बिहार चुनाव : इस बार भाकपा का सूपड़ा साफ, अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 15 नवंबर 2015

बिहार चुनाव : इस बार भाकपा का सूपड़ा साफ, अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन

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पटना 15 नवंबर, नब्बे के दशक के मध्य तक बिहार विधानसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दमदार मौजूदगी थी और सदन से लेकर सड़क तक भाकपा का प्रभाव दिखता था लेकिन पिछले दो दशकों में भाकपा का आधार लगातार खिसकता चला गया और इस बार सदन में उसका कोई सदस्य नही पहुंच सका । बिहार विधानसभा में चुनाव के लिये इस बार छह वामपंथी दलों ने मिलकर वाम मोर्चा का गठन किया। वाम मोर्चा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(भाकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी : भाकपा (माले), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (एसयूसीआई), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) और फॉरवर्ड ब्लॉक शामिल थी लेकिन इन छह दलों में भाकपा समेत पांच का खाता भी नहीं खुल सका। केवल भाकपा माले को ही तीन सीटों पर कामयाबी मिल सकी। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 1952 के चुनाव के बाद से यह पहली बार है जब भाकपा का कोई सदस्य सदन तक नहीं पहुंचा है ।

वर्ष 2010 के चुनाव में भाकपा के 56 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था लेकिन एक सीट पर ही उसका प्रत्याशी विजयी बना था । बेगूसराय के बछवाड़ा सीट से अवधेश कुमार राय निर्वाचित हुये थे लेकिन इस बार कांग्रेस के प्रत्याशी और पूर्व मंत्री रामदेव राय ने उन्हें पराजित कर दिया । वर्ष 1972 में भाकपा ने 55 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसके 35 प्रत्याशी सदन में पहुंचे थे । इसके साथ ही भाकपा बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल थी लेकिन पिछले दो दशक में बिहार से वाम दलों का जनाधार खिसकता गया और स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि मौजूदा विधानसभा में भाकपा का कोई सदस्य सदन में नही पहुंच सका है । वर्ष 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में भाकपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था । इस वर्ष भाकपा ने 24 प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा लेकिन उसका कोई सदस्य विधानसभा नहीं पहुंच सका था । वर्ष 1956 के विधानसभा उप चुनाव में चंद्रशेखर सिंह बेगूसराय सीट से जीते और विधानसभा में पहली बार वाम का प्रवेश हुआ।उसके बाद तो बेगूसराय जैसे जिले भाकपा के लिए गढ़ ही बन गया और उसे बिहार का लेनिनग्राद कहा जाने लगा।

1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव तक भाकपा ने अपनी स्थिति थोड़ी मजबूत कर ली थी। विधानसभा चुनाव में उसके 60 प्रत्याशियों में से सात प्रत्याशी जीते। वर्ष 1962 के तीसरे चुनाव में भाकपा के टिकट पर 84 प्रत्याशी चुनावी समर मे उतरे और 12 विधायक विधानसभा में पहुंच गये ।वर्ष 1967 के विधानसभा चुनाव में भाकपा के टिकट पर 97 प्रत्याशी उतरे जिसमें से 24 ने सदन में कब्जा जमा लिया । वर्ष 1967 में राजनीतिक परिस्थिति कुछ ऐसी बनी जिसमें मिली जुली सरकार का गठन हुआ जिसमें भाकपा भी शामिल हुई । वर्ष 1969 के मध्यावधि चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। दो विपरीत राजनीतिक धुरी वाले दल जनसंघ और भाकपा के पास विधायकों की संख्या इतनी थी कि वे किसी की सरकार बना सकते थे। इस चुनाव में भाकपा के 162 प्रत्याशी मैदान में उतरे जिसमें से 25 को जीत हासिल हुयी । भाकपा ने मध्यमार्ग अपनाया और भाकपा के समर्थन से दारोगा प्रसाद राय के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार गठित हुई। यह घटना वामपंथी राजनीति के लिए एक नया मोड़ था। इसके बाद तो भाकपा ने कांग्रेस से राजनीतिक रिश्ता बना लिया। वर्ष 1972 के छठे विधानसभा चुनाव में भाकपा ने कांग्रेस से तालमेल कर 55 प्रत्याशी खड़े किये और उसके 35 प्रत्याशी जीत गये। छठे विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भाकपा का प्रदर्शन अब तक का सबसे बेहतर रहा है । 

वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में जब जनता पार्टी की आंधी आई, तब भी 21 सीटों पर भाकपा ने जीत हासिल की। भाकपा के 73 प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे । वर्ष 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में भी भाकपा ने अपनी मजबूत दावेदारी बरकरार रखी। भाकपा ने 135 प्रत्याशियों को चुनावी समर में उतारा जिसमें 23 को सफलता मिली । हालांकि वर्ष 1985 में हुये विधान सभाा चुनाव में भाकपा की सीट सदन में आधी रह गयी । इस चुनाव में भाकपा के टिकट पर 167 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा लेकिन सदन तक महज 12 ही पहुंच सके । वर्ष 1990 के चुनाव में भाकपा को एक बार फिर से शानदार सफलता मिली । भाकपा के टिकट पर 109 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे जिसमें 23 ने सदन में पहुंचने में कामयाब रहे । वर्ष 1995 के विधानसभा में भाकपा के टिकट पर 61 प्रत्याशियों ने भाग्य आजमाया जिसमें 26 निर्वाचित हुये । 

बिहार की राजनीति में 20-25 साल पहले तक भाकपा की धमक सदन से सड़क तक सुनाई देती थी लेकिन हाल के सालों में वामपंथी दलों की उपस्थिति कभी-कभार सड़कों पर तो जरूर नजर आती है, परंतु सदन में भाकपा की उपस्थिति बहुत कम हो गई है। भाकपा की जड़ों पर जोरदार प्रहार मंडलवाद के उभार से हुआ। मंडलवादी राजनीति ने जिन सामाजिक आधारों को जातिगत आधार पर लालू प्रसाद यादव के पक्ष में गोलबंद किया, लगभग वही भाकपा का जनाधार थीं। वर्ष 2000 के चुनाव के बाद से विधानसभा में वामपंथ की संख्या में गिरावट आनी शुरू हुई । 

वर्ष 2000 में भाकपा के टिकट पर 153 उम्मीदवारो ने भाग्य आजमाया लेकिन उनमें से 05 को ही सफलता नसीब हुयी ।फरवरी 2005 और अक्तूबर,2005 के चुनाव में भाकपा के सदस्यों की संख्या तीन -तीन तक सिमट गयी । वर्ष 2010 में भाकपा के टिकट पर 56 प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे लेकिन केवल एक प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल रहा । इस बार के चुनाव में भाकपा का आंकड़ा शून्य पर आ पहुंचा है ।उल्लेखनीय है कि वर्ष 1952 के पहले चुनाव में भाकपा के टिकट पर कोई प्रत्याशी निर्वाचित नही हुआ था ।

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