मोदी राज में बर्बर ताकतों के खिलाफ फूट पड़ा है जबरदस्त प्रतिरोध आंदोलन : दीपंकर - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

मोदी राज में बर्बर ताकतों के खिलाफ फूट पड़ा है जबरदस्त प्रतिरोध आंदोलन : दीपंकर

  • भाकपा-माले के राज्यस्तरीय पंचायत प्रतिनिधि कन्वेंशन में जुटे पंचायत प्रतिनिधि.
  • पंचायतों को जनसंघर्ष का केंद्र बनाने सहित 9 सूत्री राजनीतिक प्रस्तावों के आह्वान के  साथ समाप्त हुआ कन्वेंशन.

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पटना 26 जुलाई 2016, भाजपा शासन में समाज की बर्बर ताकतें यह समझ रही हैं कि उनका राज आ गया है और वे पूरे देश में दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, छात्र-नौजवानों और मजदूर-किसानों पर बर्बर हमले कर रही हैं. लेकिन आज महत्पूर्ण बात यह है कि इन हमलों के खिलाफ प्रतिरोध-आंदोलन की ताकतें बड़ी मजबूती के साथ एकताबद्ध होकर संघर्ष के मैदान में आ रही हैं. रोहित वेमुला से लेकर जेएनयू, कश्मीर और अब गुजरात हर जगह भाजपा का दांव उलटा पड़ता जा रहा है. गुजरात के दलितों ने अपने जबरदस्त आंदोलन के बल पर भाजपा के मनुवादी चेहरे को बेनकाब कर दिया है. ‘गो-रक्षा’ के नाम पर सांप्रदायिक दंगा-फसाद करने की भाजपाई साजिश को बेनकाब कर दिया है. उक्त बातें माले महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने आज पटना में पार्टी की बिहार राज्य कमिटी की ओर से आयोजित पंचायत प्रतिनिधि कन्वेंशन को संबोधित करते हुए कही. उन्होंने कहा कि दलितों पर गुजरात से लेकर बिहार तक जारी अमानवीय दमन अलग-थलग घटनायें मात्र नहीं है, बल्कि वह दलितों के प्रति भाजपा की मानसिकता को जाहिर कर रही है. जो भाजपा गुजरात माॅडल का दंभ भरती थी, उसकी हकीकत पूरी दुनिया के सामने आ गयी है. यह सच सामने आ गया है कि वहां दलितों के साथ किस प्रकार अत्याचार किया जाता रहा है. दरअसल भाजपा को इस देश में न तो अल्पसंख्यक पसंद हैं, न दलित और न ही महिलायें. मायावती के बारे में दिया गया उनकी पार्टी नेता का बयान भी घोर महिला विरोधी है. बिहार के मुजफ्फरपुर में दलित युवक को पेशाब पिलाने की अमानवीय घटना के पीछे भी भाजपा के स्थानीय विधायक का संरक्षण है. ये सारी चीजें साबित करती हैं कि भाजपा एक नंबर की दलित-अल्प्संख्यक व महिला विरोधी पार्टी है, जो इस देश में भगवा राष्ट्रवाद थोपना चाहती है. वह ‘हिंदुत्व’ के नाम पर चाहती है कि जाति व्यवस्था बरकरार रहे. गाय का चमड़ी उतारने का काम दलित करते रहे. लेकिन यह बेहद स्वागत योग्य है कि गुंजरात के दलितों ने भाजपा जैसी ताकतों को सबक सिखाया है और उन्होंने पुरानी अमानवीय परंपराओं का ढोने से इंकार कर दिया है. 

