विशेष : मकर संक्राति: पुत्र की राशि में प्रवेश करते है सूर्य - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 10 जनवरी 2016

विशेष : मकर संक्राति: पुत्र की राशि में प्रवेश करते है सूर्य

चूड़ा, दही, तिलकुट। यानी मकर संक्रांति। भगवान सूर्य का आशीर्वाद पाने का दिन। पवित्र स्नान और दान-पुण्य। ये सूरज की किरणें बरसाती हैं अमृत जिसे पाने के लिए भक्त लगाते हैं गंगा में डुबकी। कहते है इस दिन स्नान-दान करने से दस हजार अश्वमेघ यज्ञ जितना पुण्य फल की प्राप्ति होती है। साथ ही जटिल से जटिल रोगों का निवारण भी होता है। इस बार मकर संक्रांति 14 को नहीं, 15 जनवरी को मनाई जाएगी। प्रस्तुत है सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की ज्योतिषियों से बातचीत पर संकलित एक विस्तृत रिपोर्ट-ज्योतिषियों के मुताबिक इस बार ग्रह-नक्षत्रों की दशा अनुकूल है। इस दिन अगर सूर्य को गंगाजल चढ़ाएं, तो बच्चों का किस्मत उज्ज्वल होगा। भगवान भोलेनाथ देंगे धनवान होने का वरदान और संवार सकते हैं अपने सात जन्म  

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जब सूर्यदेव अपने पुत्र की राशि मकर में प्रवेश करते हैं। जब सूर्य की गति उत्तरायण हो जाती हैं। सूरज की किरणों से होने लगती है अमृत की बरसात, तो उस घड़ी को कहते है मकर संक्रांति। मकर संक्रांति के अवसर पर जितना शुभ गंगा स्‍नान को माना गया है, उतना ही शुभ इस दिन दान को भी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन गंगा, युमना और सरस्वती के संगम, प्रयाग मे सभी देवी देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते है। इस लिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। मकर संक्रांति मे चावल, गुड, उड़द, तिल आदि चीजों को खाने मे शामिल किया जाता है। इस दिन ब्राहमणों को अनाज, वस्त्र, उनी कपड़े आदि दान करने से शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। 

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार सूर्य 14 जनवरी को मध्य रात्रि बाद 1.26 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगा। इस कारण संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। क्योंकि सूर्य के मकर राशि के प्रवेश के बाद भी संक्रमण काल होता है। सूर्योदय से 7 घंटे 21 मिनट के बाद संक्रांति का पुण्यप्रद काल शुरू हो रहा है, जो 15 जनवरी को दिन में 1.45 बजे से है। इसीलिए इस बार संक्रांति 15 तारीख को मनाई जाएगी। इसी दिन से माघ स्नान और प्रयाग में एक माह का कल्पवास आरंभ होगा। 15 तारीख को सूर्योदय काल से ही संक्रांति का स्नान-दान आदि पुण्य कार्य शुरू हो जाएगा। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभ माना गया है और यदि वह स्नान तीर्थ प्रयागराज संगम या गंगासागर में किया जाएं, तो उस स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। इसी महास्नान के लिए लोग लाखो-करोड़ों की संख्या लंबी दूरी तयकर घंटों लाइन में लगकर श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन पुण्यस्नान के लिए पहुंचते है। मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी व कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। 

