अमरेन्द्र सुमन (दुमका), एसकेएमयू, दुमका के पीजी सिलेबस में जल्द ही शामिल होने जा रही है डा0 (मो0) हनीफ ’अकेला’ की पुस्तक अरुण कोलात्कर ’’जेजुरी’’ ’ए क्रिटिकल स्टडी’। अंग्रेजी साहित्य के पुरोधा महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में एक साधारण परिवार में जन्में अरुण बालकृष्ण कोलेत्कर द्वारा रचित काव्य संग्रह ’जेजुरी’ का आलोचनात्मक अध्य्यन डॉ (मो0) हनीफ अकेला का एक बेहतर प्रयास है। अरुण कोलात्कर ’’जेजुरी’’ ’ए क्रिटिकल स्टडी’ पुस्तक में डॉ (मो0) हनीफ अकेला बड़ी बारीकी से उनकी तमाम कविताओं का क्रिटिकल ंएप्रिसिऐशन (तुलनात्मक अध्ययन) किया है। आधुनिक काल के अति यथार्थवाद के प्रणेता कवि अरुण बालकृष्ण कोलेत्कर (1932-.2004) ने वर्तमान समाज व सामाजिक परिवेश में व्याप्त अंधविश्वास व मिथ्यापरक मानसिकता की वास्तविकताओं को जहाँ एक ओर बड़े ही सहज ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, वहीं पूजा-पाठ के नाम पर महंतवादी दृष्टिकोण व लोगों को ठगने की मानसिकता का खुलासा किया है। अंग्रेजी साहित्य में एक मुकाम हासिल कर चुके युवा लेखक व उपन्यासकार डा0 (मो0) हनीफ अकेला ने अपनी काव्यात्मक शैली से उपरोक्त कवि की रचनाओं को मूल भाव के साथ प्रकट करने का सफल प्रयास किया है।
लेखक डा0 (मो0) हनीफ अकेला के अनुसार जेजुरी एक धार्मिक स्थल है, जो पुणे (महाराष्ट्र) से 50 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। झारखण्ड की उप राजधानी दुमका में मलूटी व प0 बंगाल में प्रसिद्ध शक्तिपीठ तारापीठ की तरह ही इस स्थान पर खंडोवा एक स्थल है, जो मंदिरों से भरा पड़ा है। खंडोवा को मंदिरों का गाँव भी कहा जाता है। इस स्थल पर मंदिरों के अवशेष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है। मंदिरों के भग्नावशेषों की आँखों में तड़प, और मस्तिष्क में कराह कविता की प्रकृति को ही धरातल पर रख देती है। यह रुग्ण है, लाचार है, स्तब्ध खड़ा है, लोगों की भीड़ में भी यह अकेलापन महसूस कर रहा है। यत्र-तत्र गोबर का ढेर है। बछड़े टहल रहे हैं। अपने बच्चों को जन्म देकर भविष्य की चिंताओं से बिल्कुल आश्वस्त है कुतिया। ,चारों तरफ मंदिर ही मंदिर है, धार्मिक आस्थावानों के रूपये का दोहन हो रहा है। पुजारी ने मंदिर को अपने कब्जे में कर रखा है। मंदिर पुजारी के लिये लाभदायक वार्षिक फसल वाला खेत बन चुका हे। जेजुरी खण्डहर में परिणत हो रहा है। ,किसी को इसका कोई ख्याल नहीं रह गया है। पत्थरों को किसी न किसी रूप में देवी-देवताओं से जोड़ रखा गया। विचित्र स्थिति है। गन्दी नालियों का दुर्गन्ध चहुँओर फैला हुआ है। नलियों मे कीड़ों की भरमार है। लगातार वे बढ़ते ही जा रहे हैं। ,बिजली-पानी की व्यवस्था बिल्कुल लचर है। भीख माँगने वाले कतार में हैं। स्टेशन से लेकर मंदिर तक किसी न किसी रूप में लोग अपनी जेबें भरने की फिराक में दिख जा रहे हैं। तीर्थयात्रियों का ताँता लगा हुआ है। कवि कोलेत्कर अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इन सारी गतिविधियों व यथार्थ देख, सुन व पढ़ रहे हंै। अंधविश्वास की जड़ों को कवि पूरी तरह समझ रहा है, कि किस तरह पुजारी ने भगवान को गुलाम बना रखा है।
उनका मकसद केवल लूटना है, उनका ध्यान मंदिर के पतन से नहीं है। रुदन और चीख से नही है। है केवल लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी रोटी सेंकना। कवि को अफसोस है कि हमारी संस्कृति किस कदर धूमिल हो रही है। अपने को धार्मिक कहनेवाले किस तरह शोषण कार्य में व्यस्त हैं। डॉ हनीफ ने यहाँ क्रिटिकल स्टडी में कोलेटकर की कविताओं का विस्तारपूर्वक अध्ययन व विश्लेषण किया है। कठिन शब्दों का अािर्थकरन भी किया है। कविता में चरित्रों के साथ-साथ प्रत्येक कविता का अलग अलग ढंग से व्यक्त किया है । पोएटिक थॉट, फीलिंग्स, इमोशन्स, और स्टाइल के साथ-साथ शब्दों के चयन का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है, जो अभूतपूर्व एवम समीचीन है। धर्म और साइंस, विश्वास और संस्कृति ,समय और परिस्थिति , पुरोहित-पुजारी और तीर्थयात्री, यथार्थ और मिथ्या, रूढ़िवादिता और सामाजिक मान्यता के साथ जीवन के वास्तविक पुट का साहित्यिक अध्ययन इस स्टडी का मूल है। डॉ हनीफ ने अपनी विशिष्ट अंदाज में इस पुस्तक को बहुआयामी बनाने का भरपूर प्रयास किया है जो स्तुत्य है । कोलेटकर के जीवन से लेकर उनकी आर्थिक तंगी का भी वर्णन किया है कि किस प्रकार एक साधारण सी कृति भी किसी को असाधारण बना देती है, यदि उसमें यथार्थ के ताने बाने हों । डॉ हनीफ की यह छठी रचना है ।

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