नयी दिल्ली, 25 दिसंबर, जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने की घटनाओं ने चिकित्सा जगत में हलचल मचा दी है। अब तक यह माना जा रहा था कि चिकित्सकों द्वारा बेवजह ही मरीजों को एंटीबायोटिक्स दिए जाने के कारण इनका प्रभाव खत्म हो रहा है लेकिन अब यह पता चला है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण भी जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं पड़ रहा है। सैवनाह रिवर इकोलॉजी लैबोरेटरी एंड ऑडम स्कूल ऑफ इकोलॉजी के वरिष्ठ शोध पारिस्थितिकीविद् जे. वॉन मैकआर्थर का मानना है कि पर्यावरणीय प्रदूषण जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने का कारण हो सकता है। उन्होंने इस बात का पता लगाने के लिए विभिन्न जल स्रोतों में पाए जाने वाले जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक का परीक्षण किया। श्री मैकआर्थर ने पानी में पाए जाने वाले ई कोलाई जीवाणु की 427 स्ट्रेंस पर पांच एंटीबायोटिक्स की जांच की। उन्होंने 11 जगहों के नौ जल स्रोतों से यह नमूने एकत्रित किए। इसमें गाद के साथ-साथ पानी के नमूने लिए गए। ई कोलाई जीवाणु आम तौर पर व्यक्ति की छोटी आंत में पाया जाता है। शोध में खुलासा हुआ कि 11 नमूनों में से आठ पर एंटीबायोटिक दवाओं का कोई भी असर नहीं पड़ा।
अपर थ्री रन्स क्रीक जल स्रोत में भी जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक्स का जरा सा भी असर नहीं पड़ा। इसका पानी रिहायशी इलाकों, कृषि भूमि और औद्योगिक क्षेत्रों से होकर गुजरता है और जब लोग इसका सेवन करते है तो इसमें पाए जाने वाले जीवाणु शरीर में प्रवेश कर जाते है जो कि संक्रमण का कारण बनते हैंं और फिर इन पर एंटीबायोटिक्स का भी कोई असर नहीं पड़ता। श्री मैकआर्थर ने 23 एंटीबायोटिक के साथ दूसरा परीक्षण किया। इनमें से ज्यादातर एंटीबायोटिक का जीवाणुअों पर कोई असर नहीं पड़ा। इसमें मुख्य तौर पर इस्तेमाल होने वाली गैटीफ्लोक्सासिन और सिप्रोफ्लोक्सासिन नाम की एंटीबायोटिक भी शामिल है। इन एंटीबायोटिक का इस्तेमाल मूत्रमार्ग और साइनस संक्रमण से पिंक आई संक्रमण के इलाज में होता है। इस शोध से यह समझने में काफी मदद मिल सकती है कि जीवाणुओं पर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल क्यों खत्म होता जा रहा है।

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