स्नान का है विशेष महत्व 
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माघ मासे महादेवः यो दास्यति घृत कंबलम्। स भुवत्वा सकलान भोगान अंते मोक्ष् प्राप्ति।। शायद इसीलिए गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम व गंगासागर स्नान का विशेष महत्व भी है। ठंड के बावजूद यहां करोडों आस्थावान डूबकी लगाते है। आस्थावानों का मानना है यहां स्नान से न सिर्फ मोक्ष की प्राप्ति होती है, बल्कि जनम-जनम के सारे कष्ट व पाप दूर हो जाते है। माया मोह से मुक्त माहभर कल्पवास के दौरान यहां जप-तप और यज्ञ-अनुष्ठान करने से मानसिक और आध्यात्मिक संतुष्टि के साथ ही शत्रुओं पर विजय का फल मिलता है। ‘अर्थ न धर्म न काम रुचि, गति न चहुं निर्वाण। जन्म-जन्म सियराम जी पद, यह वरदान दे आज’ अर्थात धर्म व पुण्य के लिए हमेशा भगवान के साथ मन लगा रहे इसलिए कल्पवास के समय एक माह तक यह वरदान मांगा जाता है। प्रतिदिन शांति व सुकून के साथ भगवान का स्मरण करना अद्भुत लगता है। शायद यही वजह है कि कुंभ देश ही नहीं सात समुंदर पार विदेशियों के भी आस्था का केन्द्र रहा है। साधु-संतों की मौजूदगी व उनके प्रवचन उन्हें यहां बरबस ही खींच लाते हैं। अगर आपके लिए यह संभव न हो कि आप गंगा स्नान के लिए इस दिन गंगा तट पर जा सकें तो घर में ही स्नान के लिए जो जल हो उसमें गंगा जल मिलाकर स्नान करते हुए ॐ ह्रीं गंगाय्ये ॐ ह्रीं स्वाहा मंत्र जप करें तो घर में ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। प्रयाग में अगला महाकुंभ मेला 2025 में लगेगा। 

‘माघ मकर रवि गति जब होई, तीरथ पतीह आज सब कोई’ ‘माघ मकर रवि गति जब होई, तीरथ पतीह आज सब कोई’ अर्थात माघ माह में मकर राशि पर भगवान सूर्य आ जाते हैं और तीर्थों के राजा प्रयाग के संगमत तट पर कल्पवास शुरू हो जाता है। कल्पवास का अपना अलग ही आध्यात्मिक महत्व होता है। बड़े-बड़े साधु व महात्माओं का प्रवचन सुनने को मिलता है। जहां पर धर्म की एक अलग ही दुनिया बसती है। इसी वजह से अनादि काल से प्रयाग ऋषियों व महात्माओं की तपोस्थली रही है। गंगा को स्वर्ग की नदी माना जाता है। यह पृथ्वी पर भगीरथ के तप से आयी और सगर के पुत्रों का उद्धार करते हुए सागर में मिल गयी। जिस दिन गंगा सागर में मिली थी वह मकर संक्रान्ति का दिन था। इसलिए मकर संक्रान्ति के दिन गंगा स्नान का पुण्य कई गुणा बताया गया है। ज्योतिषियों की मानें तो सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छः-छः माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहां पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अतः मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। 

विभिन्न प्रांतों में है अलग-अलग मान्यताएं 
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मकर संक्रांति उन गिने-चुने अवसरों में से एक है, जब पूरे देश में एक साथ पर्व-त्योहार अलग-अलग नाम से मनाएं जाते है। बिहार, झारखंड, बंगाल में संक्रांति, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी, पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहू तो दक्षिण भारत में पोंगल की धूम रहती है। झारखंड के कई इलाकों में टुसु व सोहराय पर्व का उत्साह चरम पर होता है। हमारा देश कृषि प्रधान रहा है। फसलों के पकने पर होली व दीवाली मनाएं जाते है, वहीं मकर संक्रांति के अवसर पर रबी की फसल को लहलहाता देख लोग उत्सवमय हो जाते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ मकर संक्रांति का भी लोक पक्ष भी बहुत सशक्त हैं। खास बात यह है कि मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य उत्तरायण होना प्रारम्भ होता है। सूर्य लगभग 30 दिन एक राशि में रहता है। 16 जुलाई को कर्क राशि में आकर सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि में छह माह रहता है। इस अवस्था को दक्षिणायन कहते है। इस काल में सूर्य कुछ निस्तेज तथा चंद्रमा प्रभावशाली रहता है तथा औषधियों व अन्न की उत्तपत्ति में सहायक रहता है। 15 जनवरी को मकर राशि में आकर कुंभ, मीन, मेघ, वृष और मिथुन में छह माह रहता है। यह अवस्था उत्तरायण कहलाती है। इस काल में सूर्य की रश्मियां तेज हो जाती है, जो रबी की फसल को पकाने में सहायक करती है। उत्तरायणकाल में सूर्य के तेज से जलाशयों, नदियों व समुद्रों का जल वाष्परुप में अंतरीक्ष में चला जाता है और दक्षिणायनकाल में यही वाष्प-कण पुनः वर्षा के रुप में धरती पर बरसते है। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। मकर संक्रांति मनाए जाने का यह क्रम हर दो साल के अन्तराल में बदलता रहेगा। लीप ईयर वर्ष आने के कारण मकर संक्रांति 2017 व 2018 में वापस 14 जनवरी को साल 2019 व 2020 में 15 जनवरी को मनाई जाएगी। यह क्रम 2030 तक चलेगा। इसके बाद तीन साल 15 जनवरी को एक साल 14 जनवरी को संक्रांति मनाई जाएगी। 

सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एकबार   
पूरे वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रांति के दिन ही गंगासागर में पुण्य महास्नान की परंपरा है। संभवतः इसीलिए कहा जाता है सारे तीर्थ बार-बार गंगा सागर एक बार। इस दिन गंगासागर महातीर्थ स्थल में बदल जाता है। देश के कोने-कोने से विभिन्न परंपराओं, भाषाओं, संस्कारों व संप्रदायों के लोग गंगासागर पहुंचते हैं। इनमें बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश के श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश के सुदूर पश्चिम में स्थित राजस्थान व गुजरात के लोग भी शामिल होते है। झुंड में चल रहे गृहस्थों के अलग विभिन्न परंपराओं व संप्रदायों के साधु-संयासियों का जत्था भी होता है। इसमें मोबाइल बाबा, होंडा बाबा, लक्खड़ बाबा से लेकर नागा बाबाओं का झुंड शामिल होता है, जिनके अलग-अलग अनुशासन व पंत होते है, लेकिन विविध-विविध स्वरुप, रंग-रुप, भाषा और विश्वास के बावजूद सभी का एक ही उद्देश्य होता है, वह है पतित पावनी गंगासागर में मिलनस्थल का संगमस्थल मोक्षदायिनी गंगासागर में स्नान करना। गंगासागर प्राचीन काल से ही कपिलमुनि के साधनास्थल के रुप में विख्यात है। कपिलमुनि आश्रम एवं गंगासागर तीर्थस्थल को सन्यासियों एवं धार्मिक आस्था के लोगों के लिए महापीठ माना गया है। इस स्थल पर ही राजा सागर के 60 हजार पुत्र भस्मिभूत हुए थे। बाद में राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या की। उन्हीं की तपस्या से प्रसंन होकर मां गंगा उनके पीछे-पीछे धरती पर अवतरित हुई। मां गंगा के निर्मल जल से ही सागर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई। शास्त्रों में उल्लेख है कि गंगा देवी चर्तुदश भुवन को पवित्र कर सकती है। गंगा सभी तीर्थो की जननी है। सभी तीर्थ स्नान और तीर्थस्थल भ्रमण से जो पुण्य लाभ प्राप्त होता है वह सभी लाभ एकमात्र गंगासागर स्नान से ही प्राप्त इहो जाता है। गंगासागर द्वीप का प्रमुख आकर्षण महर्षि कपिलमुनि का मंदिर है। हालांक कपिलमुनि के आश्रम का जिक्र विभिन्न ऐतिहासिक व पौराणिक ग्रंथों में मिलता है लेकिन 197 में समुद्र से एक किमी दूर मंदिर के सेवायत श्रीमद पंच रामानंदी निर्वाणी अखाड़ा, हनुमानगढ़ी अयोध्या के महंतों द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया गया है। मंदिर में 6 शिलाओं पर 6 मूर्तियां है। ये मूर्तियां लक्ष्मी, घोड़े को पकड़े राजा इंद्र, गंगा, कपिलमुनि, राजा सागर और हनुमान जी की है। 

