गुमनामी में गणित के भगवान 'डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह' - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

गुमनामी में गणित के भगवान 'डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह'

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह 
मैंने कई बार लोगों को कहते सुना है. हमारे देश के सारे cream तो विदेश, खासकर अमेरिका भाग जाते हैं, लोग, बात तो सही कहते है. पर मैं उन बच्चों की और से उनके बचाव में बोलती हूँ,तर्क देती हूँ. हमारे देश में उन होनहार बच्चों के लिए सरकार ने क्या सुविधा दी है ?  

यह चित्र महान गणितज्ञ "डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह" की है जिन्हें लोग गणित के भगवन कहते हैं. इस फोटो को देखकर किसी का ह्रदय द्रवित हो जाएगा. जिस बिहार के सपूत ने कभी आइंस्टीन के सिद्धांत  E= MC2(square) को चुनौती दिया था. आज वही गणित के भगवान मानसिक बीमारी "सीजोफ्रेनिया" से ग्रसित हैं और गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं.

2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपूर जिले के बसंतपुर गाँव में जन्मे महान गणितज्ञ "डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह" की प्राइमरी और सेकेंडरी की स्कूली शिक्षा नेतरहाट विद्यालय से हुई. पटना साइंस कॉलेज ने प्रथम वर्ष में ही उन्हें B Sc (Hons) की परीक्षा देने की अनुमति दे दी. 1969 में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, बर्कली से Reproducing Kernels and Operators with a Cyclic Vector विषय पर PhD की उपाधि मिलने के बाद डॉ वशिष्ठ नारायण NASA के  Associate Scientist Professor पद पर  आसीन हुए. 1971 में उनकी शादी हुई परन्तु कुछ ही वर्षों बाद बीमारी की वजह से वे अपनी पत्नी से अलग हो गए. 1972 में भारत वापस आकर IIT कानपुर ,TIFR मुंबई, और ISI कलकत्ता के लेक्चरर बने. 1977 में मानसिक बीमारी "सीजोफ्रेनिया" से ग्रसित हुए जिसके इलाज के लिए उन्हें रांची के कांके मानसिक अस्पताल में भरती होना पड़ा. 1988 ई. में कांके अस्पताल में सही इलाज के आभाव में बिना किसी को बताए कहीं चले गए. 1992 ई. में सिवान,बिहार में दयनीय स्थिति में डॉ वशिष्ठ नारायण को लोगों ने पहचाना. 

उनके स्कूल के विद्यार्थियों ने पटना में ही टेबल कुर्सी, बोर्ड, पुस्तकालय का इंतजाम कर प्रोफेसर के रहने के लायक माहौल का इंतजाम कर दिया है और एक महान गणितज्ञ गुमनामी की जिंदगी जी रहा है. 

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