बाल मन और कई सवाल...कि डायन क्या होती है, कैसी होती है...आदि आदि। क्योंकि कई दफे बच्चों का सवाल होता है कि ये डायन आखिर कहां रहती है...तो जवाब देना लाजिमी है। गर नहीं दिया गया तो वो सवालों के साथ उनके मन में अंधविश्वास बनकर जीवित रह जाएगी। डर का एक कारण भी बनेगी, और जादू-टोने पर यकीन करने की एक वजह भी। जी हां विषय ''डायन'' या कह लीजिए टोना-टोटका..झारखंड में इसके नाम पर होने वाली प्रताड़नाओं के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकारी स्कूलों में इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
ड्राफ्ट तैयार, विषय को किया जा रहा पढाई में शामिल
इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने के पीछे एक बड़ी वजह है, स्कूली शिक्षा और साक्षरता सचिव आराधना पटनायक के मुताबिक इससे सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि बच्चे अपने बड़े बूढ़ों जो कि निरक्षर हैं, जो इन बेफजूल की बातों को काफी अहमियत देते हैं उन्हें इसके बारे में बता पाएंगे, समझा पाएंगे। साथ ही वे भी इस विषय में जागरूक हो सकेंगे। जिससे अंधविश्वास को और बढ़ावा नहीं मिलेगा। प्राप्त जानकारी के मुताबिक छठवीं से आठवीं तक के बच्चों की पढ़ाई में इस विषय को शामिल किया जा रहा है। और इसका ड्राफ्ट भी तैयार है।
....क्योंकि मौतों का सिलसिला जारी है
अंधविश्वास के नाम पर झारखंड में प्रताड़ना का दौर लगातार जारी है। झारखंड हाइकोर्ट ने इन मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की है। सितंबर 2015 से इस साल के मई तक नौ महीनों में जादू-टोना और डायन के नाम पर प्रताड़ना के 524 मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि 35 लोगों की हत्या कर दी गई है। साढ़े पांच साल के दौरान इन आरोपों में प्रताड़ना के करीब 3,300 मामले दर्ज हुए हैं...जिसका सीधा निशाना आदिवासी परिवारों के लोग बने हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि पिछले साल आठ अगस्त को मांडर थाना के कंजिया गांव में डायन के शक में ही पांच आदिवासी महिलाओं की हत्या कर दी गई थी।
लोगों के भिन्न भिन्न मत
हालांकि इस मामले में कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अंधविश्वास और प्रताड़ना के मामले में तुरंत कार्यवाही की जाए तभी बदलाव संभव हैं। लेकिन इसके परिणाम को एक लंबे आंकलन के बाद, बड़ी मियाद में किए गए प्रयोगों के उपरांत ही समझा जा सकता है।

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