कल्पवास में होती है अमृत की प्राप्ति 
कल्पवास का अर्थ होता है संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। संगम में कल्पवास का अत्यधिक महत्व माना गया है। कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है। कल्पवास के दौरान एक समय भोजन और तीन बार स्नान, गंगा में नहाना, गंगा जल पीना, उसी में बना भोजन करना और गंगा की ही पूजा करने का प्राविधान है। एक माह तक चलने वाली यह कठिन तपस्या है। पौष पूर्णिमा स्नान पर्व में हिस्सा लेने के लिए स्नानार्थियों की भीड़ संगम पर लगातार पहुंच रही है। कल्पवास करने के लिए अब देश दुनिया से कटे रहना, रेत में पुआल के बिछौने पर ही सोना जरूरी नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ में विदेशी श्रद्धालुओं और भारतीय धनाढ्य वर्ग का भी आना होता है। संगम तीरे बने खास तरह की अनुकृतियों को यहां आने वाले श्रद्धालु काफी पंसद करते है। इलाहाबाद की कुंभ नगरी दिन में जितनी खूबसूरत लगती है रात में उतनी ही रंगीन लगती है। इस कुंभ नगरी के रात के नजारे को देख कर ऐसा लगता है मानो करोड़ों सितारे ब्रह्मांड से उतर कर धरती पर आ गए हों। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए श्रृद्धालु दिन से ज्यादा रात में संगम आते हैं। संगम नगरी में हर साल की तरह इस बार भी एक नया शहर बसाया गया है। इलाहाबाद में गंगा यमुना और सरस्वती के संगम पर स्थित हैं। चूकि यहां तीन नदियां आकर मिलती हैं। अतः इस स्थान को त्रिवेणी के नाम से भी संबोधित किया जाता हैं। संगम का दृश्य अत्यन्त मनोरम हैं। स्वेत गंगा और हरित यमुना अपने मिलने के स्थान पर स्पष्ट भेद बनाए रखती हैं अर्थात मात्र द्रिष्टिपात करने से ही यह बताया जा सकता हैं कि यह गंगा नदी हैं और यह यमुना। हिमालय की गोद से निकल कर प्रयाग तक आते आते गंगा गुम्फिद नदी मे बदल जाती हैं परन्तु यमुना के मिलने के उपरान्त इनमे पुनः अथाह जल हो जाता हैं। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश मिला था जिसे पाने के लिये देवताओं और राक्षसों में महायुद्ध हुआ। इस महासंग्राम में ही अमृत कलश की कुछ बूंदे प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक में गिरी। उसके बाद से ही इन स्थानों पर हर पांच या छह साल बाद कुंभ मेला होता है। चूंकि प्रयाग, इलाहाबाद में कलश से ज्यादा बूंदें गिरी थीं इसलिये हर बारह साल बाद यहां महाकुंभ लगता है। 

निरीली है महाकुंभ की महिमा 
कुंभ का इतिहास हालांकि हजारों साल पुराना है लेकिन यह कब शुरू हुआ इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। ईसा पूर्व 629 से 645 तक भारत में रहे चीनी यात्री ह्वेन सांग ने अपने यात्रा वर्णन में प्रयाग में हर पांच साल बाद लोगों के जुटने तथा गंगा में स्नान करने का जिक्र किया है। इतिहासकारों का मानना है कि कुंभ की शुरूआत राजा हर्षवर्धन के कार्यकाल में हुई जबकि कुछ लोग मानते हैं कि इसे आदि शंकराचार्य ने शुरू कराया। कुंभ में तीन शाही स्नान तथा कुल छह मुख्य स्नान होते है। शाही स्नान 15 जनवरी मकर संक्रांति, 10 फरवरी मौनी अमावस्या तथा 12 फरवरी वसंत पंचमी के दिन होंगे। इसके अलावा पौष पूर्णिमा 27 जनवरी, माघ पूर्णिमा 25 फरवरी तथा 07 मार्च महाशिवरात्रि के दिन मुख्य स्नान पर्व हैं। कहते है अमृत की खींचा-तानी के समय चन्द्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरू ने कलश को छुपा कर रखा। सूर्य देव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इन्द्र के कोप से रक्षा की। इसलिए जब इन ग्रहों का संयोग एक राशि में होता है तब कुंभ का अयोजन होता है। क्योंकि इन चार ग्रहों के सहयोग से अमृत की रक्षा हुई थी। गुरू एक राशि लगभग एक वर्ष रहता है। इस तरह बारह राशि में भ्रमण करते हुए उसे 12 वर्ष का समय लगता है। इसलिए हर बारह साल बाद फिर उसी स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है। लेकिन कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन होता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुंभ का विशेष महत्व है। हर 144 वर्ष बाद यहां महाकुंभ का आयोजन होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है। तीर्थराज प्रयाग का उल्लेख भारत के धार्मिक ग्रन्थों वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में भी मिलता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहां संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए प्रयाग का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। इस तिथि का एक अन्य रूप में भी महत्व बढ जाता है क्योंकि इस तिथि को खरमास समाप्त होता है और शुभ मास शुरू होता है। 

