली 21 नवम्बर, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज कहा कि भारत शास्त्र (इंडोलॉजी) का अध्ययन भारत और विश्व की चुनाैतियों का सामने करने में प्रासंगिक है और भारतीय मूल्यों को पुन: स्थापित करके इनका समाधान तलाशा जा सकता है। श्री मुखर्जी ने यहां राष्ट्रपति भवन में ‘प्रथम अंतर्राष्ट्रीय भारत शास्त्र विशेषज्ञ सम्मेलन’ का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है आैर इसकी विभिन्न धाराओं में ज्ञान विज्ञान का अथाह भंडार है। दुनिया के हर हिस्से में भारत के लोग भारतीय सभ्यता को लेकर गए हैं और क्षेत्र विशेष में अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि विश्व मौजूदा समय में अभूतपूर्व असहिष्णुता और घृणा का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारत के उच्च मूल्य रास्ता दिखा सकते हैं। भारतीय समाज के लिखे और अनलिखे संस्कार, कर्त्तव्य और जीवन शैली में इनका समाधान तलाशा जा सकता है। इस समय में विविधतापूर्ण भारतीय समाज को एक रखने के मूल्यों को फिर से भारत और पूरी दुनिया में पुन: स्थापित करने देने की जरुरत है। भारत शास्त्र की बढ़ती लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए श्री मुखर्जी ने कहा कि मानव समाज के सभी प्रश्नों का उत्तर भारत शास्त्र में मिल सकता है। भारत का इतिहास लोगों के चिंतन, कर्तव्य, रीति रिवाजों और परंपराओं में जीवित मिलता है और इसी के साथ यह अाधुनिकता का भी समान भाव से स्वागत करता है। 

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर पहला ‘भारत शास्त्री सम्मान’ जर्मनी के प्रो. हेनरिक फ्रेईहर फोन स्टीटेंक्रोन को प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरुप उन्हें 20 हजार डाॅलर और एक प्रशस्ति पत्र दिया। प्रो. स्टीटेंक्रोन टुएबिंगेन विश्वविद्यालय में ‘भारत शास्त्र एवं धर्म इतिहास तुलनात्मक अध्ययन’ विभाग के लगभग 25 वर्ष से अध्यक्ष है। इस अवसर पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी मौजूद थी। यह पुरस्कार उन विदेशी विद्वानों को प्रतिवर्ष प्रदान किया जाएगा जो भारतीय दर्शन, चिंतन, इतिहास, कला, संस्कृति, भारतीय भाषा, साहित्य, सभ्यता और समाज के अध्ययन में अपना योगदान देंगे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन से भारत शास्त्र का अध्ययन मनन करने वाले दुनियाभर के विद्वानों को एक मंच पर आने का मौका मिलेगा। इसका अध्ययन भारत और विश्व की चुनौतियों का सामना करने में सहायक हो सकता है। तीन दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में दुनियाभर के 21 भारत विज्ञान विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा सम्मेलन के दौरान भारत के आठ विद्वान भी भारतीय दर्शन और संस्कृति तथा सभ्यता पर अपने शोध पत्र पेश करेंगे। सम्मेलन में भारत विज्ञान का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अध्ययन, संस्कृत साहित्य- भूत एवं भविष्य, संस्कृत नाटक- सिद्धांत एवं अभ्यास, भारतीय दर्शन चिंतन और भारतीय कला एवं वास्तुकला पर विस्तृत रुप से विचार विमर्श किया जाएगा। सम्मेलन का समापन प्रख्यात विद्वान डा. करण सिंह के उपनिषद पर व्याख्यान से होगा। 

कोई टिप्पणी नहीं: