ढाका, 07 अप्रैल, भारतीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कृषि और किसानों की बेहतरी के लिए दक्षिण एशियाई देशों से मिलकर काम करने का आह्वान करते हुए आज कहा कि इस क्षेत्र में किसान आर्थिक असमानता और अस्थिरता से जूझ रहा है और सबको मिलकर इसका समाधान खोजने की जरूरत है। श्री सिंह ने यहां दक्षेस देशों के कृषि मंत्रियों की तीसरी बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि को आर्थिक एवं सामाजिक विकास का प्रमुख वाहक बनाने में दक्षिण एशिया के देशों की सरकारों की बेहद रुचि है और इस सम्मेलन में कृषि मंत्रियों की उपस्थिति उनकी इस राजनैतिक इच्छाशक्ति को दर्शाती है। भारत की हरित क्रांति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में इसकी वजह से खाद्य उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी लेकिन अब भी कृषि क्षेत्र में अनेक चुनौतियां मौजूद हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी, खरपतवार, रोग और कीटों की संख्या में बढ़ोतरी, मिट्टी में लवण और सोडियम की बढ़ती मात्रा, भूजल स्तर में कमी और जल भराव जैसी समस्यायें कृषि के विकास में बाधक हैं।
इन समस्याओं से न केवल स्थानीय रूप से कृषि प्रभावित होती है बल्कि इनका व्यापक प्रभाव भी होता है। कृषि मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन आज की वास्तविकता है और दक्षिण एशिया में कुछ मामलों में इससे भारी नुकसान की आशंका है। दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति विश्व के सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। फसलों और पशुओं को प्रभावित करने वाले कीटों तथा रोगों की गतिशीलता का पता लगाने और इसके निदान के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है। श्री सिंह ने कहा कि दक्षेस देशों में समृद्ध जैव विविधता है। भारत जैव विविधता के 12 मेगा केन्द्रों में से एक है और उत्तर पूर्वी राज्यों में आर्किड की लगभग 700 प्रजातियां हैं जो स्थानीय हैं। इनके व्यावसायिक उपयोग की काफी संभावना है। उन्होंने कहा कि किसानों को नई कृषि तकनीक, उत्पाद, कार्यविधि और संबंधित सेवाओं की पूरी जानकारी देने के लिए एक बेहतर सूचना नेटवर्क विकसित करना जरूरी है ताकि निकट भविष्य में पर्यावरण के अनुकूल खेतीबाड़ी को नियंत्रित करने के लिए किसानों को समर्थ बनाया जा सके।

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