प्रद्योत कुमार,बेगूसराय। विगत १०-११बरसों से आप ये महसूस कर रहे होंगे कि हर किसी न किसी दिन कोई डे या दिवस मनाया जा रहा है,जिसका नाम भारतीय संस्कृति में नहीं है,इन डे या दिवसों का जन्म हमारे यहां पाँव पसार रहे पाश्चात्य संस्कृति से हुआ है और ये कुसंस्कृति धीरे धीरे हमारे संस्कारो को ख़त्म करते जा रहा है जो गम्भीर चिंता का विषय है।ये डे, दिवस या सप्ताह अब सरकारी दफ्तरों या यूँ कह सकते हैं कि सरकार में भी अपनी पहचान बना चुकी है तभी तो अखबारों में आधे आधे पृष्ठ का विज्ञापन छापा जाता है जैसे कि बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के महिला विकास निगम ने 1से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह की घोषणा की है कि प्रत्येक माँ को अपने बच्चे को,नवजात शिशु को स्तनपान कराना चाहिए इसके इतने फायदे हैं,सभी जानते हैं।विश्व स्तनपान सप्ताह का क्या मतलब है ये समझ से बाहर है क्योंकि आज की तारीख़ में स्तनपान वही महिलाएँ करवा रही हैं जो गरीबी और ज़िल्लत की ज़िन्दगी झेल रही है कारण उसके बच्चे को बस माँ का दूध ही एकमात्र आधार है वहां ये स्तनपान सप्ताह बेमानी है और दूसरी माँ वो हैं जिनके जीवन पर पश्चमी सभ्यता ने दस्तक दिया है वो अपने बच्चे को स्तनपान नहीं कराती है क्योंकि स्तनपान से उन माताओं का शारीरिक बनावट,उनकी खूबसूरती,उनका यौवन नष्ट हो जाएगा,ऐसी माताओं के लिए आप कोई सप्ताह मना लीजिए अपने बच्चों को स्तनपान नहीं ही कराएंगी।
इसका दूसरा कारण ये भी है कि वहां सम्पनता नृत्य करती हैं पैसे के बल पर किसी को भी एक टक्कर देने का हौसला रखती है।उनके जीवन पर ये सप्ताह या इस तरह का बेमानी विज्ञापन या इस तरह का विचार क्या असर डालेगा?अब सवाल ये उठता है कि मदर्स डे,फादर्स डे,लवर्स डे(वेलेंटाइन डे),डॉटर्स डे, फ्रेंडशिप डे,रोज डे,स्तनपान सप्ताह,नशामुक्त सप्ताह इत्यादि ये सारे यूरोपियन देश का प्रभाव है,वैसे भी हमारे देश पर यूरोपियन्स तमीज़,तहजीव,सहिंता, वस्त्रविन्यास आदि पर अपना प्रभाव छोड़ चुका है जिससे अब मुक्ति सम्भव नहीं है फिर क्या होगा उसके बाद ?फिर एक डे, दिवस,या सप्ताह का जन्म होगा,अखबारों में विज्ञापन होगा फिर हम मानसिक ग़ुलाम हो जाएंगे।मैंने पढ़ा था कि शिक्षा हमें संस्कारवान बनाती है,अच्छे बुरे की समझ देती है फिर ऐसा क्यों?मैंने विश्लेषण किया,निष्कर्ष निकाला कि,ये ज़्यादा शिक्षित होने का "बैड इफैक्ट" है।अति सर्वत्र वरज्यते।

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