नयी दिल्ली, 26 जुलाई पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने धर्म में करुणा के तत्व की प्रधानता स्थापित करने पर बल देते हुए आज कहा कि ऐसा करके ही एक दूसरे की निंदा से बचा जा सकता है और सामाजिक समरसता कायम की जा सकती है। श्री आडवाणी ने यहां जैन, बौद्ध, सिख एवं हिन्दु धर्म में करुणा के भाव की व्याख्या को लेकर प्रकाशित श्री वेद प्रकाश नंदा की पुस्तक ‘चार धार्मिक परंपरायें’ के विमोचन अवसर पर यह बात कहीं। इस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत आमंत्रित थे।
कार्यक्रम का आयोजन प्रभात प्रकाशन ने किया था। श्री आडवाणी ने कहा कि भारत की भूमि पर फली फूली इन चारों धर्म परंपराओं में एक ही प्रकार के भावों पर बल दिया गया है। दूसरों पर दया एवं करुणा का भाव सभी में समान है। करुणा का भाव होने से एक धर्म की परंपरा को मानने वाले दूसरे धर्म की परंपरा को भी अपना मानते हैं। इससे विभिन्न धार्मिक परंपराओं के मानने वालों में परस्पर सद्भाव कायम रहता है। श्री भागवत ने कहा कि धर्म के चार घटक होते हैं- सत्य, तप, पवित्रता और करुणा। करुणा एवं संवेदना के बिना धर्म टिक नहीं सकता। अपने दुख की परवाह किये बिना दूसरे की तकलीफ को दूर करने का प्रयास नहीं है तो धर्म नहीं होता है। सत्य की कठोरता को करुणा की छन्नी से उतारना पड़ता है। उन्होंने धर्म में करुणा के तत्व को अनिवार्य बताते हुए आज कहा कि कि करुणाविहीन धर्म के कारण ही दुनिया भर में अतिवाद और स्वार्थ का तांडव मचा है।
उन्होंने कहा कि बिना करुणा के धर्म से अन्याय एवं असंतोष पनपता है। अतिवाद को दुनिया झेल ही रही है। उन्होंने कहा कि करुणा नहीं होगी तो एक दूसरे पर अतिवाद और स्वार्थ के तांडव को ठीक नहीं किया जा सकेगा। उन्होेंने कहा कि लोगों को इस बात का पहले आचरण और फिर समाज में चर्चा करके सर्वत्र एक सकारात्मक माहौल बनाना चाहिये।

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