बिहार : पंछियों की चहचहाहट से गुलजार हुआ सोनपुर,कल से मेले का होगा आगाज - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

रविवार, 22 नवंबर 2015

बिहार : पंछियों की चहचहाहट से गुलजार हुआ सोनपुर,कल से मेले का होगा आगाज

sonepur-mela-starts-from-tomorow
पटना 22 नवम्बर, बिहार की राजधानी पटना से करीब 25 किलाेमीटर दूर सारण जिले के सोनपुर में हरिहर क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगने वाला विश्वविख्यात सोनपुर पशु मेला संभवत:दुनिया में एकमात्र ऐसा मेला है,जहां सूई से लेकर हाथी तक की खरीद-फरोख्त होती है। सोनपुर वैशाली जिले के हाजीपुर शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर लगने वाला सोनुपर पशु मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। यह मेला भले ही पशु मेला के नाम से विख्यात है लेकिन इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सूई से लेकर हाथी तक की खरीदारी की जा सकती है। मॉल कल्चर के वर्तमान दौर में बदलते वक्त के साथ भले ही मेले के स्वरूप और रंग-ढंग में बदलाव आया है लेकिन इसकी सार्थकता आज भी बनी हुई है। इस वर्ष यह मेला 23 नवम्बर से शुरू होगा और 24 दिसम्बर को खत्म होगा। प्रतिवर्ष कार्तिक मास के पूर्णिमा स्नान के साथ यह मेला शुरू हो जाता है जो पूरे एक माह तक चलता है। इस मेेले के ऐतिहासिक महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस मेले में कभी अफगान, ईरान, इराक जैसे देशों के लोग पशुओं की खरीदारी करने आया करते थे। यह भी कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने भी इसी मेले से बैल,घोड़े,हाथी और हथियारों की खरीदारी की थी।देश-विदेश के लोग अब भी इसके आकर्षण से बच नहीं पाते हैं और यहां खिंचे चले आते हैं। 


हरिहर क्षेत्र को ऋषियों और मुनियों ने प्रयाग और गया से भी श्रेष्ठ तीर्थ माना है। ऐसा कहा जाता है कि इस संगम की धारा में स्नान करने से जन्मजन्मांतर के पाप कट जाते हैं। यहाँ हाथी, घोड़े, गाय, बैल,चिड़ियों आदि के अतिरिक्त सभी प्रकार के आधुनिक सामान, कंबल, दरी,नाना प्रकार के खिलौने और लकड़ी के सामान बिकने को आते हैं। इस मेले को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के दो भक्त जय और विजय शापित होकर हाथी (गज) और मगरमच्छ (ग्राह) के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए थे। एक दिन कोनहारा के तट पर जब गज पानी पीने आया था तो ग्राह ने उसे पकड़ लिया था। फिर गज ग्राह से छुटकारा पाने के लिए कई सालों तक लड़ता रहा। तब गज ने बड़े ही मार्मिक भाव से हरि यानी विष्णु को याद किया। गज की प्रार्थना सुनकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन विष्णु भगवान ने उपस्थित होकर सुदर्शन चक्र चलाकर उसे ग्राह से मुक्त किया और गज की जान बचाई। इस मौके पर सारे देवताओं ने यहां उपस्थित होकर जय-जयकार की थी लेकिन आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि गज और ग्राह में कौन विजयी हुआ और कौन हारा। इसी के पास कोनहराघाट में पौराणिक कथा के अनुसार गज और ग्राह का वर्षों चलने वाला युद्ध हुआ था। बाद में भगवान विष्णु की सहायता से गज की विजय हुई थी। 

एक अन्य किंवदंती के अनुसार जय और विजय दो भाई थे। जय शिव के तथा विजय विष्णु के भक्त थे। इन दोनों में झगड़ा हो गया तथा दोनों गज और ग्राह बन गए। बाद में दोनों में मित्रता हो गई वहाँ शिव और विष्णु दोनों के मंदिर साथ- साथ बने जिससे इसका नाम हरिहर क्षेत्र पड़ा। कुछ लोगों के कथनानुसार प्राचीन काल में यहाँ ऋषियों और साधुओं का एक विशाल सम्मेलन हुआ तथा शैव और वैष्णव के बीच गंभीर वाद-विवाद खड़ा हो गया लेकिन बाद में दोनों में सुलह हो गई और शिव तथा विष्णु दोनों की मूर्तियों की एक ही मंदिर में स्थापना की गई,उसी स्मृति में यहाँ कार्तिक में पूर्णिमा के अवसर पर मेला आयोजित किया जाता है। इस स्थान के बारे में कई धर्मशास्त्रों में चर्चा की गई है। हिंदू धर्म के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां स्नान करने से सौ गोदान का फल प्राप्त होता है। कहा तो यह भी जाता है कि कभी भगवान राम भी यहां पधारे थे और बाबा हरिहरनाथ की पूजा-अर्चना की थी। 

कोई टिप्पणी नहीं: