नयी दिल्ली 09 अगस्त, विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आज कहा कि उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के पद संवैधानिक है, इसलिए इनमें आरक्षण का प्रावधान नहीं है, लेकिन सरकार समय-समय पर समाज के पिछड़े वर्गाें को नियुक्ति में प्राथमिकता देने का सुझाव देती रही है। उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में गतिरोध से पैदा हुई स्थिति के बारे में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर राज्यसभा में मंत्री के वक्तव्य पर चर्चा के दौरान सदस्यों ने शीर्ष न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में आरक्षण की मांग की थी। इस पर श्री प्रसाद ने जवाब देते हुये कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग), लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और चुनाव आयुक्त जैसे कई पद संवैधानिक है और उसी तरह से उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के पद भी संवैधानिक है। इनमें से किसी में भी आरक्षण का प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि हालांकि जुलाई 2014 में कार्यभार ग्रहण करने के तत्काल बाद उन्होंने विधि मंत्री की हैसियत से सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर योग्य महिलाओं, दलितों, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के योग्य लोगों को न्यायाधीशों की नियुक्ति में प्राथमिकता देने का सुझाव दिया था। बाद में श्री सदानंद गौड़ा ने भी विधि मंत्री की हैसियत से इस तरह के पत्र लिखे थे। उन्होंने कहा कि न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी आैर जवाबदेह बनाने के साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) में सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय ने आम लोगों से सुझाव मंगाये हैं। अब तक तीन हजार टिप्पणियां मिल चुकी हैं। हालांकि उन्हाेंने कहा कि काॅलेजियम प्रणाली का उल्लेख संविधान में नहीं है और यह न्यायाधीशों द्वारा बनायी गयी प्रक्रिया है।
बुधवार, 10 अगस्त 2016
न्यायाधीशों की नियुक्ति में आरक्षण नहीं : प्रसाद
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