उन्होंने कहा कि बिहार में भी दलित उत्पीड़न की घटनायें लगातार बढ़ रही हैं. जदयू-राजद-भाजपा से जुड़े जनप्रतिनिधि बलात्कारी मानसिकता को जाहिर कर रहे हैं. यदि एक तरफ राजद विधायक राजवल्लभ यादव बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हैं, तो दूसरी ओर भाजपा एमएलसी बच्ची के साथ बलात्कार की कोशिश के आरोप में जेल में है. जदयू की पूर्व विधायक उषा सिन्हा टाॅपर घोटाले में जेल में है. इन पार्टियों के जनप्रतिनिधयों का यही चेहरा है. कुछ चेहरे उजागर हुए हैं, बाकि पर्दे के पीछे हैं. उन्होंने आगे कहा कि नीतीश सरकार का सात निश्चय छलावा के अलावा कुछ नहीं है. इस सात निश्चय में न तो शिक्षा सुधार का सवाल है, न भूमि सुधार का और न ही सामाजिक न्याय का. पटना आटर््स काॅलेज मामले में यह साफ तौर दिखा कि छात्र आंदोलन के दमन के मामले में यह सरकार कहीं से पीछे नहीं है. ये पार्टियां चाहती हैं कि पंचायतों को लूट व भ्रष्टाचार का केंद्र बना दिया जाए. पंचायतों को उनके वास्तविक अधिकारों से काटकर इनकी चाल है कि उसे केवल सरकार के कार्यक्रमांे को लागू करने वाली एजेंसी बना दी जाए. लेकिन इसके विपरीत भाकपा-माले ने तय किया है कि विधानसभा से लेकर पंचायतों तक पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधि जनता की आवाज बुलंद करेंगे, पंचायतों के अधिकार, पंचायत प्रतिनिधियों के मान-सम्मान के लिए लड़ेंगे और रामनरेश राम-महेंद्र सिंह व शाह चांद की विरासत को बुलंद करेंगे. हमारी पार्टी के जनप्रतिनिधि जनता की उम्मीदों के प्रतिनिधि बनेंगे. कन्वेंशन को संबोधित करते हुए माले राज्य सचिव ने कहा कि जनता के मुद्दों पर पंचायतों पर हमें लगातार दबाव बनाये रखना चाहिए और पंचायतों को सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष के बतौर विकसित करने पर जोर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि भाजपा में एक दयाशंकर सिंह अथवा टुन्ना पांडे नहीं है, बल्कि भाजपा-आरएसएस ऐसी मानसिकता तैयार करने वाले ही संगठन हैं. यह मानसिकता समाज के लिए बेहत खतरनाक है. भाकपा-माले इसकी कटु भत्र्सना करती है और ऐसी ताकतों पर सख्त कार्रवाई की मांग करती है.

अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव काॅ. राजाराम सिंह ने कन्वेंशन को संबोधित करते हुए कहा कि ग्राम पंचायतों को पूर्ण अधिकार मिलने चाहिए. पंचायतों को संविधान ने 29 अधिकार दे रखे हैं. लेकिन इन अधिकारों से पंचायतें पूरी तरह वंचित हैं. इसके खिलाफ जबरदस्त आंदोलन की जरूरत है.  भाजपा-आरएसएस की सामंती-पितृवादी और मनुवादी सोच को मिल-जुलकर एक बार फिर से करारा जवाब देने की जरूरत है.कन्वेंशन को माले विधायक सुदामा प्रसाद, ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी, सहार के प्रखंड प्रमुख मदन सिंह, सिवान से जिला परिषद सदस्य सोहिला गुप्ता, पटना के बेहरावां से मुखिया जयप्रकाश पासवान और जहानाबाद के बंधुगंज के मुखिया प्रदीप कुमार ने संबोधित किया. इसके पूर्व कन्वेंशन के राजनीतिक उद्देश्यों को रखते हुए पोलित ब्यूरो सदस्य काॅ. धीरेन्द्र झा ने कहा कि हमारा यह पंचायत प्रतिनिधि कन्वेंशन ‘पंचायतों को जनसंघर्षों का केंद्र बनाओ’ के प्रमुख नारे के साथ हो रहा है. विदित हो कि एक मात्र भाकपा-माले ने पंचायत चुनाव को दलीय आधार पर करवाने की मांग की थी. लेकिन बाकि पार्टियां दलीय आधार पर चुनाव करवाने की मांग से कन्नी काटते रही है. कन्वेंशन में माले के केंद्रीय कमिटी सदस्य, राज्य स्थायी समिति सदस्य के अलावा पंचायत प्रतिनिधि शामिल हुए.

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