नयी दिल्ली, 06 मार्च, अप्रैल और मई में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव देश के दोनों प्रमुख दलों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के लिये बहुत अहम हैं और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से जहां किसी बड़ी जीत के लिये तरस रही है वहीं पिछले वर्ष दिल्ली और बिहार में मिली हार के बाद भाजपा को भी इन चुनावों में अच्छी सफलता की दरकार है। इन दोनों राज्यों में भाजपा की हार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की चमक धूमिल पड़ती नजर आने लगी है। जनता दल(यू) और राष्ट्रीय जनता दल के महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ने से बिहार में मिली सफलता ने कांग्रेस के लिये संजीवनी का काम किया है।
‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के भाजपा के नारे को पंचर करने के लिये उसका पांच राज्यों के चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन जरुरी है। अच्छा प्रदर्शन इसलिये भी जरुरी है क्योंकि पांच में दो असम और केरल में उसकी सरकार है। असम में तो पिछले पंद्रह वर्ष से वह सत्ता में है। भाजपा का पांच राज्यों में से सबसे अधिक जोर असम पर है जहां वह कांग्रेस के 15 वर्ष के शासन से उपजने वाली सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर सरकार बनाने का सपना देख रही है और इसके लिये उसने पहले से ही तैयारी शुरु कर दी है । अपनी रणनीति में बदलाव करते हुये उसने श्री सर्वानंद सोनोवाल को चुनाव की घोषणा होने से पहले ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। इसके अलावा उसने असम गण परिषद तथा तीन अन्य छोटे दलाें के साथ चुनावी गठबंधन किया है।

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