पितरों का श्राद्ध और तिल का है महत्व 
मकर संक्रान्ति के दिन पितरों की मुक्ति के लिए तिल से श्राद्ध करना चाहिए। वैसे भी मकर संक्रांति के अवसर पर तिल से सूर्य की पूजा के संदर्भ में श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में उल्लेख है। पुत्र शनि एवं अपनी दुसरी पत्नी छाया के श्राप के कारण सूर्य भगवान को कुष्ठ रोग हो गया, किन्तु यमराज के प्रयत्न से कुष्ठ रोग समाप्त हो गया, लेकिन सूर्यदेव ने क्रोधित होकर शनि के घर कुंभ राशि को जलाकर राख कर दिया। इससे शनि और उनकी माता को कष्ट का सामना करना पड़ रहा था। यमदेव ने अपनी सौतेली माता और भाई शनि के कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया, तब जाकर सूर्यदेव शनि के घर कुभ में पहुंचे। वहां सबकुछ जला हुआ था। शनिदेव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए उन्होंने सूर्यदेव की काले तिल से पूजा की। इससे प्रसंन होकर सूर्यदेव ने आर्शीवाद दिया कि शनि का दुसरा घर मकर राशि मेरे आने पर धन्य-धान्य से भर जायेगा। तिल के कारण ही शनिदेव को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था इसलिए शनिदेव को तिल प्रिय है। इसी समय से मकर संक्रांति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का विधान है। शिव रहस्य, ब्रह्मपुराण, पद्म पुराण आदि में भी मकर संक्रांति पर तिल दान करने पर जोर दिया गया है। शनि को खुश करने के लिए काली उड़द की दाल भी दान व खायी भी जाती है। एक मान्यता यह भी है कि इस तिथि को ही स्वर्ग से गंगा की अमृत धारा धरती पर उतरी थी। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं और इस तिथि को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। वैसे भी इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि संक्रांति के दिन उड़द की खिचड़ी व तिल खाने का खास महत्व है। इस दिन से सूर्य की रश्मियां तीब्र होने लगती है जो शरीर में पाचक अग्नि उद्दीप्त करती है। उड़द की दाल व दही के रुप में प्रोटीन और चूड़ा व चावल के रुप में कार्बोहाइडेट जैसे पोषक तत्वों को अवशोषित करने के लिए यह समय अनुकूल होता है। गुड़ रक्तशोधन का कार्य करता है तथा तिल, मूगफली शरीर में वसा की आपूर्ति करता है।  

लेटे हनुमान 
संगम के निकट स्थित बड़े हनुमान जी का एक अद्भुत एवं अपने प्रकार का अनोखा मन्दिर हैं। इस मन्दिर मे हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा हैं। और उनके दर्शनार्थ लोगों को सीढियों से उतर कर नीचे जाना पडता हैं। यह प्रतिमा अत्यन्त विशाल एवं भव्य हैं। ऐसा विश्वास किया जाता हैं कि अंग्रजी शासन ने इस मंदिर को यहाँ से हटवाने के आदेश दिये किन्तु जैसे जैसे मूर्ति को हटाने के लिये खुदाई की जाने लगी वैसे वैसे मुर्ति बाहर आने के बजाय अन्दर धसती गयी। यही कारण हैं कि यह मंदिर गड्ढे में हैं। गंगा के तट पर स्थित शिव मंदिर भी एक आधुनिक मन्दिर हैं। यह मन्दिर चार मंजिलों का हैं। इस मन्दिर की कुल ऊँचाई लगभग 40 मीटर अर्थात 130 फिट हैं। इसकी प्रत्येक मंजिल पर अलग अलग देवताओं का वास स्थान हैं। 

सरस्वती कूप 
गंगा तट पर स्थित सरस्वती कूप भी है, जो किले के भीतर स्थित है। इस पवित्र कूप के विषय में विश्वास किया जाता हैं कि यही अद्रश्य सरस्वती नदी का स्त्रोत हैं। जबकि गंगा पार स्थित झूँसी मे समुद्र कूप है। यह कूप उल्टा किला के अन्दर स्थित है। यह बहूत उचे टिले पर है। माना जाता है कि इस कूप मे समुद्र का स्रोत है। इस कूप का पानी खारा हैं। वैसे भी महाकुंभ विश्व के सबसे विशालतम धार्मिक जमावड़े में से एक है और यह ‘पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला है’। 



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(सुरेश गांधी)

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