नयी दिल्ली 27 जुलाई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि मामले में निचली द्वारा अपनायी गयी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए आज पूछा कि आखिर इस मामले की जांच के लिए पुलिस को क्यों भेजा गया।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने महाराष्ट्र में दर्ज मानहानि के मुकदमे को निरस्त कराने संबंधी श्री गांधी की याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि जब यह तय है कि मानहानि के मामलों में पुलिस की कोई भूमिका नहीं है तो मजिस्ट्रेट ने पुलिस को जांच के लिए क्यों भेजा? शीर्ष अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को खुद शिकायतकर्त्ता राजेश महादेव कुंटे की ओर से मुहैया कराये गये सबूतों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए था। शिकायत को जांच के लिए पुलिस के पास नहीं भेजना चाहिए था, क्योंकि आपराधिक मानहानि से जुड़े मामले में पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती। पीठ ने कहा कि हाल ही में उसने भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के मामले में भी यह बात साफ की है। दंड विधान संहिता (सीआरपीसी) की धाराओं 499 और 500 से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया को विस्तृत तौर पर समझाया जा चुका है।
गौरतलब है कि श्री गांधी ने कथित तौर पर महाराष्ट्र के भिवंडी में एक सभा को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था, जिसके खिलाफ कुंटे ने आपराधिक मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। मजिस्ट्रेट ने इस मामले को जांच के लिए पुलिस को भेज दिया था और उसकी रिपोर्ट के आधार पर श्री गांधी के खिलाफ समन जारी किया गया था। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने समन आदेश को चुनौती दी है। इससे पहले महाराष्ट्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के पेश होने पर श्री गांधी के वकील कपिल सिब्बल नाराज हो गये। उन्होंने कहा कि एक निजी शिकायत से महाराष्ट्र सरकार का क्या लेना-देना है? मामले की अगली सुनवाई 23 अगस्त को होगी।

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